काव्यादर्श (महाकवि दण्डी - प्रसादिनी सान्वय हिन्दी व्याख्या सहित)
Kavyadarsha of Mahakavi Dandin with Prasadini Commentary
महाकवि दण्डी द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें४ काव्यादर्श [३१ पर वह स्थिति दण्डीके पश्चात्की है। भरतके उदाहरणोंमें (१) भिन्नार्थक, (२) समानार्थक, तथा (३) निरर्थक, तीनों प्रकारके शब्दोंकी आवृत्ति उदाहरणोंमें उपलब्ध है : चक्रवालयमकके उदाहरणमें 'पुङ्गैः खगैः'में प्रथम 'खगैः' शब्दावयव होनेसे निरर्थक है, 'खगैः । खगैः' में दोनों भिन्नार्थक हैं। इसी प्रकार 'सञ्चिताश्चिताः' में समानार्थक शब्दका तात्पर्यभेदसे प्रयोग है। 'चिताश्चिता' में भिन्नार्थता है। इसी प्रकार चतुर्व्यवसित यमकके उदाहरण (१६।८२) में भी 'वारण' शब्दसे 'वारण' नामक पुष्प, हस्ती, वारणक्रियायुक्त शत्रु, भिन्न- भिन्न अर्थ प्रतीत होते हैं। चतुर्थ पादमें 'वारणानां' छेदसे और ही अर्थ अभिप्रेत है। इससे स्पष्ट है कि 'लाटानुप्रास'को भरत यमकसे पृथक् नहीं मानते । आचार्य दण्डीने भरतके यमकलक्षणको स्पष्ट किया है। प्रथम परिच्छेद में वर्णवृत्तिको 'अनुप्रास' कहा था, तो वर्णसङ्घातकी आवृत्तिको 'यमक'। यमकके बारेमें यह कथन भरतके यमकलक्षणका स्पष्टतर शब्दोंमें अनुवाद ही है। अब इसके उचित अवसरपर उन्होंने भरतके लक्षणसे तीन बातें विशेषकीं हैं : (१) भरतके 'शब्द'से पर्यवसित 'वर्णसमुदाय'का स्पष्टतया कथन किया; (२) 'अभ्यास'के पर्याय 'आवृत्ति'का प्रयोग करके उसमें 'वि'के योगसे 'विशिष्टता' और 'विविधता'को जोड़ा : शोभाकारक तथा विविध प्रकारके न्यासके रूपमें आवृत्ति = व्यावृत्ति; (३) इस व्यावृत्तिका एक विशेषण दिया, जो भरतने नहीं दिया था : अव्यपेत-व्यपेतात्मा। यमकके मूल भेद : 'अव्यपेत ०' में 'अव्यपेत' और 'व्यपेत'का समास है, जिसका विग्रह दो प्रकारसे हो सकता है :—(क१) न व्यपेतः = अव्यपेतः । स च (२) व्यपेतश्चेति अव्यपेत-व्यपेतौ (इतरे० द्वन्द्व) तौ आत्मानौ यस्य, सोऽव्यपेत-व्यपेतात्मा (बहु०)। अर्थात् जिसका स्वरूप (१) अव्यपेत है, और (२) व्यपेत है, इस तरह दो प्रकारका है, वह व्यावृत्ति । (ख) अव्यपेतश्च व्यपे- तञ्च, तयोः समाहार इत्यव्यपेतव्यपेतम्, तद् आत्मा यस्याः, सा । अर्थात् जिसका स्वरूप अव्यपेत और व्यपेतका समाहार (मिश्र) है, वह व्यावृत्ति । इस प्रकार यहाँ (१) अव्यपेतात्मक, (२) व्यपेतात्मक और (३) अव्यपेत- १. ‘शैला यथा शत्रुभिराहता हता हताश्च भूयोऽप्यनु पुङ्गैः खगैः । खगैश्च सर्वैर्युधि सञ्चिताश्चिताश्चिताऽधिरूढा निहतास्तलैस्तलैः ॥’ नाटय० १६।७४