भारतकोश
काव्यादर्श (महाकवि दण्डी - प्रसादिनी सान्वय हिन्दी व्याख्या सहित)

काव्यादर्श (महाकवि दण्डी - प्रसादिनी सान्वय हिन्दी व्याख्या सहित)

Kavyadarsha of Mahakavi Dandin with Prasadini Commentary

महाकवि दण्डी द्वारा

DevanagariHindipublished270 पृष्ठ

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३।१२६] ५ दोष : (१) अपार्थ १५६ समुद्रः पीयते देवैरहमस्मि जराऽऽतुरः । अमी गर्जन्ति जीमूता, हरेरैरावणः प्रियः ॥ १२६ ॥ इदमस्वस्थ-चित्तानामभिधानमनिन्दितम् । इतरत्र कविः को वा प्रयुञ्जीतैवमादिकम् ? ॥ १३० ॥ (२ क) एकवाक्ये (ख) प्रबन्धे वा पूर्वापरपराहतम् । समुद्र देवों द्वारा पिया जाता है। मैं बुढ़ापेसे पीड़ित हूँ। ये मेघ गरज रहे हैं। इन्द्रको ऐरावत गज प्रिय है ॥ १२६ ॥ अस्वस्थ चित्त वाले लोगों (मत्त, उन्मत्त और बालकों) का यह कथन निन्दित नहीं है। स्वस्थ चित्त वाले लोगोंके विषयमें कौन कवि इस प्रकार का प्रयोग करेगा ? ॥ १३० ॥ (२ क) एक वाक्यमें या (ख) प्रबन्धमें आगे-पीछेसे विरोध वाला कथन विक्षिप्तावस्थामें, (२) उन्मादादि रोगके कारण पागलपनकी स्थितिमें और (३) स्वभावतः अविकसितचित्तताकी स्थितिमें, यदि इन स्थितियोंमें, अपार्थ प्रयोग किये जाते हैं, तो वे दोष नहीं कहलायेंगे । अपितु इन स्थितियोंके पात्रोंसे अपार्थरहित प्रयोग करवाना दोष होगा । इस प्रकारके प्रयोग दोष होंगे स्वस्थचित्तताकी स्थितिमें । उनसे काव्यको बचाना चाहिये । भामहने इस दोषके निरूपणमें पद और वाक्यके स्वरूपपर तो विचार किया है, समुदायार्थशून्यताकी ग्राह्यतापर विचार नहीं किया है ॥ १२८ ॥ उदाहरण—प्रकृत उदाहरण (श्लोक १२६) में चारों पादोंमें चार वाक्य दिये हैं। ये स्वयंमें तो सङ्गत हैं, पर इनमें आपसमें सङ्गति नहीं है। सङ्गतार्थके विपरीत अपगतार्थ हैं। अतः यहाँ अपार्थता दोष है ॥ १२६ ॥ सङ्गति—उपर्युक्त कथन यदि अस्वस्थ चित्त वाले (१) मदमस्त, (२) पागल या (३) बालकोंके कथनके रूपमें प्रस्तुत किया जाता है, तब तो उनकी मानसिक अस्वस्थताको व्यक्त करनेके कारण यह दोष नहीं कहलायेगा । स्वस्थचित्त लोगोंसे तो कौन समझदार कवि इस प्रकारकी बातें कहलायेगा ? अर्थात् कोई कवि ऐसा नहीं करेगा । यदि कोई इस प्रकार कहलाता है, तो वह कविका दोष होगा । कविको ऐसे प्रयोगोंसे बचना चाहिये । इससे व्यक्त होता है कि अपार्थता दोष अनित्य है ॥ १३० ॥ (२) व्यर्थ—'व्यर्थ' की व्युत्पत्ति है : वि (विरुद्धः) अर्थः । अर्थात् विरोधी अर्थ 'व्यर्थ' है विरोध द्विष्ठ धर्म है । पूर्व और अपर कथनोंमें परस्पर व्याघातकता यदि है, तो वह 'व्यर्थता' दोष होता है । परस्पर व्या- घातकता अर्थगत है । अतः पदोंके समुदायके बिना यह व्याघातकता नहीं हो