काव्यादर्श (महाकवि दण्डी - प्रसादिनी सान्वय हिन्दी व्याख्या सहित)
Kavyadarsha of Mahakavi Dandin with Prasadini Commentary
महाकवि दण्डी द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें३।१] १ यमकका लक्षण ३ यमक : लक्षण—यमकका शास्त्रीय निरूपण सर्वप्रथम भरतके नाट्य- शास्त्रमें मिलता है : शब्दका अभ्यास तो यमक होता है ।¹ यहाँ 'तो' पूर्वानु- वृत्त अर्थालङ्कारोंसे भेद दिखाता है कि यमक अर्थालङ्कारोंसे भिन्न शब्दा- लङ्कार है । 'शब्द' 'अर्थवान् वर्णसमुदाय' होता है, जो विभक्तिप्रत्यय लगने पर 'पद' कहलाता है । अतः वह भी 'शब्द' है । पदसमुदाय 'वाक्य' कह- लाता है । अतः वह भी 'शब्द' है । यह 'शब्द' वर्णोंसे घटित होता है । अतः अभिनवगुप्तके अनुसार 'वर्ण' भी 'शब्द' है । इस प्रकार भरतके 'शब्द' में वर्णसे लेकर पदसमुदायात्मक वाक्य तक समाविष्ट हैं ।² 'अभ्यास' आवृत्तिको कहते हैं । 'यमक' शब्द 'यम' (जुड़वाँ) से स्वार्थे 'क' प्रत्ययसे निष्पन्न है ।³ इस प्रकार एक वर्णकी आवृत्तिसे लेकर शब्द पद और वाक्यकी आवृत्ति 'यमक'के रूपमें अभिप्रेत है । इससे स्पष्ट होता है कि भरत अनुप्रास की अलगसे सत्ता नहीं मानते । अनुप्रासकी सर्वप्रथम चर्चा दण्डी और भामह के ग्रन्थोंमें उपलब्ध होती है । भामहमें दण्डीकी अपेक्षा विकसित रूपमें उप- लब्ध होती है । भामहके अनुप्रासविवरणको और आगे बढ़ाया है उद्भटने । दण्डीने भरतके 'शब्दाभ्यास'को दो भेदोंमें बाँटा है : (क) वर्णरूप शब्द की आवृत्तिमें 'अनुप्रास' होता है और (ख) वर्णसमुदायकी आवृत्तिमें यमक ।⁴ दण्डीके अनुप्रासके विवरण और बादके इतिहाससे विदित होता है कि अनुप्रासका आरम्भिक रूप वही है, जो बादमें 'वृत्त्यनुप्रास'के नामसे विकसित हुआ है । उसके अनन्तर 'श्रुत्यनुप्रास' अस्तित्वमें आया । भरतके 'शब्दाभ्यास'से दण्डीके उत्तरवर्ती लोगोंने शब्द और पदकी आवृत्तिसे भी अनुप्रासका एक अन्य प्रकार विकसित किया, जो 'लाटानुप्रास'के नामसे विदित हुआ । 'यमक'के अन्तर्गत जो समानार्थक (अभिन्नार्थक) शब्दोंका अभ्यास होता था, वह इस (लाटीय) अनुप्रासके नामसे विदित हुआ । बाकी जो बचा, वह 'यमक' रहा । अर्थात् (क) अभिन्नार्थक शब्दकी या (ख) निरर्थक शब्दकी (यानी शब्दके अवयव वर्णसमुदायकी) आवृत्ति होनेपर 'यमक' माना गया । १. शब्दाभ्यासस्तु यमकम्···। नाट्यशास्त्र० १६।५६ २. अभिनवभारती १६।५६ : तुरर्थालङ्कारेभ्यो व्यतिरेकमाह । 'शब्द'- शब्देन वाक्यं, पदं, तदेकदेशो वर्ण इति सर्वं गृह्यते । ३. यमकं यमजे, शब्दालङ्कारे, पुंसि संयमे । मेदिनीकोष १।१४२ ४. काव्यादर्श १।५५ : वर्णावृत्तिरनुप्रासः । ६१ : आवृत्तिमेव सङ्घात- गोचरां यमकं विदुः । 'विदुः'के कर्ताके रूपमें दण्डीको भरत अभिप्रेत हैं ।