काव्यादर्श (महाकवि दण्डी - प्रसादिनी सान्वय हिन्दी व्याख्या सहित)
Kavyadarsha of Mahakavi Dandin with Prasadini Commentary
महाकवि दण्डी द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें२ काव्यादर्श [३१
शब्दके माध्यमसे शोभा शब्दोंकी पच्चीकारीसे निष्पादित की जाती है । इस पच्चीकारीके दो प्रकार मुख्य हैं : (क) अनुप्रास और (ख) यमक । दोनोंमें शब्दके घटक वर्णोंकी आवृत्ति होती है । (क) जब यह आवृत्ति सामान्य होती है, एकाध वर्ण तक सीमित रहती है, या एक ही वर्णकी आवृत्ति न होकर नाना वर्णोंकी उनके उच्चारणके स्थान, प्रयत्न, मात्रा आदिकी समानताके रूपमें होती है, तब अनु अनुगामी या अनुकूल रूपमें शोभाकारक होनेसे प्र प्रकृष्ट रूपमें √अस् रखनेके कारण अनु+प्र+√ अस्+घञ् योग से 'अनुप्रास' कहलाती है । ह्रस्व, दीर्घ, प्लुतात्मक स्वरकी शोभाधायकता¹ छन्दके माध्यमसे अधिक होती है, अनुप्रासकी दृष्टिसे कम । इस लिये काव्यशास्त्रके आचार्योंने शब्दमें शोभाका आधान करने वाले अलङ्कारोंमें स्वरसाम्य, या स्वरोंकी आवृत्तिको अधिक महत्त्व नहीं दिया है । इस दृष्टिसे व्यञ्जनके साम्य और आवृत्तिपर ही अधिक ध्यान दिया गया है । अतः 'वर्ण'के 'स्वर' और 'व्यञ्जन' दो भेद होते हुए भी 'वर्ण' शब्द भरत आदिके द्वारा 'व्यञ्जन'के लिये अधिक प्रयुक्त हुआ है । स्वतन्त्र या वर्णारूढ स्वरोंके लिये तो 'अक्षर' सञ्ज्ञाका प्रयोग हुआ है ।² भरतने काव्यबन्धोंमें उदार एवं मधुर शब्दोंका प्रयोग आवश्यक बताया है ।³ शब्दोंमें माधुर्य समान ललित वर्णोंके न्याससे ही सम्भव है । भरतके अनुसार काव्यको मृदु एवं ललित पदोंसे भरपूर होना चाहिये ।⁴ पदोंमें मृदुता कोमल वर्णोंके अधिक प्रयोगसे आती है, और लालित्य समान वर्णोंके विन्यास से, अर्थात् अनुप्राससे । आचार्य दण्डी इसे प्रथम परिच्छेदके गुण-प्रकरणमें विस्तरेण बता चुके हैं । अनुप्रासका भी भरपूर विवेचन हम वहाँ (पृष्ठ १२४-१२७में) कर चुके हैं । भरतने अनुप्रासका निरूपण पृथक्से नहीं किया है । उन्होंने यमकको पर्याप्त विस्तारसे दिया है । १. ह्रस्वदीर्घप्लुतानीह यथाभावं यथारसम् । काव्ययोगेष्वक्षराणि यथाशोभं निवेशयेत् ।। नाट्य० १६।१२० २. एकमात्रं भवेद्ध्रस्वं, द्विमात्रं दीर्घमिष्यते । प्लुतं चैव त्रिमात्रं स्यादक्षरं वर्णसंश्रयम् ।। नाट्य० १६।११७ ३. ये बन्धाः पूर्वमुद्दिष्टा विषमार्थसमासमाः । उदारमधुरैः शब्दैः कार्यास्ते स्यु रसानुगाः ।। नाट्य० १६।१२१ ४. मृदुललितपदाढ्यं गूढशब्दार्थहीनं ⋯भवति जगति योग्यं नाटकं प्रेक्षकाणाम् । १६।१२४