भारतकोश
काव्यादर्श (महाकवि दण्डी - प्रसादिनी सान्वय हिन्दी व्याख्या सहित)

काव्यादर्श (महाकवि दण्डी - प्रसादिनी सान्वय हिन्दी व्याख्या सहित)

Kavyadarsha of Mahakavi Dandin with Prasadini Commentary

महाकवि दण्डी द्वारा

DevanagariHindipublished270 पृष्ठ

पृष्ठ 188, कुल 270 में से

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पृष्ठ 188

३।१३८] ५. दोष : (३) एकार्थकी निर्दोषता १६५ हन्यते सा वरारोहा स्मरेणाकाण्डवैरिणा । हन्यते चारुसर्वाङ्गी, हन्यते मञ्जुभाषिणी ॥ १३८ ॥ पीडित की जा रही है वह सुन्दर अनुपात (से युक्त अङ्गों) वाली बिना कारणके शत्रु बने कामदेवके द्वारा । पीडितकी जा रही है सब सुन्दर अङ्गों वाली, पीडित की जा रही है मधुमयवयनी ॥ १३८ ॥ द्विरुक्ति होती है ।१ कुछ अर्थोंमें खास (अमुक) शब्दोंकी, और कुछ अर्थोंमें किसी भी शब्दकी पुनरुक्ति हो सकती है । इन पुनरुक्तियोंके हेतु अर्थविशेषके अतिरिक्त स्थलोंमें भावावेश—असूया, कोप, कुत्सन, भर्त्सन, सम्भ्रम, पीडा— भी होता है । यह तो है दैनन्दिन व्यवहारकी बात । काव्यमें भी यदि दया आदि भावोंको व्यक्त करनेको (क) अर्थकी या (ख) शब्दकी पुनरुक्ति की जाती है, तो वह एकार्थ दोष नहीं होगी । अपितु अलङ्कृति होगी । काव्यमें शोभाका विघात न करके उसका आधान करेगी । इस प्रकारकी पुनरुक्ति अर्थावृत्ति और पदावृत्ति नामक अलङ्कार (२।११६) होगी । इस प्रकार एकार्थता अनित्य दोष है ॥ १३७ ॥ एकार्थताकी अलङ्कारताका उदाहरण—१३८वें श्लोकमें आचार्य दण्डीने शब्दजन्य पुनरुक्तताको दोषके विपरीत शोभावहके रूपमें प्रस्तुत किया है । किसी कोमल, सुन्दरगात्री, मधुमयवयनीके किसीके प्रेममें व्याकुल होनेकी स्थितिका वर्णन कविने किया है । यहाँ उस सुकुमारीकी पीड़ाकी अधिकता देखकर उसके प्रति दयालुतावश पीड़ावाचक अर्थमें भेद न करते हुए ही 'हन्यते' क्रियापदका तीन बार प्रयोग किया है । विशेष भावकी अभिव्यक्ति अभीष्ट होनेसे यह प्रयोग दोषकी बजाय 'पदावृत्ति' नामक अलङ्कार (२।११६) बन गया है ।२ १. अष्टा० ८।१।१-१५ तथा इसपर वार्तिकोंमें (क) वर्जनमें परिकी, सामीप्य में उपरि, अधि और अधस्‌की, असूया, सम्मति, कोप, कुत्सन एवं भर्त्सन मेंवाक्यादिस्थ आमन्त्रितकी, प्रकार अर्थमें गुणवाचककी, कर्मव्यतिहार (अदलाबदली)में सर्वनामकी, अकृच्छ्रमें प्रिय एवं सुखकी, यथास्व अर्थमें यथाकी यथायथम्‌के रूपमें, रहस्य और मर्यादावचनमें 'द्वन्द्व' शब्दमें द्विकी पुनरुक्तिका ओर (ख) नित्यता, वीप्सा, पीडा, आनुपूर्व्य, सम्भ्रमसे प्रवृत्ति, क्रियासमभिहार अर्थोंमें किसी शब्दकी पुनरुक्तिका विधान है । २. सरस्वतीक० ५।४५७ : अत्र 'हन्यत' इत्यमङ्गलार्थम्, 'वरारोहा' इत्य- श्लीलार्थम्; 'हन्यते', 'हन्यते' इति पुनरुक्तम्; 'चारुसर्वाङ्गी' इत्युक्त्या 'वरारोहा' इति व्यर्थम् । त एते सजातीयाश्चत्वारोऽपि दोषगुणाः सङ्की- र्यमाणाः कस्यचिदुन्मत्तभाषिणोऽनुकम्पायतिक्षयविवक्षायामभ्यनुज्ञायन्ते ।

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