भारतकोश
काव्यादर्श (महाकवि दण्डी - प्रसादिनी सान्वय हिन्दी व्याख्या सहित)

काव्यादर्श (महाकवि दण्डी - प्रसादिनी सान्वय हिन्दी व्याख्या सहित)

Kavyadarsha of Mahakavi Dandin with Prasadini Commentary

महाकवि दण्डी द्वारा

DevanagariHindipublished270 पृष्ठ

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पृष्ठ 28

३।१-२] १ यमकके भेद ५ तच्च पादानामादिमध्यान्तगोचरम् ॥ १ ॥ एक-द्वि-त्रि-चतुष्पाद्यमकानां विकल्पना । और वह पादोंके आदि मध्य और अन्तमें होता है ॥ १ ॥ एक, दो, तीन और चार पादोंमें यमकोंके (१) आदिमें, (२) मध्यमें व्यपेतोभयात्मक, ये तीन भेद यमकके निष्पन्न होते हैं । रत्नश्रीज्ञान, वादि- जङ्घाल देव और तरुणवाचस्पतिने यहाँ प्रथम दो भेद ही बताये हैं : पर आचार्य दण्डीने आगे तृतीय भेद भी बताया है : 'अव्यपेत और व्यपेतके अति- रिक्त अव्यपेतव्यपेतात्मा भेद भी है (३३)' कहकर तीन (३४-३६) श्लोकोंमें इसके उदाहरण दिये हैं । अतः त्रिविधता ही आचार्यसम्मत है । अव्यवधानसे आवृत्ति व्यवहितकी अपेक्षा अधिक श्रुतिसुख देती है, इस लिये द्वन्द्वमें अल्पा- च्चतरका पूर्व प्रयोग न करके अभ्यर्हित होनेसे 'अव्यपेत' का पूर्व प्रयोग किया है । 'व्यपेत' शब्द 'वि + अप + √इ + क्त' से निष्पन्न है और 'व्यवहित' का पर्याय है । व्यवधान आवृत्त वर्णसमुदायसे भिन्न वर्णोंका ही होगा । अतः (१) व्यवधानसे रहित, अर्थात् वर्णसमुदायकी निरन्तर, विशिष्ट आवृत्तिसे 'यमक' निष्पन्न होता है, (२) वर्णान्तरके व्यवधानमें वर्णसमुदायकी विशिष्ट आवृत्तिसे भी यमक होता है, तो (३) इन दोनों प्रकारोंके मेलसे भी होता है । इस प्रकार दण्डीने यमकके ये तीन मूल भेद भी यहाँ लक्षणमें ही बता दिये हैं : (१) अव्यपेतयमक, (२) व्यपेतयमक, (३) अव्यपेत-व्यपेतयमक । भरतने यमकके भेदोंका आधार पादके विभिन्न अवयवों 'आदि', 'अन्त' को बताकर इसके कुल दस भेद किये हैं : (१) पादान्तमें, (२) आदि और अन्तमें काञ्ची (शृङ्खला), (३) विषम और सम पादोंमें समुद्ग, (४) एक पादके व्युत्क्रमणसे पादावृत्ति करके विक्रान्त, (५) पूर्वपादान्तकी अगले पाद के आदिमें आवृत्ति करके चक्रवाल, (६) आदिमें आवृत्तिसे सन्दष्ट, (७) चारों पादोंके आदिके समान अक्षरोंके विन्याससे पादादियमक, (८) चारों पादोंके अन्तमें एक पदकी द्विरुक्तिसे पादान्ताम्रेडित, (६) चारों पादोंमें समान अक्षरविन्याससे चतुर्व्यवसित, और (१०) एक व्यञ्जनके नाना रूप वाले स्वरोंसे युक्त होनेपर माला नामक यमक बताये हैं १ ॥ १ ॥ आचार्य दण्डीने भरतकी 'पादादिषु विकल्पतम्' उक्तिका विस्तार निम्न प्रकारसे किया है : (१) एक पाद, (२) दो पादों, (३) तीन पादों और


१. नाट्यशास्त्र १६।६२-८५ देखें ।