काव्यादर्श (महाकवि दण्डी - प्रसादिनी सान्वय हिन्दी व्याख्या सहित)
Kavyadarsha of Mahakavi Dandin with Prasadini Commentary
महाकवि दण्डी द्वारा
पृष्ठ 29, कुल 270 में से
संदर्भ में पढ़ें६ काव्यादर्श [३।२-३] आदिमध्यान्त-मध्यान्त-मध्याद्याद्यन्त-सर्वतः ॥ २ ॥ अत्यन्तबहवस्तेषां भेदाः सम्भेदयोनयः । या (३) अन्तमें, (४) मध्य और अन्तमें, (५) मध्य और आदिमें, (६) आदि और अन्तमें तथा (७) सब जगहोंमें होनेसे निष्पन्न होते हैं ॥ २ ॥ उनके आपसमें मिश्रणसे बनने वाले भेद मात्रामें बहुत ही अधिक हैं । (४) चार पादोंके (१) आदिमें, (२) मध्यमें या (३) अन्तमें अथवा (४) मध्य और अन्तमें, अथवा (५) मध्य और आदिमें, (६) आदि और अन्तमें तथा (७) आदि, मध्य और अन्त तीनों जगह वर्णसमुदायोंकी त्रिविध (अव्यपेत, व्यपेत और उभयात्मक) आवृत्तिसे इन भेदोंका स्वरूप बनता है । अन्तिम प्रकारमें समूचे पादोंकी भी आवृत्ति हो सकती है । तरुणवाचस्पतिके अनुसार ऊपर बताये चार पादोंके आदि, मध्यप्रभृति सप्तविध स्थानोंमें अव्यवहित और व्यवहित वर्णसमुदायकी आवृत्तिसे सम्पन्न यमकोंके सामान्यतः २१० भेद निष्पन्न होते हैं । तद् यथा—(१) आदि यमक—(क) प्रथम, द्वितीय, तृतीय और चतुर्थ पादोंके आदिमें यमकके चार भेद निष्पन्न होते हैं । (ख. अ) पहले और दूसरे, तीसरे और चौथेके आदि में सम्पन्न यमकके तीन भेद होते हैं । (आ) दूसरे और तीसरे, चौथे पादोंके आदिमें यमकके दो भेद हुए । (इ) तृतीय और चतुर्थ पादोंमें आवृत्तिसे एक भेद बना । इस प्रकार द्विपादादियमकके छह भेद बनते हैं । (ग. अ) प्रथम, द्वितीय, तृतीय पादोंके आदिमें, (आ) प्रथम द्वितीय और चतुर्थ पादों के आदिमें, (इ) प्रथम, तृतीय और चतुर्थ पादोंके आदिमें, (ई) द्वितीय, तृतीय और चतुर्थ पादोंके आदिमें, इस प्रकार त्रिपादादियमक के चार भेद निष्पन्न होते हैं । (घ) चारों पादोंमें आवृत्तिसे एक ही यमक निष्पन्न होता है । इस प्रकार आदियमकके एक पादमें ४, दो पादोंमें ६, तीन पादोंमें ४, एवं चार पादोंमें (१) कुल मिलाकर १५ भेद सम्पन्न हुए । यही सङ्ख्या (२) मध्ययमक, (३) अन्तयमक, (४) आदि- मध्ययमक, (५) आद्यन्तयमक, (६) मध्यान्तयमक तथा (७) आदि- मध्यान्तयमककी होगी । इससे इन सातोंके १०५ भेद निष्पन्न होते हैं । इन्हें (१) अव्यपेत, (२) व्यपेत¹ भेदोंमें गुणितकरनेसे २१० और (३) अव्यपेत-व्यपेतके १०५ भेद मिलानेसे यमकके कुल ३१५ भेद बनते हैं ॥ २ ॥ इन ३१५ भेदोंके परस्पर मिश्रणसे सम्पन्न होने वाले भेदोंकी गणना १. तरुणवाचस्पतिके मतमें यही भेद दण्डिसम्मत है !