भारतकोश
काव्यादर्श (महाकवि दण्डी - प्रसादिनी सान्वय हिन्दी व्याख्या सहित)

काव्यादर्श (महाकवि दण्डी - प्रसादिनी सान्वय हिन्दी व्याख्या सहित)

Kavyadarsha of Mahakavi Dandin with Prasadini Commentary

महाकवि दण्डी द्वारा

DevanagariHindipublished270 पृष्ठ

पृष्ठ 186, कुल 270 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 186

३।१३५] ५. दोष : (३) एकार्थ १६३ (३) अविशेषेण पूर्वोक्तं यदि भूयोऽपि कीर्त्यते । अर्थतः शब्दतो वाऽपि, तदेकार्थं मतं यथा ॥ १३५ ॥ (३) पूर्वोक्तको उसमें कोई विशेषता बताये बिना अगर (क) अर्थसे, या (ख) शब्दसे फिरसे कहा जाता है, तो वह एकार्थ माना गया है। जैसे—॥ १३५ ॥ इसके होनेकी झलकीकरोक्त सम्भावना इसके भावसे मेल नहीं खाती : (१) तीसरे अङ्कमें मिलनके बाद उर्वशीको प्रेम करना अकार्य कैसे ? (२) 'पुनरुपलब्ध उर्वशीके प्रति उक्ति' बताना श्लोकके 'भूयोऽपि दृश्येत सा', 'स्वप्नेऽपि सा दुर्लभा' कथनोंके विरुद्ध है। अतः यह मत उचित नहीं है। यदि चतुर्थाङ्कमें इस श्लोकका कोई स्थल है, तो राजा द्वारा उदयवतीकी ओर ध्यान देनेसे कुपित उर्वशीके लताके रूपमें परिणत होनेके बाद राजाके विलाप का अङ्ग होना हो सकता है। चतुर्थपादान्तमें राजाकी चिन्ता इस प्रसङ्गके तो बहुत अनुकूल नहीं है, द्वितीय अङ्कमें उचित है; पर उर्वशीके अप्सरा (बहुभोग्या) होनेके कारण कदाचित् समाधान किया जा सकता है। देवयानीका कोप शर्मिष्ठा द्वारा उसे कूपमे धकेलनेके कारण प्रसङ्गोचित है। अतः देवयानीको मनमें रखकर ययातिकी उक्ति मानना ही अधिक उचित लगता है। इसलिये श्रीवत्सलाञ्छन, कमलाकर, वैद्यनाथ, भीमसेन तथा श्रीराम शारक (लोचनकी बालप्रियाके कर्ता) का इसे 'शुक्रकन्या देवयानीको देखकर आसक्त राजाकी उक्ति' बताना ही उचित है। झलकीकर इस स्थलमें उचित विचार नहीं कर सके हैं ॥ १३४ ॥ (३) एकार्थता दोष—पूर्वोक्तको (क) अर्थके द्वारा या (ख) शब्दके द्वारा उसी रूपमें पुनः कहना पिष्टपेषणके समान कोई प्रयोजन सिद्ध नहीं करता । अतः इस प्रकारका पुनरुक्त सुधीजनोंकी दृष्टिमें दोष है। यदि पूर्वो- क्तकी अपेक्षा उत्तरोक्तमें वर्ण्यका कुछ भेद प्रतिपादित है, तो वह पुनरुक्त दोष नहीं है । (क) अर्थके द्वारा पुनरुक्तता तब होती है, जब पूर्वप्रतिपादित अर्थको पर्याय शब्दके द्वारा, पर्यायकी अल्पान्तरताको ध्यानमें न रखते हुए केवल समानार्थताको ध्यानमें रखकर, कहा जाता है। (ख) शब्दके द्वारा पुनरुक्तता तब होती है, जब पूर्वोक्त वाचक शब्दको ही फिरसे प्रयोगमें लाया जाता है ॥ १३५ ॥