काव्यादर्श (महाकवि दण्डी - प्रसादिनी सान्वय हिन्दी व्याख्या सहित)
Kavyadarsha of Mahakavi Dandin with Prasadini Commentary
महाकवि दण्डी द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें१६४ काव्यादर्श [३।१३६-१३७. उत्कामुन्मनयन्त्येते बालां तदलकत्विषः । अम्भोphraseधरास्तडित्वन्तो गम्भीराः स्तनयित्नवः ॥ १३६ ॥ अनुकम्पाऽद्यतिशयो यदि कश्चिद् विवक्ष्यते । न दोषः पुनरुक्तोऽपि, प्रत्युतेयमलङ्कृतिः ॥ १३७ ॥ उन्मना कर रहे ये उड़े-उड़े मन वाली बाला (नवयुवती) को उसकी लटोंसी कान्ति वाले (कारे कजरारे) बदरा, बिजुरीसे युक्त, (गर्जन) गम्भीर गरजते बादल ॥ १३६ ॥ कृपा आदि मनोभावोंकी कोई अधिकता अगर बतलानी अभीष्ट होती है, तो पुनरुक्ति भी दोष नहीं होती । अपितु यह अलङ्कार हो जाती है ॥१३७॥ एकार्थका दण्डिसम्मत उदाहरण—१३६वें श्लोकमें आचार्य दण्डीने (क) अर्थके द्वारा पुनरुक्तता दोषका उदाहरण दिया है : 'उत्का' (१) शब्दशास्त्र (व्याकरण और कोष)के अनुसार 'उन्मनस्' का पर्याय है ।१ 'उत्का' विशेषण को कर्म बनाकर उसीके पर्याय 'उन्मनस्' नाम पदसे निष्पन्न नामधातुके२ प्रयोगसे कविने उसी अर्थको पूर्णतः (अर्थान्तररहित) समानार्थक पर्यायके द्वारा पुनः कहा है । अतः यह अर्थके द्वारा पुनरुक्त (एकार्थता) है । (२) 'अम्भोघर' और 'तडित्वत्' शब्द 'उत्का' और 'उन्मनस्'के समान अन्तररहित पर्याय नहीं हैं, अपितु इनमें 'जलको धारण करने' और 'विद्युत्से युक्त' होनेके रूपमें अन्तर है,३ तथा वह बालाकी विप्रलम्भ रतिके उद्दीपनके रूपमें कविकों अभिप्रेत भी है । अतः विशेषका अभाव न होनेसे यह पुनरुक्त दोष नहीं है ।४ (३) 'गम्भीर' शब्द गर्जनाके कारण सम्पन्न गम्भीरताके कारण मेघका विशे- षण है । 'स्तनयित्नु' शब्द भी गर्जन करते मेघका वाचक है । अतः इस प्रयोग में 'गर्जन ध्वनि' अर्थकी विशेषरहित पुनरुक्ति दोषकी कोटिकी है ।। १३६ ।। एकार्थता अनित्य दोष है—यास्कका कहना है कि पुनरुक्तिसे अर्थकी भूयस्ता लोकसम्मत है ।५ पाणिनिके अनुसार विशेष अर्थोंकी विवक्षा में शब्दकी १. अष्टा ५।२।८० । अमरकोष ३।१।८ : उत्क उन्मनाः । २. उन्मनसं कुर्वन्तीति उन्मनयन्ति । तत्करोति तदाचष्टे (वार्तिक) । ३. अभ्रं मेघो वारिवाहः स्तनयित्नुर्बलाहकः ॥ अमर० १।३।६ धाराधरो जलधरस्तडित्वान्वारिदोऽम्बुभृत् । ७ ४. विशेषविवक्षा में पर्यायके द्वारा पुनरुक्तकी निर्दोषताके लिये देखें : बिभ्राणमानीलरुचं पिशङ्गीर्जटास्तडित्वन्तमिवाम्बुवाहम् ॥ किराता ३।१ ५. निरुक्त १०।४२ : अभ्यासे भूयांसमर्थं मन्यन्ते । यथा—'अहो दर्शनीयाऽहो दर्शनीया' इति ।