भारतकोश
काव्यादर्श (महाकवि दण्डी - प्रसादिनी सान्वय हिन्दी व्याख्या सहित)

काव्यादर्श (महाकवि दण्डी - प्रसादिनी सान्वय हिन्दी व्याख्या सहित)

Kavyadarsha of Mahakavi Dandin with Prasadini Commentary

महाकवि दण्डी द्वारा

DevanagariHindipublished270 पृष्ठ

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( १६ ) काव्यादर्श ३. वर्णनियमवान् चित्र बन्ध (८३-६५) १०२-११८ : भेद (८२) १०२ ; (१) स्वरनियमवान् (८४-८७) १०५-११० : (१) स्वरचतुष्टयनियम (८४) १०५, (२) स्वरत्रितयनियम (८५) १०७, (३) दो स्वरोंके नियम वाला चित्रबन्ध (८६) १०६, (४) एकस्वरनियम (८७) ११०, (२) वर्णस्थाननियमवान् (८८-६५) ११०-११८ : (१) चतुःस्थानवर्णनियमवान् (८८) ११०, (२) त्रिस्थान-वर्णनियम- वान् (८६) १११, (३) द्विस्थानवर्णनियमवान् (६०) ११२, यहाँ स्वर- स्थाननियम और व्यञ्जनस्थाननियम भिन्न हैं ११३, (४) एकस्थानवर्ण- नियमवान् (६१) ११४, (३.१) त्रिविधपञ्चस्वरस्थान वर्णनियम चित्रबन्ध (६२) ११५, यह उदाहरण बहुत कलापूर्ण है ११६, (३.२) त्रिवर्णनियमवान् (६३), कथाका स्रोत श्रीमद्भागवत है ११७; (३.३) द्विव्यञ्जननियम (६४) ११८, (३.४) एकव्यञ्जननियम (६५); दुष्कर एवं सुकर मार्गका उपसंहार (६६) ११६; टीकाकारके मङ्गल श्लोक १२० । टीकाकारके मङ्गल श्लोक १२०; ४. प्रहेलिका (६७-१२४) १२१-१५० — व्युत्पत्ति तथा इतिहास : १२१, प्रहेलिकाओंकी उपयोगिता (६७) १२२, लक्षण : (१) समागता, (६८), १२५; (२), वञ्चिता (३) व्युत्क्रान्ता (६६) १२६, (४) प्रमुषिता, (५) समानरूपा (१००), (६) परुषा १२७, (७) सङ्ख्याता (१०१), (८) प्रकल्पिता, (६) नामान्तरिता (१०२), इन दोनोंमें भेद १२८, (१०) निभृता, 'तुल्य-धर्म-स्पृशा'का व्याख्याभेद, (११) समान-शब्दा १०३) १२६, (१२) सम्मूढा १३०, (१३) पारिहारिकी (१०४) १३१, (१४) एकच्छन्ना, (१५) उभयच्छन्ना (१०५) १३२, (१६) सङ्कीर्णा; प्रहेलिकाओंका उपसंहार (१०६); दुष्ट प्रहेलिकाएँ (१०७) १३३; प्रहेलिकाओंका इतिहास १३५; प्रहेलिकाओंके उदाहरण (१०८-१२४) १३८-१५१ : (१) समागता (१०८) १३८, भोजके मतमें यह सम्बन्धगूढ बन्ध है, (२) वञ्चिता (१०६)