काव्यादर्श (महाकवि दण्डी - प्रसादिनी सान्वय हिन्दी व्याख्या सहित)
Kavyadarsha of Mahakavi Dandin with Prasadini Commentary
महाकवि दण्डी द्वारा
पृष्ठ 17, कुल 270 में से
संदर्भ में पढ़ें(१४) काव्यादर्श उतना अच्छा नहीं लगता ३३, ४ द्वितीय-तृतीय-पादादि (२३), ५ द्वितीय- चतुर्थ-पादादि (२४) ३४, ६ तृतीय-चतुर्थ-पादादि (२५), वराहवर्णनका ऐतिहासिक सन्दर्भ ३५, डॉ० कृष्णकुमारके मतका खण्डन ३६; ग. त्रि-पाद- वर्ती (२६-२८) ३६-३८ : प्रथम-द्वितीय-तृतीय-पादादि (२६) ३६, २. प्रथम-तृतीय-चतुर्थ-पादादि (२७) ३७; ३ द्वितीय-तृतीय-चतुर्थ-पादादि (२८) ३८; घ. चतुष्पादवर्ती (२६-३२) ३६-४२ : १ एकजातीय (२६) ३६, व्याख्याभेद, २ अर्धसम (३०) ४०, 'अन्वीतम्' की व्याख्या ४१, ३ विषम (३१), ४ व्यत्यस्त (३२) ४२; व्यपेत भेदके उदाहरणोंका विश्लेषण (३३) ४३; ३. अव्यपेत-व्यपेत यमक (३३-३६) ४३-४६ : घ. चतुष्पाद १ अर्ध- सम (३४) ४३, 'साल' पर विचार ४४, २ व्यत्यस्त (३५) ४५, ३ सजा- तीय (३६) ४६, व्याख्याभेदपर विचार ४७, 'निशा' पर टिप्पणी; १. आदियमकके उदाहरणों का विश्लेषण (३७-३८) ४७-४८; (ख) दुष्कर यमक (३६-७७) ४८-६४ : १. अव्यपेत-व्यपेत घ. चतु- ष्पाद २. मध्यवर्ती सजातीय यमक (३६) ४८, २. (२) व्यपेत घ. चतुष्पाद २ मध्यवर्ती सजातीय यमक (४०) ४६, ३. व्यपेत सजातीय चतुष्पादान्त यमक (४१), ४. अव्यपेत-व्यपेतात्मक सजातीय चतुष्पादान्त यमक (४२) ५०, रत्नश्रीज्ञान और तरुणवाचस्पतिसे मतभेद, 'सन्नतेनते' पर टिप्पणी ५१, ५. व्यपेत चतुष्पाद-मध्यान्तगत सजातीय यमक (४३), ६. अव्यपेत चतुष्पादाद्यन्तगत सजातीय (४४), मतभेदपर विचार ५३, पाठभेदमें यमक- भेद ५४, ७. व्यपेत चतुष्पाद अर्धसम सजातीय आदि-मध्ययमक (४५), पाठ- भेदसे यमकभेद तथा व्याख्याभेद ५५, ८. अव्यपेत-व्यपेत चतुष्पादाद्यन्तवर्ती सजातीय यमक (४६) ५६, व्याख्याभेद ६. अव्यपेत-व्यपेत चतुष्पादाद्यन्तगत सजातीय यमकका दूसरा प्रकार (४७) ५७, १०. पादाद्यन्त तथा अन्तादि चतुष्पादअव्यपेत-व्यपेत सजातीय यमक (४८) ५८, ११ व्यपेत चतुष्पादादि मध्यान्त तथा अव्यपेत चतुष्पादान्तादि सजातीय सङ्कीर्ण यमक (४६) ५६, प्राचीन टीकाकारोंसे मतभेद ६०, १२ आदि-मध्यान्तवर्ती चतुष्पाद अव्यपेत- व्यपेत त्रिस्थान यमक (५०) ६१, 'काल-काल'का ऐतिहासिक महत्त्व ६२; यमकके अन्य विशिष्ट भेद—(१) संदष्ट यमक : (५१) ६३, इतिहास, उदाहरण (५२) ६५, टीकाओंसे मतभेद ६६;