काव्यादर्श (महाकवि दण्डी - प्रसादिनी सान्वय हिन्दी व्याख्या सहित)
Kavyadarsha of Mahakavi Dandin with Prasadini Commentary
महाकवि दण्डी द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें२७४ काव्यादर्श [३।१४७
इनमें पहली और तीसरी चीजको अलग करके क्रमभङ्ग किया गया है । इन दोनों आदिम पदार्थ बन्धुत्याग और अन्तिम पदार्थ देशत्यागका सम्बन्ध आयत अथवा अयत क्लेशसे युक्त होनेके साथ करनेको पृथक् यत्न इनका कथन करके किया गया है । ऐसा करनेसे क्रमभङ्ग अवश्य हुआ है । पर इससे भग्नक्रम पदार्थोंकी तनुत्यागसे विशिष्टता अतिरिक्त रूपसे केवल क्रमभङ्गके कारण ही प्रकट होती है । तीन पदार्थोंमेंसे दोषका सम्बन्ध 'आयत- क्लेश' विशेषणमें और देशत्यागका सम्बन्ध 'क्षणिकज्वरत्व' से करनेमें यहाँ विशेष यत्न है । अतः यह क्रमभङ्ग दोष नहीं है, अपितु गुण है । यह दोष नाट्यशास्त्रमें नहीं है । भामहने अपक्रमका दण्ड्युक्त स्वरूप लक्षणोदाहरण मात्रसे शब्दभेदसे प्रस्तुत किया है । अपक्रमकी अदोषतापर भामह मौन हैं ।१ भोजने दण्डीके लक्षण उदाहरण लेकर उनकी व्याख्या की है ।२ रत्नदर्पणमें इसका अच्छा विवेचन किया गया है३ ।। १४७ ।।
१. यथोपदेशं क्रमशो निर्देशोऽत्र क्रमो मतः । तदपेते विपर्यासादित्याख्यातमपक्रमम् ।। काव्याल० ४।२० विदधानौ किरीटेन्दू श्यामाभ्र-हिम-सच्छवी । रथाङ्गशूले बिभ्राणौ पातां वः शम्भु-शाङ्गिणौ ॥ २१ वि+√धा का अर्थ 'करना' प्रसिद्ध है । भामहने शुद्ध √ धा के अर्थ 'धारण' में प्रयोग किया है । यह विचित्र है । २. सरस्वतीकण्ठाभरण १।११२ : 'यत्नः...क्षणिकज्वरः ।।' 'आद्यन्तौ', 'मध्यम' इति सम्बन्धनिर्ज्ञानहेतोर्विधानान्न शब्दक्रमलङ्घनं दोषः । वक्तुश्च बन्धुत्याग-देशत्यागयोस्तनुत्यागाद् गरीयस्त्वेनाभिमतत्वाद् इत्यर्थक्रमलङ्घनस्यापि गुणत्वम् । ३. रत्नदर्पण १।११२ : क्रमभ्रंशे हि यथाऽभिमतान्वयप्रतीतिप्रत्यूहो दूषकता- बीजम् । तद् यदि कुतश्चिद् विशेषादस्खलितैव प्रतीतिरूपजायते, तदा बीजाभावेन तथाभावो निवर्तत एव । स च विशेषः प्रतिपदमनुक्रमितुं न शक्यत इति 'कोऽपि यत्न' इति सामान्येन प्रतिपादितम् । सोऽयं शब्दक्रम- लङ्घनापवादः । अर्थक्रमलङ्घने तु अभिप्रायविशेषः । तथाहि—'बन्धुत्याग' इत्यादी बन्धुत्याग-तनुत्याग-देशत्यागान् क्रमेणोद्दिश्य तथैवानुदेशोऽप्यर्हति । न तु 'आदिममुद्दिश्य ततोऽन्यस्ततो मध्यम' इति उद्देशानुदेशलक्षणशास्त्र- क्रमभ्रंशजातीयत्वेऽपि सम्बन्धज्ञानहेतुयत्नकरणाददूषणत्वं व्यवस्थाप्यते ।