काव्यादर्श (महाकवि दण्डी - प्रसादिनी सान्वय हिन्दी व्याख्या सहित)
Kavyadarsha of Mahakavi Dandin with Prasadini Commentary
महाकवि दण्डी द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंविषयानुक्रमणी (१५) (२) समुद्ग : लक्षण तथा भेद (५३) ६६, इतिहास ६७, उदाहरण : १ प्रथम-तृतीय और द्वितीय-चतुर्थ-पादावृत्ति व्यपेत (५४), ६७, २ प्रथम- द्वितीय-तृतीय-चतुर्थ-पादवर्ती अर्धसम अव्यपेत (५५) ६८, रुद्रटकी व्यवस्था ६६; ३ प्रथम-चतुर्थ व्यपेत, द्वितीय-तृतीय अव्यपेत (५६) वादी और तरुणवाचस्पतिकी व्याख्या उचित नहीं है; (३) पादाम्यास : भेदोंका विवरण ७०, क. प्रथम पादाभ्यास : १ अन्य- पेत द्वितीयपादवर्ती (५७) ७१, २ तृतीयपादवर्ती व्यवहित (५८), मतभेद, ३ चतुर्थपादवर्ती व्यवहित (५६) ७२, ख. द्वितीय पादाभ्यास : ४ अव्यवहित (६०) ७३, उदाहरणमें वर्णित घटनाओंका क्रम उचित नहीं है, ५ व्यवहित (६१) ७४, ग. तृतीय-पादाभ्यास : ६ अव्यपेत (६२) ७४, क. प्रथम-पादा- भ्यास : ७ द्वितीय-तृतीय-पादावृत्त अव्यपेत (६३) ७५, ८ द्वितीय-चतुर्थपादा- वृत्त अव्यवहित व्यवहित (६४) ७६, पाठपर मतभेद, ख. द्विपादाभ्यास : ६ द्वितीय पादका अव्यपेत यमक (६५) ७७, ग. त्रिपादाभ्यास : १० प्रथम पादका अव्यपेत (६६) ७८, पादाभ्यास यमकका उपसंहार (६७) ७८; (४) श्लोकाभ्यास यमक (६७-६८) ७६; (५) महायमक—त्रिपादाभ्यास यमकका विशिष्ट भेद है (७०) ८०, महायमकके दो प्रकार ८१, काव्योंमें प्रथम प्रकारका इक्का-दुक्का प्रयोग मिलता है, द्वितीय प्रकार सुलभ नहीं है; अन्य आचार्योंके मतमें, आवृत्ति-गर्भित महायमक (७१) ८२; (६) यमक-सङ्कर (७२) ८३, (७) प्रतिलोम : लक्षण (७३) ८५, भेद, प्रतिलोम यमकका इतिहास— भारवि माघ और भट्टिके प्रयोग तथा अन्य आचार्योंके मतमें प्रतिलोम यमक, उदाहरण : (क) पादप्रतिलोम (७४) ६०, ख. श्लोकार्धप्रतिलोम (७५) ६१, ग. श्लोकप्रतिलोम (७६-७७) ६४; टीकाकारके मङ्गल-श्लोक । टीकाकारके मङ्गल श्लोक ६५; २. चित्रबन्ध (७८-८३) ६६-१०२—'चित्र' का अर्थ ६६, (१) गोमूतिका दुष्कर बन्ध : लक्षण (७८) ६७, उदाहरण (७६) ६८, (२) अर्ध-भ्रम तथा (३) सर्वतोभद्र चित्रबन्ध : लक्षण (८०) ६६, उदाहरण (२) अर्धभ्रम (८१) १००, डॉ० धर्मेन्द्रकुमारकी कल्पना उचित नहीं है १०१, (३) सर्वतोभद्र (८२), यहाँ व्यपेत पादाद्यन्त प्रतिलोम तथा अव्यपेत पादमध्य प्रतिलोम यमक तथा दीर्घाक्षर नियम अङ्ग हैं :