काव्यादर्श (महाकवि दण्डी - प्रसादिनी सान्वय हिन्दी व्याख्या सहित)
Kavyadarsha of Mahakavi Dandin with Prasadini Commentary
महाकवि दण्डी द्वारा
३।१३८] ५. दोष : (३) एकार्थकी निर्दोषता १६५ हन्यते सा वरारोहा स्मरेणाकाण्डवैरिणा । हन्यते चारुसर्वाङ्गी, हन्यते मञ्जुभाषिणी ॥ १३८ ॥ पीडित की जा रही है वह सुन्दर अनुपात (से युक्त अङ्गों) वाली बिना कारणके शत्रु बने कामदेवके द्वारा । पीडितकी जा रही है सब सुन्दर अङ्गों वाली, पीडित की जा रही है मधुमयवयनी ॥ १३८ ॥ द्विरुक्ति होती है ।१ कुछ अर्थोंमें खास (अमुक) शब्दोंकी, और कुछ अर्थोंमें किसी भी शब्दकी पुनरुक्ति हो सकती है । इन पुनरुक्तियोंके हेतु अर्थविशेषके अतिरिक्त स्थलोंमें भावावेश—असूया, कोप, कुत्सन, भर्त्सन, सम्भ्रम, पीडा— भी होता है । यह तो है दैनन्दिन व्यवहारकी बात । काव्यमें भी यदि दया आदि भावोंको व्यक्त करनेको (क) अर्थकी या (ख) शब्दकी पुनरुक्ति की जाती है, तो वह एकार्थ दोष नहीं होगी । अपितु अलङ्कृति होगी । काव्यमें शोभाका विघात न करके उसका आधान करेगी । इस प्रकारकी पुनरुक्ति अर्थावृत्ति और पदावृत्ति नामक अलङ्कार (२।११६) होगी । इस प्रकार एकार्थता अनित्य दोष है ॥ १३७ ॥ एकार्थताकी अलङ्कारताका उदाहरण—१३८वें श्लोकमें आचार्य दण्डीने शब्दजन्य पुनरुक्तताको दोषके विपरीत शोभावहके रूपमें प्रस्तुत किया है । किसी कोमल, सुन्दरगात्री, मधुमयवयनीके किसीके प्रेममें व्याकुल होनेकी स्थितिका वर्णन कविने किया है । यहाँ उस सुकुमारीकी पीड़ाकी अधिकता देखकर उसके प्रति दयालुतावश पीड़ावाचक अर्थमें भेद न करते हुए ही 'हन्यते' क्रियापदका तीन बार प्रयोग किया है । विशेष भावकी अभिव्यक्ति अभीष्ट होनेसे यह प्रयोग दोषकी बजाय 'पदावृत्ति' नामक अलङ्कार (२।११६) बन गया है ।२ १. अष्टा० ८।१।१-१५ तथा इसपर वार्तिकोंमें (क) वर्जनमें परिकी, सामीप्य में उपरि, अधि और अधस्की, असूया, सम्मति, कोप, कुत्सन एवं भर्त्सन मेंवाक्यादिस्थ आमन्त्रितकी, प्रकार अर्थमें गुणवाचककी, कर्मव्यतिहार (अदलाबदली)में सर्वनामकी, अकृच्छ्रमें प्रिय एवं सुखकी, यथास्व अर्थमें यथाकी यथायथम्के रूपमें, रहस्य और मर्यादावचनमें 'द्वन्द्व' शब्दमें द्विकी पुनरुक्तिका ओर (ख) नित्यता, वीप्सा, पीडा, आनुपूर्व्य, सम्भ्रमसे प्रवृत्ति, क्रियासमभिहार अर्थोंमें किसी शब्दकी पुनरुक्तिका विधान है । २. सरस्वतीक० ५।४५७ : अत्र 'हन्यत' इत्यमङ्गलार्थम्, 'वरारोहा' इत्य- श्लीलार्थम्; 'हन्यते', 'हन्यते' इति पुनरुक्तम्; 'चारुसर्वाङ्गी' इत्युक्त्या 'वरारोहा' इति व्यर्थम् । त एते सजातीयाश्चत्वारोऽपि दोषगुणाः सङ्की- र्यमाणाः कस्यचिदुन्मत्तभाषिणोऽनुकम्पायतिक्षयविवक्षायामभ्यनुज्ञायन्ते ।
१६६ काव्यादर्श [३।१३८ अन्य आचार्योंके मतमें एकार्थ—शब्दावली भिन्न होते हुए भी दण्डीके 'एकार्थ'का आधार भरतका एकार्थ है : एक अर्थका अभिधान 'एकार्थ' होता है ।' दण्डीने (१) भरतके 'एक' अर्थके अभिधानको 'अविशेषेण फिरसे कहना' के रूपमें स्पष्ट करके कहा है । (२) अर्थतः और शब्दतः भेदोंकी कल्पना तथा (३) मनोभावविशेषकी विवक्षामें अलङ्कृतित्वकी व्यवस्था भी दण्डी का स्वतन्त्र योगदान है । भामहने भी भरतका लक्षण ही शब्दभेदसे उसमें केवल (१) 'अन्योन्यं' ('आपस में') जोड़कर दिया है । इसके अतिरिक्त, (२) अन्यों (दण्डी) के 'शब्दतो वापि' भेदकथनको स्थूल होनेके कारण यहाँ उसका वर्णन उचित न समझकर केवल अर्थसे पुनरुक्तिको ही स्वीकार किया है । शब्दतः पुनरुक्ति विक्षिप्त ही कर सकता है ।' विक्षिप्तचित्तताके अतिरिक्त भय, शोक, ईर्ष्यामें और हर्ष तथा आश्चर्यमें भी जो 'जाओ, जाओ' जैसा कहना होता है, उसे 'पुनरुक्त' (दोष) नहीं कहते ।' यहाँ (दोषप्रकरणमें) अर्थसे जो पुनरुक्त होता है, वही 'एकार्थ' (दोष) इष्ट है । क्योंकि उक्तको पुनः कहनेपर अर्थप्रतीति रूप कार्य (प्रयोजन) सम्भव नहीं होता ।' जैसे—महलोंपर बादल द्वारा छोड़े (और) पतनालोंसे गिरने वाले पानीकी आवाज उस (सुन्दरी) को अवश्य ही उन्मन मनवाली बना रही है ।" भामहके इस निरूपणमें (१) भरतसे तो अभिन्नता है; अन्यों (दण्डी) के (२) शब्दतः एकार्थताका शिथिलसा खण्डन किया गया है, (३) चित्तवृत्तियों के आवेगमें शब्दतः पुनरुक्तिका उदाहरण देकर इसे आचार्यने दोष नहीं माना; इससे इन परिस्थितियोंमें आर्थिक पुनरुक्तिकी निर्दोषता भी उपलक्षित होती १. एकार्थस्याभिधानं यत्, तदेकार्थमिति स्मृतम् । नाटय० १६।६३ २. यदभिन्नार्थमन्योन्यं, तदेकार्थं प्रचक्षते । पुनरुक्तमिदं प्राहुरन्ये शब्दार्थभेदतः ।। काव्याल० ४।१२ न शब्दपुनरुक्तं तु स्थौल्यादत्रोपवर्ण्यते । कथमक्षिप्तचित्तः सन्नुक्तमेवाभिधास्यति ? ।। १३ ३. भयशोकाभ्यसूयासु, हर्षविस्मययोरपि । यथाऽऽह 'गच्छ, गच्छे'ति, पुनरुक्तं न तद् विदुः ।। काव्यालं० ४।१४ ४. अत्रार्थपुनरुक्तं यत्, तदेवैकार्थमिष्यते । उक्तस्य पुनराख्याने कार्यासम्भवतो, यथा ।। १५ ५. तामुन्मनमनसं नूनं करोति ध्वनिरम्भसाम् । सौधेषु घनमुक्तानां प्रणालीमुखपातिनाम् ।। १६
३।१३८ ] दोष : ( ३ ) एकार्थ अन्य आचार्योंके मतमें १६७ है; (४) दण्डीकी 'अनुकम्पादि' उक्तिका विस्तार विक्षिप्तचित्तता तथा भय आदि पाँच अवस्थाओंके परिगणनसे किया है । (५) उदाहरणमें दण्डीके उदाहरणकी अर्थच्छाया होते हुए भी उसकी अपेक्षा अर्थसौन्दर्य तो है ही नहीं, दोषप्रदर्शन भी उतना चातुर्यपूर्ण नहीं है : 'उत्क'में 'मन' अर्थतः समाहित है, उसी शब्दार्थांशको 'मनस्' से पुनः कहा है । इस प्रकार यहाँ अर्थकी पुनरुक्ति है । भामहके भाष्यकार पं० देवेन्द्रनाथ शर्माने 'सौध' का अर्थ 'कोठा' किया है । उन्हें वेश्याका कोठा तो अभिप्रेत नहीं होगा । पर 'सौध' का अर्थ 'राज- सदन' होता है ।१ इसके अतिरिक्त, उन्होंने श्लोकके शेष तीन पादोंमें भी एकार्थता मानी है : जलसे ध्वनि तभी होगी, जब वह मेघसे बरसे, या नाली आदिसे गिरे । अतः 'ध्वनि' कहना ही पर्याप्त था; कोठोंकी छतपर बरसने और नालीसे गिरनेका वर्णन पुनरुक्त मात्र हुआ ।२ पर यदि इसे दोष माना जायेगा, तब तो प्रकृतिचित्रण आदिमें कविको विषयका सङ्केतमात्र देकर पुनरुक्तको बचाना होगा । क्या 'अम्भसां ध्वनिः' मात्र कहनेपर, 'मेघमुक्ता- नाम्' आदि विशेषणोंका प्रयोग न करनेपर, नेयत्व दोष नहीं हो जायेगा ? दूसरे, यहाँ अभिन्न अर्थकी पुनरुक्ति कहाँ है ? दो विशेषणोंसे जलध्वनिका द्वैविध्य क्या इसे भिन्न नहीं कर देता ? भामहने 'अभिन्न'के और भरतने 'एक' शब्दके प्रयोगसे उसी 'अविशेषेण अभिन्नता या एकता'को सूचित किया है, जिसे दण्डीने स्पष्टतः लक्षणमें समाविष्ट किया है । अतः यहाँ ध्वनिका विशेष अभिप्रेत होनेसे भी पुनरुक्तता नहीं है । इस विवरणसे यह सिद्ध होता है कि दण्डीका एकार्थनिरूपण भरत और भामहके निरूपणसे निर्भ्रान्त, स्पष्ट, पूर्ण, अधिक सूचनासे युक्त एवं सुन्दर तथा चातुर्यपूर्ण है । अहो सूक्ष्मेक्षिकाऽऽचार्यदण्डिनः । दण्डीके उदाहरणकी रेंड़ पीटी है भोजने । उन्होंने उसमें दो परिवर्तन किये : (१) वर्षाकालके कारण उन्मनस्कताका विषय कोमल होनेसे अधिक उचित बालाको न बनाकर पुरुषको बनाया है; (२) शब्दपौनरुक्त्यको प्रस्तुत करनेको 'बालां तदलकत्विषः' के स्थान पर 'गम्भीराः स्तनयित्नवः'को रखकर द्वितीय पादके शब्दोंकी पुनरुक्ति चतुर्थ पादमें बताई है । इससे यही उदाहरण १. अमरकोष २।२।१० : सौधोऽस्त्री राजसदनम् । २. काव्यालङ्कार, बिहारराष्ट्रभाषापरिषत्, पटना, पृष्ठ ६३ ।
१६८ काव्यादर्श [३।१३६ (४) निर्णयार्थं प्रयुक्तानि संशयं जनयन्ति चेत् । वचांसि दोष एवासौ ससंशय इति स्मृतः ॥ १३६ ॥ (४) निर्णयके लिये प्रयुक्त वचन यदि संदेह उत्पन्न करते हैं, तो वह 'ससंशय' नामसे स्मृत दोष ही है ॥ १३६ ॥ शब्दपौनरुक्त्यका होनेसे सङ्क्षेप तो धाराधराधीशने कर दिया, १ परंतु उदाहरणके अर्थसौन्दर्यको धराशायी कर दिया। दोषयुक्तको भी काव्य- सौन्दर्यसे युक्त तो होना चाहिये । रत्नश्रीज्ञानने इस प्रसङ्गमें एक श्लोक उद्धृत किया है : विस्मयमें, विषाद में, क्रोधमें, दीनतामें, निषेधमें, प्रसन्नतामें और हर्षमें एक पदका दो बार कथन होता है२ ॥ १३८ ॥ (४) ससंशय दोष - कोई भी बात कहते समय शब्दोंका प्रयोग होता तो है सन्देहनिवारणके लिये, किन्तु तब भी यदि संदेह ही उत्पन्न होता है, तो वह वचनविन्यास निश्चयके विपरीत एकाधिक अर्थोंका प्रतिपादक होनेसे संशययुक्त होनेके कारण 'ससंशय' कहलाता है । निर्णयार्थम् - प्रकरणके अनुसार काव्यके अर्थका निर्णय = निश्चय जिस का साध्य होनेके कारण अर्थ = प्रयोजन है, वह 'निर्णयार्थ' है । यह पद 'प्रयुक्तानि' में निहित क्रियाका विशेषण है ।३ यह निर्णयकी अपेक्षामें संशय दोषकारक होता है । जिस स्थितिमें दोष नहीं होता, वह स्थिति आगे १४१- १४३ श्लोकोंमें खोलकर बताई है । भरतके दोषोंमें इस प्रकारके दोषकी गणना नहीं है । (४ ख) भिन्नार्थ- की व्याख्यासे कदाचित् यह दोष निकल सकता है : विवक्षित (निर्णयार्थ उक्त) अर्थ यदि अन्य अर्थ (विकल्प) से भेद दिया जाता है, विवक्षित अर्थके साथ १. पदं पदार्थश्चाभिन्नौ यत्र, तत् पुनरुक्तितमत् ॥ सरस्वती० १।२२ 'उत्कानुन्मनयन्त्येते गम्भीराः स्तनयित्नवः । अम्भोघरास्तडित्वन्तो गम्भीराः स्तनयित्नवः' ॥ उदाहरण २८ रत्नदर्पण : सङ्क्षेपार्थं त्वेकमुदाहरणम् । २. विस्मये च विषादे च कोपे दैन्ये च वारणं । प्रसादे चैव हर्षे च पदमेकं द्विरुच्यते ॥ ३. रत्नश्री : निर्णयो= निश्चयः प्रकरणात् काव्यार्थविषयः, संशय-विपर्यास- विरोधी प्रत्ययः, अर्थः = प्रयोजनं साध्यत्वाद् यस्मिन् प्रयोगे इति क्रियाविशेषणम् ।
३।१४०] ५. दोष : (४) संशय १६६ मनोरथप्रियालोकरसलोलेक्षणे सखि । आराद्वृत्तिरसौ माता न क्षमा द्रष्टुमीदृशम् ॥ १४० ॥ मनचीते प्रियको देखनेके आनन्दसे चञ्चल नयनों वाली हे सखि, आराद् विद्यमान वह माँ है। ऐसेको नहीं देख सकती ॥ १४० ॥ अन्य अर्थकी प्रतीति यदि होती है, तो एकाधिक अर्थोंकी प्रतीति करानेके कारण इस प्रकारका अभिधान 'ससंशय' ही तो होगा । इस प्रकार भरतके (४) भिन्नार्थकी द्विविध व्याख्यासे दण्डीके (३) व्यर्थ और (४) संशय दोष विकसित हुए हों, यह हो सकता है। भामहने इस दोषका निरूपण यों किया है : एकाधिक पदार्थोंके समान धर्मोंका शब्दके द्वारा कथन होनेसे और उनमें भेद बताने वाले धर्मोंका कथन न होनेसे जो ज्ञान प्रतिष्ठा (निश्चयकी स्थिति) को न प्राप्त कर सके, ऐसा जो ज्ञान होवे, उसे यहाँ 'ससंशय' जानते हैं।¹ इस ज्ञानको उत्पन्न करने वाले वचनको 'ससंशय' कहते हैं। वाक्यका प्रयोजन निश्चय अभीष्ट होता है, जिससे कि वह झूले नहीं।² जैसे— भूभृत् व्यालोंसे युक्त, दुर्गम, रत्नों वाले, फलोंसे युक्त होते हैं। प्रमादशील लोगोंको उनसे सदा भय होता है।³ इस उदाहरणमें प्रयुक्त सञ्ज्ञापद 'भूभृत्'के दो अर्थ हैं : राजा, पर्वत ।⁴ भूभृत्के लिये जिन विशेषणोंका प्रयोग किया है, वे दोनों अर्थोंपर लागू होते हैं। अतः सामान्यधर्मोंका यहाँ श्रवण है। राजा और पर्वतमें भेद करने वाले विशेषणोंका यहाँ प्रयोग नहीं किया गया है। अतः यह निश्चय नहीं हो पाता कि यहाँ राजा विवक्षित है, या पर्वत । अतः यहाँ ससंशय दोष है ॥ १३६ ॥ ससंशयका उदाहरण—प्रस्तुत (१४०वें) श्लोकमें अपने प्रियतमको देखने के आनन्दसे चञ्चल हुए नयनों वाली अर्थात् प्रियको देखनेका आनन्द उठाने को अत्यन्त आतुर रमणीके प्रति उसकी सखी कहती है कि वो माँ आरात् है। ऐसे को नहीं देख सकती । यहाँ उत्तरार्धसे यह निश्चित नहीं होता कि वह १. श्रुतेः सामान्यधर्माणां, विशेषस्यानुदाहृतेः । अप्रतिष्ठं यदत्रैतज्ज्ञानं तत् 'ससंशय' विदुः ।। काव्याल० ४।१७ २. 'ससंशय'मिति प्राहुस्ततस्तज्जननं वचः । इष्टं निश्चितये वाक्यं, न दोलायेत, तद् यथा ।। काव्याल० ४।१८ ३. व्यालवन्तो, दुरारोहा, रत्नवन्तः, फलान्विताः । विषमा भूभृतस्तेभ्यो भयमाशु प्रमादिनाम् ।। काव्याल० ४।१६ ४. अमर ३।३।६१ : भूभृद् भूमिधरे नृपे । २।३।१ महीध्रे क्ष्माभृदहार्य- धरपर्वताः ।
१७० काव्यादर्श [३।१४१ ईदृशं संशयायैव यदि जातु प्रयुज्यते । स्यादलङ्कार एवासौ, न दोषस्तत्र, तद् यथा ॥ १४१ ॥ इस प्रकारका (संशययुक्त वचन) अगर संशयके लिये ही कभी प्रयोगमें लाया जाता है, तब वह अलङ्कार ही होगा । उस (कथन)में दोष नहीं है । जैसे—॥ १४१ ॥ माता आराद् होनेसे उसकी इस चेष्टाको नहीं देख सकती, या माँ निकट (आरात्) होनेके कारण वह रमणी अपने प्रियको नहीं देख सकेगी, माँ जो देख रही है । यहाँ सखीने यह विवरण दिया तो था निश्चय करनेको, पर उससे ही उत्पन्न हो रहा है संशय । क्यों कि 'आरात्' पद 'दूर' और 'निकट' दोनों अर्थोंका वाचक है ।¹ श्लोकके पूर्वार्धमें भी 'मनोरथप्रिय' शब्द 'अभीष्ट' अर्थमें हो सकता है : आलोक = प्रकाश घरसे बाहरके प्रति रुचिसं, बाहर निकलकर घूमनेके आनन्द या रुचिसे चञ्चल नयनों वाली हे सखि, तुम जा सकती हो; माँ दूर है, तुम्हारा जाना नहीं देख सकती, अथवा माँ नजदीक है, तुम बाहर जाकर नहीं देख सकती²। यहाँ 'असौ' भी परोक्ष और प्रत्यक्ष दोनोंके लिये प्रयुक्त होनेसे निश्चित अर्थका अभिधान नहीं करता ।³ और 'आरात्'के दूर और समीप दोनों अर्थोंसे ठीक अन्वित होता है : (क) 'असौ' (वह प्रिय) दूर है । माँ उसे नहीं देख सकती । तुम झटपट जाकर उससे मिल लो । (ख) यह माँ निकट है । इस लिये तुम ऐसे (मातृदृष्ट प्रिय) को नहीं देख सकती । चुपचाप बैठो । इस प्रकार यहाँ पूर्वार्धका आमन्त्रण वाक्य भी अनिश्चिता- र्थक है । और उत्तरार्धका वाक्य पूर्वार्धके अर्थके विधान या निषेध किसी भी एक अर्थका निर्णय करनेमें समर्थ नहीं है अतः इस कविताके अङ्ग-अङ्गमें संशय छाया हुआ है ॥ १४० ॥ ससंशय अनित्य दोष है—यदि कभी संशयमें पर्यवसित होने वाला वचन निर्णयकी विवक्षासे नहीं, अपितु संशयकी विवक्षासे ही प्रयुक्त होता है, तो वह दोष नहीं होगा । अपितु 'ससंशय' ('ससन्देह') नामक अलङ्कार (२।२६ तथा ३५६) होगा । संशयकी अविवक्षामें यदि संशय आ धमकता है, तो वह अनिष्ट मेहमान दोष ही तो माना जायेगा ! ॥ १४१ ॥ १. अमरकोष ३।३।२४२ : आराद् दूर-समीपयोः । २. रत्नश्री : यद्वा 'मनोरथप्रिय इष्टः आलोकः प्रकाशो बाह्यः । तद्गत- रसलोलेक्षणत्वं न संवृत्तम् । आत्मानमन्तस्तिष्ठन्तं नेच्छसि । किंतु यथेष्टं बहिरालोके भ्रमितुं वाञ्छसि ।' इत्यभिप्रायेणैवमामन्त्रयते । ३. मेदिनीकोष ३२।१५ : अदः परस्मिन्नत्र स्यात् ।
३।१४२-१४३ ] ५. दोष : (४) संशयकी अदोषता १७१ पश्याम्यनङ्गजातङ्कलङ्घितां तामनिन्दिताम् । कालेनैव कठोरेण ग्रस्तां किं नस्त्वदाशया ॥ १४२ ॥ कामार्त्ता, घर्मतप्ता वेत्यनिश्चयकरं वचः । युवानमाकुलीकर्तुमिति दूत्याह नर्मणा ॥ १४३ ॥ उस अनिन्दित सुन्दरी अनङ्गज (क. अनङ्ग = कामसे जन्य, ख. न अङ्गज) आतङ्क (क. पीडा, कामबाधा, ख. सन्ताप, गर्मी) से लङ्घित कठोर (भीषण) काल (क. मृत्यु, ख. ग्रीष्मकाल) से ही ग्रस्त देख रहा हूँ । तुम्हारे आशा (बाँधने) से हमें क्या लेना है ? ॥ १४२ ॥ (वर्ण्य बाला क.) कामपीडित है, या (ख) गरमीसे सन्तप्त है, यह निश्चय नहीं करने वाला वचन दूती युवक (प्रेमी) को व्याकुल करनेको प्रणयपरिहासमें कहती है ॥ १४३ ॥ ससंशयकी अलङ्कारताका उदाहरण—प्रकृत (१४२वें) श्लोकमें किसी सुन्दरीकी कष्टावस्थाका वर्णन किया है । इससे प्रकट होता है कि वह सुन्दरी (क) कामबाधासे पीडित है, या (ख) उसे गर्मी लग गई है, यह निश्चित नहीं हो पा रहा । यहाँ 'अनङ्गज' के दो अर्थ हैं : (क) अनङ्गसे होने वाला है, (ख) जो अङ्गज (कामका) नहीं है, कामेतर कारणसे है, इसी प्रकार 'काल' शब्दके भी दो अर्थ हैं : (क) मृत्यु, कामपीडाकी अन्तिम अवस्था, (ख) ग्रीष्म समय । 'आतङ्क' और 'कठोर' शब्द दोनों स्थितियोंमें अनुकूल हैं : (क) वह कामबाधाकी उस अन्तिम स्थितिको पहुँच गई है, और तुम अब भी अगर उसके जीनेकी आस लगाये बैठे हो, तो नादान प्रेमी, हम क्या कहें; (ख) वह ग्रीष्मबाधासे पीडित है, कामबाधासे नहीं, और तुम इसे अगर प्रेमबाधा समझकर उसका प्यार पानेकी आस लगाये बैठे हो, तो हम क्या करें ! इस प्रकार यहाँ दोनों अर्थ विवक्षित होनेसे संशय विवक्षित है । इस लिये दोष नहीं है, अपितु 'ससंशय' अलङ्कार है ॥ १४२ ॥ उदाहरणकी सङ्गति—किसी दूती (रमणीका सन्देश लेकर उसके प्रियके पास गई उसकी सखी आदि) रमणीके प्रेममें व्याकुल प्रियको और व्याकुल करनेको (क) 'वह उमके प्रेममें व्याकुल है,' या (ख) 'लू लगनेसे उसकी वैसी हालत हो गई है', यह निश्चय न करने वाले, संशययुक्त, शब्दोंमें कह रही है । अतः संशयके विवक्षित होनेसे यहाँ 'ससंशय' अलङ्कार है । कामबाधा और ग्रीष्मबाधाकी समानताके लिये शाकुन्तल (३।७) देखें ।
१७२ काव्यादर्श [३।१४४-१४५ (५) उद्देशानुगुणोऽर्थानामनुद्देशो न चेत् कृतः । अपक्रमाभिधानं तं दोषमाचक्षते बुधाः१ ॥ १४४ ॥ स्थिति-निर्माण-संहार-हेतवो जगतामजाः । शम्भु-नारायणाम्भोजयोनयः पालयन्तु वः ॥ १४५ ॥ (५) पदार्थोंका अनुकथन यदि उद्देश (पूर्व कथन) के अनुसार नहीं किया गया है, तो विद्वान् लोग उसे अपक्रम नामक दोष कहते हैं ॥ १४४ ॥ लोकोंकी (क) स्थिति (पालन), (ख) सृष्टि एवं (ग) संहार जिनके कारण होते हैं, वे अजन्मा (क) शिव, (ख) विष्णु एवं (ग) कमलयोनि (ब्रह्मा) तुम्हारी रक्षा करें ॥ १४५ ॥ वहाँ चतुर्थ पादमें संशयनिवारण किया गया है ।२ यह दोष भरतके दस दोषोंमें नहीं है । भामहने संशय ज्ञानका शास्त्रीय स्वरूप बताकर यह कहा है कि वाक्यका प्रयोग निश्चत ज्ञानके लिये इष्ट होता है, जिसमे कि श्रोता झूलता न रहे । उन्होंने ससंशयकी अलङ्कारताके विषयमें कुछ नहीं कहा है ॥ १४३ ॥ (५) अपक्रम दोष--काव्योंमें कई पदार्थोंका परिगणन जिस क्रममें किया गया है, उनका अनुदेश (बादमें प्रतिपादन) यदि उसी क्रममें न किया जाये, पूर्वोक्त क्रमको तोड़कर किया जाये, तो वह अपक्रम (क्रमभङ्ग) नामक दोष होता है । पाणिनिके अनुसार उद्दिष्टोंका अनुदेश उद्देशकी सङ्ख्याके अनुसार होना चाहिये ।३ यह नियम काव्यमें भी पालनीय होता है । इसका भङ्ग करनेपर काव्य सदोष हो जाता है ॥ १४४ ॥ उदाहरण—प्रकृत (१४५वें) श्लोकमें कविने पूर्वार्धमें तीन देवताओंके तीन कार्योंका वर्णन जिस क्रमसे किया है, उत्तरार्धमें उनके सम्बन्धी देवताओं १. रत्नश्रीमें 'बुधा:' की व्याख्या नहीं की है, 'यथा' की की है, 'आचक्षते' के कर्ताके रूपमें 'कवय:' का अध्याहार किया है : अपक्रमं नाम दोषं तं यथोक्तमाचक्षते कथयन्ति कवयः । 'यथा' इत्युदाहरति । २. राजा—बलवदसुस्थशरीरा शकुन्तला दृश्यते । (सवितर्कम्) तत् किमयं- मातपदोषः स्याद्, उत यथा मे मनसि वर्तते ? अथवा कृतं सन्देहेन स्तनन्यस्तोशीरं शिथिलितमृणालैकवलयं, प्रियायाः साबाधं किमपि कमनीयं वपुरिदम् । समस्तापः कामं, मनसिजनिदाघप्रसरयोर् न तु ग्रीष्मस्यैवं सुभगमपराधं युवतिषु ॥ ३. अष्टा० १।३।१० : यथासङ्ख्यमनुदेशः समानाम् ।
३।१४६-१४७] ५. दोष : (५) अपक्रमकी अदोषता १७३ यत्नः सम्बन्ध-¹विज्ञान-हेतुः कोऽपि कृतो यदि । क्रमलङ्घनम्प्याहुर्न दोषं सूरयो, यथा ॥ १४६ ॥ बन्धुत्यागस्तनुत्यागो देशत्याग इति त्रिषु । आद्यन्तावायतक्लेशौ, मध्यमः क्षणिकज्वरः ॥ १४७ ॥ (उद्दिष्ट और अनुदिष्टमें) सम्बन्ध (अन्वय) के विशिष्ट ज्ञान (अथवा निर्बाध ज्ञान) में कोई (शाब्द अथवा आर्थ) यत्न किया गया हो, तो क्रमके उल्लङ्घनको भी बुद्धिमान् लोग दोष नहीं कहते । जैसे—॥ १४६ ॥ (क) भाईबन्द मित्र आदिका त्याग, (ख) शरीरका त्याग (मृत्यु), (ग) देशत्याग (देशनिकाला) इन तीनोंमें पहला (बन्धुत्याग) और अन्तिम (देशत्याग) दीर्घ अथवा अनियन्त्रित कष्ट देने वाले हैं। बीच वाला (तनुत्याग, मरण) क्षणिक पीड़ा है ॥ १४७ ॥ का कथन उसी क्रममें नहीं किया है : (क) स्थितिके कर्ता देवता नारायणको आदिमें न कहकर मध्यमें कहा है, (ख) निर्माणकर्ता ब्रह्माका कथन मध्यमें न करके अन्त (ग) में किया है और (ग) संहारकर्ता शम्भुको अनुदेशके आदि (क) में रखा है। इस प्रकार यहाँ क्रमभङ्ग होनेसे 'अपक्रम' दोष है । इसके अतिरिक्त उद्देशमें भी युक्तियुक्त क्रम (क) निर्माण, (ख) स्थिति और (ग) संहारको भङ्ग करके दिया गया है। इससे आचार्य काव्यमें उक्त (शब्द से उपात्त) क्रम ही नहीं, अपितु लोकमें औचित्यलभ्य, न्यायोपात्त क्रमके भङ्गको भी अपक्रम समझते हैं, यह आशय प्रकट होता है ॥ १४५ ॥ अपक्रम अनित्य दोष है—उद्दिष्ट और अनुदिष्टमें क्रमकी दृष्टिसे एकता होनेपर अन्वयप्रतीतिमें बाधा नहीं होती । इससे अर्थप्रतीति समीचीनतया हो जाती है । क्रमभङ्गसे उनमें सम्बन्धके भङ्ग होनेसे अन्वितार्थकी प्रतीति नहीं होती । किन्तु इस सम्बन्धका ज्ञान यदि किसी पृथक् प्रयत्न (अलग कथन) से करा दिया जाता है, तो अन्वयप्रतीतिमें क्रमभङ्ग करनेपर भी बाधा नहीं आती और अर्थ सम्यक् एवं निर्बाध रूपसे तो प्रतीत होता ही है, भग्नक्रम पदार्थोंके ज्ञानमें भी कुछ विशिष्टता आ जाती है। अर्थात् इस प्रकारका क्रमभङ्ग यथाक्रम कथनकी अपेक्षा अतिरिक्त शोभाका जनक हो जाता है । इसलिये विद्वान् लोग ऐसे अपक्रमको दोष नहीं मानते ॥ १४६ ॥ अपक्रमकी अदोषताका उदाहरण—१४७वें श्लोकमें पूर्वार्धमें (क) बन्धुत्याग, (ख) तनुत्याग और (ग) देशत्याग ये तीन चीजें बताई हैं। फिर १. सरस्वतीकण्ठाभरण १।१।२ में 'निर्ज्ञान' पाठ है । रत्नश्रीमें इसे पाठान्तर बताया है। रत्नश्रीमें 'यत्नसम्बन्ध०' पाठ इष्ट प्रतीत होता है ।
२७४ काव्यादर्श [३।१४७
इनमें पहली और तीसरी चीजको अलग करके क्रमभङ्ग किया गया है । इन दोनों आदिम पदार्थ बन्धुत्याग और अन्तिम पदार्थ देशत्यागका सम्बन्ध आयत अथवा अयत क्लेशसे युक्त होनेके साथ करनेको पृथक् यत्न इनका कथन करके किया गया है । ऐसा करनेसे क्रमभङ्ग अवश्य हुआ है । पर इससे भग्नक्रम पदार्थोंकी तनुत्यागसे विशिष्टता अतिरिक्त रूपसे केवल क्रमभङ्गके कारण ही प्रकट होती है । तीन पदार्थोंमेंसे दोषका सम्बन्ध 'आयत- क्लेश' विशेषणमें और देशत्यागका सम्बन्ध 'क्षणिकज्वरत्व' से करनेमें यहाँ विशेष यत्न है । अतः यह क्रमभङ्ग दोष नहीं है, अपितु गुण है । यह दोष नाट्यशास्त्रमें नहीं है । भामहने अपक्रमका दण्ड्युक्त स्वरूप लक्षणोदाहरण मात्रसे शब्दभेदसे प्रस्तुत किया है । अपक्रमकी अदोषतापर भामह मौन हैं ।१ भोजने दण्डीके लक्षण उदाहरण लेकर उनकी व्याख्या की है ।२ रत्नदर्पणमें इसका अच्छा विवेचन किया गया है३ ।। १४७ ।।
१. यथोपदेशं क्रमशो निर्देशोऽत्र क्रमो मतः । तदपेते विपर्यासादित्याख्यातमपक्रमम् ।। काव्याल० ४।२० विदधानौ किरीटेन्दू श्यामाभ्र-हिम-सच्छवी । रथाङ्गशूले बिभ्राणौ पातां वः शम्भु-शाङ्गिणौ ॥ २१ वि+√धा का अर्थ 'करना' प्रसिद्ध है । भामहने शुद्ध √ धा के अर्थ 'धारण' में प्रयोग किया है । यह विचित्र है । २. सरस्वतीकण्ठाभरण १।११२ : 'यत्नः...क्षणिकज्वरः ।।' 'आद्यन्तौ', 'मध्यम' इति सम्बन्धनिर्ज्ञानहेतोर्विधानान्न शब्दक्रमलङ्घनं दोषः । वक्तुश्च बन्धुत्याग-देशत्यागयोस्तनुत्यागाद् गरीयस्त्वेनाभिमतत्वाद् इत्यर्थक्रमलङ्घनस्यापि गुणत्वम् । ३. रत्नदर्पण १।११२ : क्रमभ्रंशे हि यथाऽभिमतान्वयप्रतीतिप्रत्यूहो दूषकता- बीजम् । तद् यदि कुतश्चिद् विशेषादस्खलितैव प्रतीतिरूपजायते, तदा बीजाभावेन तथाभावो निवर्तत एव । स च विशेषः प्रतिपदमनुक्रमितुं न शक्यत इति 'कोऽपि यत्न' इति सामान्येन प्रतिपादितम् । सोऽयं शब्दक्रम- लङ्घनापवादः । अर्थक्रमलङ्घने तु अभिप्रायविशेषः । तथाहि—'बन्धुत्याग' इत्यादी बन्धुत्याग-तनुत्याग-देशत्यागान् क्रमेणोद्दिश्य तथैवानुदेशोऽप्यर्हति । न तु 'आदिममुद्दिश्य ततोऽन्यस्ततो मध्यम' इति उद्देशानुदेशलक्षणशास्त्र- क्रमभ्रंशजातीयत्वेऽपि सम्बन्धज्ञानहेतुयत्नकरणाददूषणत्वं व्यवस्थाप्यते ।
३।१४८] ५. दोष : (६) शब्दहीन १७५ (६) शब्द-हीनमनालक्ष्य-लक्ष्य-लक्षण पद्धतिः । पद-प्रयोगोऽशिष्टेष्टः, शिष्टेष्टस्तु न दुष्यति ॥ १४८ ॥ (६) उदाहरण और स्वरूपप्रतिपादक शास्त्रका मार्ग जिसमें दृष्टि- गोचर नहीं होता, ऐसा अशिष्टजनोंको अभीष्ट सुबन्त और तिङन्त रूप पदों का प्रयोग शब्दहीन (नामक दोष) होता है । किन्तु (ऐसा शास्त्रप्रतिकूल प्रयोग यदि) शिष्टोंको इष्ट होता है, तो दोष नहीं होता ।। १४८ ।। (६) शब्दहीन दोष—भगवान् भाष्यकारके अनुसार लक्ष्य (उदाहरण) और लक्षण (स्वरूपनिरूपणपरक विधान, सूत्र) दोनों मिलकर व्याकरण शास्त्र' निष्पन्न होता है ।' यों, कोई भी शास्त्र उदाहरण और नियम दोनों को मिलाकर पूर्ण होता है । 'शब्दहीन' दोषके सन्दर्भमें आचार्य दण्डीको 'तक्ष्य-लक्षण'से साध्य शब्द एवं साधक सूत्र वार्तिक आदिमें व्यवस्थित 'व्या- करण शास्त्र' अभीष्ट है । न आलख्या = सम्यग् द्रष्टुं शक्या लक्ष्यलक्षणयोः व्याकरणशास्त्रस्य पद्धतिः मार्गः पाणिन्यादिभिस्तत्तत्सम्प्रदायाचार्यैः यस्य, स अनालक्ष्य लक्ष्य लक्षण-पद्धतिः । अर्थात् शब्दोंका अनुशासन करनेका तत्तत् सम्प्रदायके रूपमें प्रथित मार्गका अनुसरण जिस प्रयोगमें दिखाई नहीं देता है, जो शब्दानुशासनके अनुसार सही नहीं उतरता है, वह शब्दप्रयोग 'अना- लक्ष्य लक्ष्य और लक्षणकी पद्धति वाला' है । यत्नश्चायमेव यद् 'आदि' पदैरूल्लेखः । तानि हि तत्तत्स्थानविशेषगामिन एवं प्रतीतिमुपजनयन्ति । अवश्यं चानेन क्रमेणात्र वक्तुमुचितं, तनुत्या- गस्य, विजातीयताविवक्षया पृथगेव वक्तुमर्हत्वात् । एवं चानुपपत्तिः । लोके बन्धुत्यागापेक्षया शरीरत्यागस्यातिकृच्छ्रत्वेन प्रसिद्धिः । अतश्च 'मध्यम आयतक्लेश, आद्यन्तौ क्षणिकज्वरौ ।।' इति वचनमुचितम् । इति आर्थक्रमभ्रंशः कथं न भवति ? तत्राह 'वक्तुश्च (बन्धुत्यागदेश- त्यागयोस्तनुत्यागाद् गरीयस्त्वेनाभिमतत्वात् । इत्यर्थक्रमलङ्घनस्यापि गुणत्वम् । सरस्वती० १।११२ वृत्तिः)' इति । 'अभिमतत्वाद्' इत्यनेन, अभिप्रायाविशेषोऽपवादहेतुः । 'यथारुचि यथार्थित्वं यथाव्युत्पत्ति भिद्यते । आभासो व्यर्थ एकस्मिन्ननुसन्धानसाधितः' ।। इति न्यायादुपपन्नमेवैतदिति । १. पस्पशाभाष्य, प्रथम आह्निक, वार्तिक १७ : लक्ष्य-लक्षणे व्याकरणम् । लक्ष्यं च लक्षणं चैतत् समुदितं व्याकरणं भवति ।···शब्दो लक्ष्यः । सूत्रं लक्षणम् ।
१७६ काव्यादर्श [३।१४८
इस प्रकारका शास्त्रके द्वारा अननुमोदित पदोंका प्रयोग अनधीतशास्त्र (अशिष्ट) लोग किया करते हैं । अतः व्याकरणके नियमोंका उल्लङ्घन करना उन व्याकरणज्ञानशून्य लोगों (अशिष्टों) को इष्ट होता है । इस प्रकारका व्याकरणविरुद्ध पदप्रयोग शब्दशास्त्रकी दृष्टिसे हीनएवम् अपशब्द के रूपमें होनेके कारण 'शब्दहीन' कहलाता है । इसे 'शब्दच्युत' भी कहा जाता है । व्याकरणसे सिद्ध नहीं होने वाला पदप्रयोग भी शिष्टोंको, शब्दशास्त्रके अनुकूल प्रयोग करने वाले आप्त पुरुषोंको, यदि इष्ट है, वे इसके प्रयोगमें दोष नहीं देखते हैं, तो ऐसा शिष्टानुमोदित प्रयोग दोष नहीं होता । मूर्धन्य ध्वनियोंके दन्त्यी करण, दन्त्य ध्वनियोंके मूर्धन्यविधान, आत्मनेपद-परस्मैपदके प्रयोगमें व्युत्क्रम, देशज शब्द आदि इसी श्रेणीमें आते हैं । इसके अतिरिक्त, व्याकरण मुख्यतया परोक्षवृत्ति शब्दों तक अपना कार्य करता है । अतिपरोक्ष- वृत्ति शब्दोंको मान्यता उसे भी उनके आप्त-गृहीत होनेके कारण देनी पड़ती है । धातुपाठमें ऐसी बहुतसी धातु हैं, जो संस्कृतकी धातुओंसे विकसित हुई हैं । संस्कृतके ध्वनिशास्त्र (वर्णविज्ञान) के अनुसार वे संस्कृतकी प्रकृतिके अनु- कूल नहीं हैं । पर शिष्टेष्ट होनेके कारण उन्हें धातुपाठोंमें समाविष्ट कर लिया गया है । जैसे √घिण्ण्, √घुण्ण् और √घृण्ण् धातु संस्कृत √गृह्ण अङ्गसे विकसित हैं : संस्कृत 'ऋ' का उच्चारण कुछ प्रदेशोंमें इकारश्रुतिसे होता है, तो कुछ प्रदेशोंमें उकारश्रुतिसे¹, महाप्राण ह्' के लोपकी क्षतिपूर्ति अल्पप्राण 'ग्' के 'घ्' के रूपमें उच्चारणसे होती है । (क) अल्पप्राणयोंके इस प्रकार महाप्राणीकरण, (ख) 'ऋ' के रेफातिरिक्त स्वरांशके 'इ' 'उ' के रूपमें उच्चा- रणकी देशज प्रवृत्तियोंसे ये तीन धातु संस्कृत 'गृह्णाति' या 'गृह्णीते' से विक- सित हुई हैं और संस्कृत धातुपाठोंमें ग्रहण कर ली गई हैं ।² यही स्थिति व्या- करणके अन्यविध नियमोंकी है । यह नियमोंका उल्लङ्घन भाषाके विकासकी प्रक्रियामें जब तक तरल रहता है, अभिजात वर्ग द्वारा समादृत नहीं होता है, तब तक इसे 'अशिष्टेष्ट' कहा जाता है, और ये प्रयोग दोषकी कोटिमें आते हैं । जब ये अभिजात वर्गमें प्रवेश कर लेते हैं, तब ये शिष्टोंके चहेते (शिष्टेष्ट) बन जानेके कारण लोकमें और लोकका ही आराधन करने वाले काव्यमें भी स्वीकृत हो जाते हैं । मनस् = मन, = मन् की यात्रा इस प्रकारकी है । 'मन्' १. निरुक्तमीमांसा, पृष्ठ ४३३ देखें । २. पाणिनीय धातुपाठ, भ्वादिगण : घिणि, घुणि, घृणि ग्रहणे । विशेषार्थ सिद्धान्तकौमुदी, भवतोषिणी, भ्वादिगण तथा धातु-सूची देखें ।
३।१२८ ] ५ दोष : (६) शब्दहीन १७७ अवते भवते बाहुर्महीमर्णवशक्वरीम् । महाराजन्नजिज्ञासौ¹ नास्तीत्यासां गिरां रसः ॥ १४६ ॥ हे महाराजन्, आपके लिये बाहु रक्षा कर रहा समुद्ररूपी शक्वरी (कर- घनी) वाली पृथिवीकी । इस वाणिका रस (शब्दगत अनुप्राससे लभ्य मिठास) अजिज्ञासुके प्रति नहीं है ॥ १४६ ॥ उच्चारणमें शिष्टेष्टताको प्राप्त होकर भी अभी लिपिमें स्वीकृत नहीं हुआ है । 'कवि' शब्द 'कव्' बननेकी ओर चल पड़ा है । जो व्याकरणविरुद्ध प्रयोग समाजके किसी वर्गका अङ्ग न बनकर नितान्त वैयक्तिक प्रयोगका विषय हैं, वे तो प्रयोक्ताको उपहासका पात्र बनाने वाला दोष समझे जाते हैं ॥१४८॥ शब्दहीनका उदाहरण—प्रकृत (१४६वें) श्लोकमें कविने 'अवते'में आत्मने- पदका प्रयोग व्याकरणलक्षणविरुद्ध किया है : अव् धातुपाठमें उदात्तेत् पर- स्मैपदी धातुओंमें पठित है ।² यहाँ आत्मनेपदमें दी है । अतः शब्दहीन है । 'भवते'का सम्बन्ध 'बाहुः' सञ्ज्ञापदसे समुचित है, अतः शेष (कारकेतर) सम्बन्धमें षष्ठी होनी चाहिये । चतुर्थीके कारण इसका 'अवते' क्रियापदसे सम्प्रदान सम्बन्ध प्रकट होता है, जो अपेक्षित नहीं है । पुरुषके दो भुजाएँ होनेके कारण 'बाहु'में द्वित्व उचित है । एकवचन शास्त्रविरुद्ध या आप्त- विरुद्ध होनेसे दोष है । 'अर्णवशक्वरीम्'में बहुव्रीहि समास है : अर्णवः शक्वरी मेखला³ यस्याः, ताम् । दीर्घकारान्त स्त्रीलिङ्ग उत्तरपदमें होनेपर समासान्त 'क' (कप्) प्रत्यय शास्त्रसम्मत है ।⁴ 'अर्णवशक्वरीकाम्' होना चाहिये । वह नहीं किया है । अतः शब्दहीन है । 'महांश्चासौ राजा' व्युत्पत्तिसे कर्मधारय तत्पुरुषसे 'महाराज' (अदन्त) शब्द निष्पन्न होता है ।⁵ उसकी सम्बुद्धिमें १. रत्नश्रीज्ञान : 'महाराजन्, न जिज्ञासा नास्तीत्यासां गिरां रसः ॥' इत्यपि पाठः । तत्र 'आसां गिरां रसो नास्तीति ईदृशी जिज्ञासा न विद्यते । हेयत्वादीदृशस्य रसस्य ।' इति व्याख्येयम् । वादिजङ्घालदेव और तरुणवाचस्पतिने इसी पाठकी व्याख्या की है । २. पाणिनीय धातुपाठ, वर्ग १५ : अथावत्यन्ताः परस्मैपदिनः । ३. मेदिनीकोष २७।२२१ : शक्वरी छन्दसो भेदे, नदी-मेखलयोरपि ॥ अवन्तिसुन्दरीकथा, पृष्ठ १५७, पंक्ति १८ : राज्ञी तु 'नानुरूपा तवाकृते- रसावसारा मेखला' इति स्वशक्वरीप्रेषणातिप्रसादेन विन्ध्यसेना- मभ्यानन्दयत् । ४. अष्टाध्यायी ५।४।१५३ : नद्यृतश्च । ५. अष्टाध्यायी ५।४।६१ : राजाऽहःसखिभ्यष्टच् ।
१७८ काव्यादर्श [३।१५० दक्षिणाद्रेरुपसरन् मारुतश्चूतपादपान् । कुरुते ललिताधूतप्रवालाङ्कुरशोभिनः ॥ १५० ॥ दक्षिण पर्वत (मलय) से आता हुआ वायु आम्रवृक्षोंको ललित प्रकार (कोमलता) से थोड़ा-थोड़ा कम्पित कोंपलों और मञ्जरियोंसे शोभायुक्त बना रहा है ॥ १५० ॥ ‘महाराज’ बनता है । अतः यह प्रयोग शब्दहीन है । इस प्रकार यह उदाहरण क्रिया, कारक, सङ्ख्या और समासान्तकी दृष्टिसे आदिसे अन्त तक व्याकरण- शास्त्रसे च्युत होनेके कारण नितान्त दोषयुक्त है । भाषाकी तनिकसी समझ रखने वालोंको भी इससे उद्वेग होगा । अधीतशब्दशास्त्र अथवा शब्दपारावार- वेत्तृचूडामणियोंको होने वाले वैरस्यका तो कहना ही क्या है ! यदि यह कहा जाए कि ‘अवते भवते’ में व्याकरणकी ऐसी-तैसी अनुप्रास के लिए की गई है, तो यह उचित नहीं है । क्योंकि अनुप्रासादि उसे रस प्रदान करेंगे, जो उसे जानना चाहेगा । उद्वेजक होनेके कारण इस प्रकारके काव्यके प्रति सहृदयकी जिज्ञासा ही नहीं होगी, तो रसबोध किसे होगा ? ॥ १४६ ॥ व्याकरणनियमके उल्लङ्घनमें भी निर्दोषताका उदाहरण—प्रकृत (१५०) वें श्लोकमें शतृमें √सृका प्रयोग शास्त्रविरुद्ध है : 'उपधावन्' प्राप्त है । किन्तु शिष्टोंके अनुसार धाव् ‘तीव्र गति’ (दौड़ना) अर्थमें प्रसिद्ध है । अतः यदि वायुकी मन्दगतिकी विवक्षामें √धाव्का प्रयोग न करके √सृ (सरकना, रेंगना, धीरे-धीरे चलना) का प्रयोग किया है, तो यह व्याकरणनियमोल्लङ्घन दोष नहीं होता । अपितु शिष्टजन विवक्षितार्थको आदर देकर इसका अनु- मोदन ही करेंगे ।१ इसी प्रकार 'मारुतः'के क्रियापद 'कुरुते' में प्रयुक्त आत्मनेपद भी तब उचित शास्त्रानुसारी होता, अगर हवा खुदके लिये बहती ।२ पर यह तो अन्य लोगोंके सुखके लिये बह रही है । अतः परस्मैपद शास्त्रानुसारी है । इसी प्रकार 'उपसरन्'के योगमें दक्षिणाद्रिकी अपादानता भी उचित नहीं है । 'उपसरन्'का कर्म यदि कोई उक्त होता, तो अपादानता उचित होती । पर 'दक्षिणाद्रिसे' आनेकी कहनेसे वायुकी सुगन्धिता विवक्षित है । अतः यह प्रयोग शिष्टसम्मत है । रत्नश्रीज्ञानने 'दक्षिणाद्रिको स्पर्श करके' अर्थकी विवक्षामें १. अष्टा० ७।३।७८ : प्रा-घ्रा-ध्मा...सर्ति-शद-सदां...धौ-शीय-सीदाः । २. अष्टा० १।३।१२ : स्वरित-ञितः कर्त्रभिप्राये क्रियाफले ।
३।१५१] ५. दोष : (६) शब्द-हीन अन्य आचार्योंके मतमें १७६ इत्यादि शास्त्रमाहात्म्यदर्शनालसचेतसाम् । अपभाषणवद् भाति, न च सौभाग्यमुज्झति ॥ १५१ ॥ इस प्रकारका प्रयोग शास्त्रके माहात्म्य (प्रभाव अथवा गहराई) के दर्शन में आलस्ययुक्त चित्त वाले लोगोंको अपशब्द (शब्दहीन, व्याकरणविरुद्ध) जैसा प्रतीत होता है । (ऐसा प्रयोग) सौन्दर्यका त्याग नहीं करता (अर्थात् शोभाघातक, दोष नहीं होता) ॥ १५१ ॥ पञ्चमीसे समाधान किया है ।¹ पर जब पञ्चमी शास्त्रानुसार है, तब शब्द- हीन कैसे हुआ ? अतः यह समाधान अनपेक्षित है ॥ १५० ॥ शास्त्रोल्लङ्घनमें भी दोषाभावताकी सङ्गति—विशेष अर्थकी विवक्षासे किये ऐसे शास्त्राननुमोदित प्रयोग शास्त्रकी गम्भीरताको नहीं समझनेवाले, केवल प्राप्तिज्ञ लोगोंको दोष प्रतीत हो सकते हैं । पर काव्यका प्रयोजन अर्थ- को सुचारु रूपमें प्रस्तुत करना होता है। यदि शास्त्रकी किसी बातका उल्लङ्घन उसमें बाधा नहीं पहुँचाता, उससे अर्थकी सौन्दर्यसे प्रस्तुतिमें सुकरता ही आती है, तो वह अप-प्रयोग दोष (शोभाविघातक) नहीं होगा। उदा- हरणार्थ पाणिनिने √सृ को √धौ का आदेशमात्र किया है । पर शिष्टोंने उसका प्रयोग 'वेगित गति'में ही माना है ।² अतः √सृ का शतृमें प्रयोग पाणिनीय शास्त्रके विरुद्ध होते हुए भी मन्दगतिमें शिष्टेष्ट होनेसे दोष नहीं है । काव्यमें दोषता अदोषताका मानदण्ड शोभाका त्याग या आधान है। भरतने इस दोषकी उद्भावना यों की है : अशब्दके योजनसे 'शब्दहीन' दोष समझना चाहिये ।³ 'अशब्द' का तात्पर्य 'शब्दशास्त्रविरुद्ध', या 'शब्द- शास्त्राननुमोदित' है। भामहने इस दोषका निरूपण यों किया है : सूत्रकार १. अत्र किल दक्षिणाद्रेरपसरणे भावात्पञ्चमी न युज्यतेऽपायलक्षणत्वात् तस्याः । उपसरणापेक्षया त्वाधारेण, व्याप्येन वा दक्षिणानिलेन भाव्यम् । ततश्च सप्तमी, द्वितीया वा युज्यते ।···न चैतदेवम्—उपसरणं हि तत आगमनमिति विश्लेषयोगाद् दक्षिणाद्रिमाभृश्योपसरन्निति ल्यब्लोप- लक्षणा पञ्चम्येव युज्यते । २. काशिका ७।३।७८ : सर्तेर्वेगितायां गतौ धावादेशमिच्छन्ति । अन्यत्र 'सरति', 'अनुसरति' इत्येव भवति । ३. शब्द-हीनं च विज्ञेयमशब्दस्य च योजनात् ॥ नाटच० १६।६५
१८० काव्यादर्श [३।१५२ (७) श्लोकेषु नियतस्थानं पदच्छेदं यतिं विदुः । (७) श्लोकोंमें निश्चित स्थानोंमें पदोंके तोड़नेको यति जानते हैं । (पाणिनि आदि), पदकार (पदविच्छेदादिसे सूत्रपाठके व्याख्याता)¹ को इष्ट प्रयोगसे जो भिन्न (विपरीत) होवे, उसे 'शब्दहीन' कहते हैं ।² क्योंकि आप्त श्रोताओंमें उस लक्षणविरुद्ध शब्दकी सिद्धि नहीं है । भामहने इस अन्तिम कथनसे इस दोषके विषयमें आप्त पुरुषोंको भी प्रकारान्तरसे प्रमाणकोटिमें रख लिया है । पर दण्डीके समान निर्भ्रान्त स्पष्ट रूपसे लक्षणविरुद्ध किन्तु आप्तश्रावकसिद्ध (दण्डीके 'शिष्टेष्ट') प्रयोगको निर्दोष नहीं बताया है । इस अंशमें भी दण्डी भामहसे बाजी मार ले गये हैं । अभिनवगुप्तने 'अपशब्द' (शब्दहीन)को दोष ही माना है । पर उनके तर्कसे प्रतीत होता है कि उन्हें 'अपशब्द'से शिष्टों द्वारा अननुमत शास्त्रविरुद्ध प्रयोग अभीष्ट है । उनका कहना है कि अपशब्दसे किसी प्रकारकी अर्थप्रतीति नहीं होती । वह सङ्केत- ग्रहण न होनेसे किसी भी प्रकार भावसम्प्रेषण नहीं कर पाता । अतः अपशब्द दोष ही है ।³ अभिनवगुप्तका यह कथन दण्डीके कथन जितना युक्तियुक्त नहीं है । दण्डी द्वारा प्रस्तुत लक्षणविरुद्ध किन्तु शिष्टेष्ट उदाहरणमें अर्थप्रतीति- विरह नहीं है । वह भामहकी शब्दावलीमें 'आप्तश्रावकासिद्ध' भी नहीं है । अतः उसे दोष कैसे कह सकते हैं ? ।। १५१ ।। (७) यतिभ्रष्ट दोष—'यतिभ्रष्ट' दोष बतानेसे पूर्व आचार्यने यतिका १. पं० युधिष्ठिर मीमांसकने 'पदकार'से महाभाष्यकार पतञ्जलिको लिया है । द्र० संस्कृत व्याकरण शास्त्रका इतिहास, भाग १, पृष्ठ ३३२ । परन्तु महाभाष्य ३।१।१०६, ६।१।२०७ तथा ८।२।१६ में उल्लिखित 'पदकार' के प्रयोगसे विदित होता है कि सूत्रके संहितापाठका पदविच्छेद करने वाले व्याख्यातामात्र 'पदकार'के रूपमें अभीष्ट हैं, व्यक्तिविशेष नहीं । इन स्थलोंपर प्रदीप देखें । अतः यहाँ सूत्रके व्याख्याता वार्तिक-भाष्य- कार इष्ट हो सकते हैं । २. सूत्रकृतपदकारेष्टप्रयोगाद् योऽन्यथा भवेत् । तमाप्त-श्रावकासिद्धेः शब्दहीनं विदुर्यथा ॥ काव्याल० ४।२२ ‘स्फुरत्तडिद्वलयिनो वित्ताम्भोगरीयसः । तेजस्तिरयतः सौरं घनान् पश्य दिवोऽभितः’ ।। २३ ३. अभिनवभारती १६।६४ : अपशब्दस्तु दोष एव । ततः कस्याश्चिदर्थ- प्रतीतेरभावात् । स हि न कांचिद् भाषामनुपतति, सङ्केताभावान्न तमर्थं प्रतिपादयेत् ।
३।१५२] ५ दोष : (७) यतिभ्रष्ट—यतिक स्वरूप १८१ तदपेतं यतिभ्रष्टं श्रवणोद्वे जनं, यथा ॥ १५२ ॥ उससे रहित, कानोंका उद्वेजक यतिभ्रष्ट दोष होता है। जैसे—॥ १५२ ॥ स्वरूप बताया है। आचार्य पिङ्गलने विच्छेदको यति बताया है।¹ श्लोक और तदन्तर्गत पदोंमें विच्छेद, उच्चारणविराम उच्चारणमें सुविधा और लयमें श्रुतिसुख लानेको किया जाता है। भरतने यति अर्थात् विराम के दो प्रकार बताये हैं : (१) छन्दःशास्त्रके नियमोंके अधीन किया जाने वाला (वृत्तपादसमुद्भव) विराम उच्चारण करने वालेके प्राणबलके अनुकूल² उच्चा- रणसुविधाके लिये होता है । अतः उन्होंने इसे 'प्राणवश विराम' कहा है । (२) अभिनयमें रस भावकी सम्यग् अभिव्यक्ति के लिये अर्थके किसी उचित अंशपर विराम 'अर्थवश विराम' होता है । उनकी दृष्टिमें अभिनयकी मुख्यताके कारण प्राणवशा यतिकी अपेक्षा अर्थवशा यति महत्त्वपूर्ण है । पद्यमय काव्यमें उसका महत्त्व नहीं होता । अतः छन्दःशास्त्रमें प्राणवशा यतिका ही विधान किया जाता है। भरतने विरामकी अवधि एक मात्रासे लेकर छह मात्रा तक बताई है।³ १. छन्दःशास्त्रे ६।१ : यतिर्विच्छेदः । नाट्यशास्त्रमें विराम (१७।१३० गद्यके बाद) भी देखें । २. इदमत्रावगन्तव्यमवधानविवर्जितः । यावन्ति शक्नुयाद्वक्तुमप्राणन्नेव मानवः ।। वेङ्कट, ऋग्भा ६।८।१।२१ तावद्भिरक्षरैरर्थः प्रायेण प्रतिपाद्यते । २२ ३. ये विरामाः स्मृता वृत्ते तेष्वलङ्कार* इष्यते । समाप्तेऽर्थे पदे वाऽपि, तथा प्राणवशेन वा ।। नाटच० १७।१३८ कार्यों विरामः पादान्ते, तथा प्राणवशेन वा । शेषमर्थवशेनैव विरामं संप्रयोजयेत् ।। १३६ कलाकालप्रमाणेण पाठ्यं कार्यं प्रयोक्तृभिः ।। १४१ शेषाणामर्थयोगेन विरामे विरमेदिह । एकद्वित्रिचतुष्पञ्चषट्कलं च विलम्बितम् ।। १४२ अथवा कारणोपेतं प्रयोगं कार्यमेव च । समीक्ष्य वृत्ते कर्तव्यो विरामो रसभावतः ।। १४४ ये विरामाः स्मृताः पाठ्ये वृत्तपादसमुद्भवाः । उत्क्रम्यापि क्रमं तज्ज्ञैः कार्यास्ते स्यू रसानुगाः ।। १४५ *उच्चो दीप्तश्च मन्द्रश्च नीचो द्रुतविलम्बितौ । पाठ्यस्यैते ह्यलङ्कारा लक्षणं च निबोधत ।। ११२
१८२ काव्यादर्श [३।१५२ सबसे स्थूल विराम तो होता है श्लोकार्धमें । उससे कम स्थूल होता है पादान्तमें ।¹ उससे सूक्ष्म विराम पादकी लम्बाईके अनुसार अपेक्षित उच्चा- रणसुविधाके लिये एक बार या दो बार लयमें सौन्दर्य जैसे भी आए, वैसे किया जाता है। पादमें यह विच्छेद पदोंके छेदके रूपमें होता है, क्योंकि पाद पदसमुदाय ही होता है । पदोंका यह छेद लम्बे छन्दमें आवश्यकताके अनुसार निश्चित स्थानपर, निश्चित अक्षरसंख्यापर, विहित है । निश्चित स्थानपर भी पदच्छेदके कुछ नियम हैं । शिष्यबुद्धिवैशद्यार्थ वे सङ्क्षेपसे प्रस्तुत किये जा रहे हैं । विस्तारार्थ छन्दःशास्त्रकी हलायुधकी मृतसञ्जीवनी तथा अन्य छन्दोविषयक ग्रन्थ देखें । (१) विच्छेद (i) व्यक्त विभक्ति वाले पदपर या (ii) समासमें अव्यक्त विभक्ति वाले पदपर होना चाहिये ।² (२) पूर्वापर वर्णोंके एक वर्ण न होनेपर पदके मध्यमें भी यति हो सकती है । पदका यह मध्य तोड़नेपर श्रवणोंको कटु न लगे, यह अपेक्षित है । द्वयक्षर एवं त्र्यक्षर पदके मध्यमें यति नहीं करनी चाहिये । चतुरक्षर पदमें दो अक्षरोंके बाद उचित है । पदमध्ययति पादान्तमें नहीं होनी चाहिये ।³ (३) स्वरोंकी एकादेश सन्धिमें आदेशोपनत स्वरको कभी पूर्वशब्दका अन्तवत् माना जाता है । जैसे 'दिक्कालाद्य- नवच्छिन्नानन्त०' (नीतिशतक १), 'तदा सर्वज्ञोऽस्मीत्यभवदवलिप्तं मम मनः (वही ८) । कभी परशब्दका आदिवत् माना जाता है । जैसे 'स्कन्धे विन्ध्याद्रिबुद्ध्या निकषति महिष, स्याहितोऽसूनहार्षीत् । एकादेश सन्धिमें भी यह बात ध्यानमें रखें कि आदेशके अनन्तर पूर्व या पश्चात् एकाक्षर न रहे । जैसे—अस्या वक्त्राब्जमवजितपूर्णेन्दुशोभं विभाति ।⁴ (४) यणादेश सन्धिमें यणादेश परवर्ती पदका आदिवत् होता है ।⁵ जैसे शौर्ये वैरिणि वज्रमाशु निपतत्वर्थोऽस्ति नः केवलम् (नीतिशतक ३६) । (५) च, वा, ह, तु १. यतिः सर्वत्र पादान्ते, श्लोकार्थे तु विशेषतः । हलायुधटीका ६।१ २. समुद्रादिपदान्ते च व्यक्ताव्यक्तविभक्तिके । हलायुध ६।१ ३. क्वचित्तु पदमध्येऽपि समुद्रादौ यतिर्भवेत् । यदि पूर्वापरौ भागौ न स्यातामेकवर्णकौ ।। पदमध्ये यतिः पादान्ते मा भूत् । हलायुध ६।१ ४. पूर्वान्तवत् स्वरः सन्धौ, क्वचिदेव परादिवत् । हलायुध ६।१ ५. द्रष्टव्यो यतिचिन्तायां यणादेशः परादिवत् । हलायुध ६।१
३।१५३] ५ दोष : (७) यतिभ्रष्ट १८३ 'स्त्रीणां सङ्गीत, विधिमयम| दित्यवंशयो नरेन्द्रः, 'यह सूर्यवंशी राजा यहाँ शिष्टजनोंके साथ स्त्रियोंके क्लेश (कष्ट) के आदि निपातोंसे पूर्व यति नहीं होती, क्योंकि इनका सम्बन्ध हमेशा पूर्ववर्ती पदसे होता है । ‘स्वादु स्वच्छं, च हिमसलिलं प्रीतये कस्य न स्यात् ?’ में ‘च’ से पूर्व यति उचित नहीं है । ‘प्रत्यादेशादपि च, मधुनो विस्मृतभ्रूविलासम्’ (मेघदूत २।२८) में ‘च’ के बाद यति है, वह उचित है । (५) प्र, परा आदि जब उपसर्गके रूपमें प्रयुक्त होते हैं, तब उनका सम्बन्ध परवर्ती पदसे होता है, इस लिये इनके पश्चात् यति नहीं करनी चाहिये । किन्तु यदि ये कर्म- प्रवचनीयके रूपमें प्रयुक्त हैं, तो इनके पश्चात् यति की जा सकती है ।१ जैसे ‘दुःखं मे प्र, क्षिपति हृदये दुस्सहस्त्वद्वियोगः’में प्रपर यति उचित नहीं है । किन्तु ‘द्वारारूढप्रमोवं हसितमिव परिस्पष्टमासां सखीभिः ।' में परि के पश्चात् यति उचित है ।२ इस प्रकार विहित यतिका भङ्ग होनेपर काव्य श्रुतिकटु हो जाता है । अतः उद्वेगकर होनेके कारण यह दोष होता है ।। १५२ ।। यतिभ्रष्ट दोषका उदाहरण—अगले (१५३वें) श्लोकके पूर्वार्धमें आचार्य ने 'यतिभ्रष्ट' दोषका उदाहरण कतिपय यतिभङ्गोंसे प्रदर्शित किया है । यह श्लोक मन्दाक्रान्ता छन्दमें निबद्ध है । उसके पादमें चौथे, दसवें और सत्रहवें १. नित्यं प्राक्पदसम्बन्धाश्चादयः प्राक्पदान्तवत् । परेण नित्यसम्बन्धाः प्रादयश्च पदादिवत् ।। हलायुधटीका ६।१ २. पादान्त एव केचिच्च पादमध्येऽपि केचन । यतिं वदन्ति; तत्रापि विशेषः स्फुटमुच्यते ।। मन्दारमरन्द, शेषबिन्दु (i) धातुनामस्वभिन्नेषु यतिर्भवति, नान्यथा । (ii) उपसर्गन्तितश्छेदः, (iii) प्रत्ययादौ तयोः क्वचित् ।। (iv) स्वरसन्धौ तु सम्प्राप्तसौन्दर्याद्यतिरिच्यते । (v) तु, चादयो न प्रयोज्या विच्छेदात् परतस्तथा ।। (vi) प्रत्ययादौ यतिर्नाम्नां षष्ठचामेवेति केचन* ।। स्वरसन्धिक्कृते प्रायो, धातुभेदे तदिष्यते । नामभेदे च शेषेषु न दोष इति सूरयः ।। तरुणवाचस्पति द्वारा उद्धृत यह विवरण वामनके कथन (काव्या- लङ्कारसूत्र २।२।४) का सङ्क्षेप है । *जैसे ‘न तव बलमनङ्गस्यापि वा दुःखभाजो’ । आश्चर्यचूड़ामणि ५।६
१८४ काव्यादर्श [३।१५३-१५४ पश्यत्यक्लिष्, टरसमिह शिष्, टंरमेत्यादि दुष्टम् । 'कार्याकार्या, ण्ययमविक्ला, न्यागमेनैव पश्यन् वश्यामुर्वी, वहति नृप इ, त्यस्ति चैवं प्रयोगः' ॥ १५३ ॥ लुप्ते पदान्ते शिष्टस्य पदत्वं निश्चितं यथा । विपरीत सुखकारी रससे युक्त सङ्गीतके अनुष्ठानको देख रहा है ।' इस तरह का प्रयोग दोषयुक्त है । 'समस्त कार्यों और अकार्योंको शास्त्र (रूपी आँख) के द्वारा ही देखता हुआ यह राजा अपने बसमें आई हुई पृथ्वीका पालन करता है।' इस प्रकारका यह (उचित) प्रयोग है ॥ १५३ ॥ पदके अन्तमें (विभक्तिका) लोप होनेपर शेष अंशकी पदस्वरूपता जैसे अक्षरपर यति होती है ।' प्रकृत श्लोकके प्रथम पादमें चौथा अक्षर 'सङ्गीत' पदका मध्यम वर्ण 'ङ्गी' है, तो दसवाँ अक्षर 'आदित्य'का आदिम वर्ण 'भा' है । प्रथम यतिमें यतिके दोनों ओर एकेक अक्षर रहता है । तथा द्वितीय यतिमें यति वाला वर्ण एकाक्षर भाग है । अतः यह यति द्वितीय यतिनियमके विरुद्ध अनुचित प्रकारसे है । इस लिये प्रथम पादमें दो बार यतिभङ्ग लयमें बाधक है । अतः दोष है । इसी प्रकार द्वितीय पादमें चतुर्थ अक्षर 'अक्लिष्ट' का मध्यम अक्षर 'क्लिष्' है । दशम अक्षर 'शिष्ट'के प्रथम वर्ण 'शिष्'के पश्चात् यति प्राप्त है । दोनोंमें ही उभयतः एकेक अक्षर शेष रहनेके कारण उचित यति नहीं है । अतः यह पाद भी द्वितीय यतिनियमके अनुसार सदोष है । उचित यतिका उदाहरण— मन्दाक्रान्ता छन्दमें निबद्ध १५३वें श्लोकके उत्तरार्धमें कविने पदके मध्यमें उचित विच्छेदका उदाहरण प्रस्तुत किया है । 'कार्याकार्या, ण्ययमविक्ला, न्या'में 'चौथे 'र्या' और दसवें 'ला' पर यति पदके मध्यमें ही है । यहाँ पूर्वापर पद यण् सन्धिसे जुड़े हुए हैं । सन्धिज यण् (य्) चतुर्थ यतिनियमके अनुसार परवर्ती पदका आदिम अवयव हो गया है । अतः यहाँ यति पदमध्यमें न मानी जाकर पदान्तमें ही मानी जायेगी । उच्चारणमें भी यह यति वैरस्यकारक नहीं है । चतुर्थ पादमें चौथे अक्षरपर यति पदान्तमें होनेके कारण उचित है । दसवें अक्षर 'इत्यस्ति' के 'इ' पर भी यण्सन्धिके परादिवद्भावसे पदान्तपर ही है । अतः निर्दोष है ॥ १५३ ॥ पदमध्यमें विरामके अदोषत्वकी सङ्गति— आचार्यने यतिभ्रंश दोषका कारण पदपर विच्छेद बताया है । पर उत्तरार्धमें उदाहरण दिये हैं पदमध्यमें १. मन्दाक्रान्ता म्भौ न्तौ त्गौ ग् समुद्रर्तुस्वराः । छन्दःशास्त्र ७।१६