काव्यादर्श (महाकवि दण्डी - प्रसादिनी सान्वय हिन्दी व्याख्या सहित)
Kavyadarsha of Mahakavi Dandin with Prasadini Commentary
महाकवि दण्डी द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें१६० काव्यादर्श [३।१३१ विरुद्धार्थतया व्यर्थमिति दोषेषु पठ्यते ॥ १३१ ॥ विरुद्ध अर्थ वाला होनेके कारण (वि = विरुद्ध + अर्थ वाला =, व्यर्थ नामसे) दोषोंके मध्य पढ़ा जाता है ।। १३१ ।। सकती । फलतः पदसमुदाय रूप वाक्यमें यदि परस्पर विरोधी पदोंका प्रयोग है, तो वह वाक्यगत व्यर्थता है । इसी प्रकार वाक्यसमुदाय रूप मुक्तकादि सर्गबन्धान्त काव्यके अवयवोंमें परस्पर विरोधी कथन हैं, तो वह प्रबन्धगत व्यर्थता है । पूर्वापराहतम्' कहनेसे ही 'व्यर्थ' का स्वरूप स्पष्ट हो जानेपर भी 'विरुद्धार्थतया' कहनेका प्रयोजन 'वि' के 'विगतता' आदि अर्थोंका स्पष्टतः परिहार करना है । भरतने इस नामसे कोई दोष नहीं दिया है । उनके भिन्नार्थका द्वितीय प्रकार इससे मिलता-जुलता हो सकता है : जहाँ विवक्षित ही अन्य (एक) अर्थ दूसरे अर्थसे भिन्न (खण्डित) कर दिया जाता है, तो उस काव्यको भिन्नार्थ कहते हैं ।१ भामहने शब्दभेदसे दण्डीका लक्षण ही वाक्य और प्रबन्धकी बात छोड़कर दिया है ।२ उन्होंने इसके दो उदाहरण एक ही प्रकार (वाक्योंमें विरोध) के दिये हैं, जिनमें पूर्ववाक्य और उत्तरवाक्यमें परस्पर विरोधी कथन है ।३ अतः पुनरुक्तमात्र है । दण्डीने उदाहरण तो वाक्य-विरोधका ही दिया है । पर इस दोषकी द्विविधता शब्दतः बताई है ॥ १३१ ॥ १. विवक्षितोऽन्य एवार्थो यत्रान्यार्थेन भिद्यते । भिन्नार्थं तदपि प्राहुः काव्यं काव्यविचक्षणाः ॥ नाट्य० १६।६१ अभिनवभारती : तृतीयं भिन्नार्थं यथा—'स्याच्चेद्देश न रावणः' इत्युक्त्वा 'क्व नु पुनः सर्वत्र सर्वे गुणाः' इति । उद्दिष्टं ह्यत्र रावणस्यानुपादेयत्वं 'क्व नु पुनः' इत्यनेनान्यथा करणाद् भेदितम् । २. विरुद्धार्थं मतं व्यर्थं, विरुद्धं तूपदिश्यते । पूर्वापरार्थव्याघाताद् विपर्यंयकरं, यथा ॥ काव्याल० ४।६ ३. सखि, मान प्रिये धेहि, लघुतामस्य मा गमः । भर्तुश्छन्दानुवर्तिन्यः प्रेम घ्नन्ति नहि स्त्रियः ॥ काव्याल० ४।१० (क) उपासित-गुरुत्वात् त्वं विजितेन्द्रिय-शत्रुषु । (ख) श्रेयसो विनयाधानमधुनाऽऽस्तिष्ठ केवलम् ॥ काव्याल० ४।११