काव्यादर्श (महाकवि दण्डी - प्रसादिनी सान्वय हिन्दी व्याख्या सहित)
Kavyadarsha of Mahakavi Dandin with Prasadini Commentary
महाकवि दण्डी द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें३।१४६-१४७] ५. दोष : (५) अपक्रमकी अदोषता १७३ यत्नः सम्बन्ध-¹विज्ञान-हेतुः कोऽपि कृतो यदि । क्रमलङ्घनम्प्याहुर्न दोषं सूरयो, यथा ॥ १४६ ॥ बन्धुत्यागस्तनुत्यागो देशत्याग इति त्रिषु । आद्यन्तावायतक्लेशौ, मध्यमः क्षणिकज्वरः ॥ १४७ ॥ (उद्दिष्ट और अनुदिष्टमें) सम्बन्ध (अन्वय) के विशिष्ट ज्ञान (अथवा निर्बाध ज्ञान) में कोई (शाब्द अथवा आर्थ) यत्न किया गया हो, तो क्रमके उल्लङ्घनको भी बुद्धिमान् लोग दोष नहीं कहते । जैसे—॥ १४६ ॥ (क) भाईबन्द मित्र आदिका त्याग, (ख) शरीरका त्याग (मृत्यु), (ग) देशत्याग (देशनिकाला) इन तीनोंमें पहला (बन्धुत्याग) और अन्तिम (देशत्याग) दीर्घ अथवा अनियन्त्रित कष्ट देने वाले हैं। बीच वाला (तनुत्याग, मरण) क्षणिक पीड़ा है ॥ १४७ ॥ का कथन उसी क्रममें नहीं किया है : (क) स्थितिके कर्ता देवता नारायणको आदिमें न कहकर मध्यमें कहा है, (ख) निर्माणकर्ता ब्रह्माका कथन मध्यमें न करके अन्त (ग) में किया है और (ग) संहारकर्ता शम्भुको अनुदेशके आदि (क) में रखा है। इस प्रकार यहाँ क्रमभङ्ग होनेसे 'अपक्रम' दोष है । इसके अतिरिक्त उद्देशमें भी युक्तियुक्त क्रम (क) निर्माण, (ख) स्थिति और (ग) संहारको भङ्ग करके दिया गया है। इससे आचार्य काव्यमें उक्त (शब्द से उपात्त) क्रम ही नहीं, अपितु लोकमें औचित्यलभ्य, न्यायोपात्त क्रमके भङ्गको भी अपक्रम समझते हैं, यह आशय प्रकट होता है ॥ १४५ ॥ अपक्रम अनित्य दोष है—उद्दिष्ट और अनुदिष्टमें क्रमकी दृष्टिसे एकता होनेपर अन्वयप्रतीतिमें बाधा नहीं होती । इससे अर्थप्रतीति समीचीनतया हो जाती है । क्रमभङ्गसे उनमें सम्बन्धके भङ्ग होनेसे अन्वितार्थकी प्रतीति नहीं होती । किन्तु इस सम्बन्धका ज्ञान यदि किसी पृथक् प्रयत्न (अलग कथन) से करा दिया जाता है, तो अन्वयप्रतीतिमें क्रमभङ्ग करनेपर भी बाधा नहीं आती और अर्थ सम्यक् एवं निर्बाध रूपसे तो प्रतीत होता ही है, भग्नक्रम पदार्थोंके ज्ञानमें भी कुछ विशिष्टता आ जाती है। अर्थात् इस प्रकारका क्रमभङ्ग यथाक्रम कथनकी अपेक्षा अतिरिक्त शोभाका जनक हो जाता है । इसलिये विद्वान् लोग ऐसे अपक्रमको दोष नहीं मानते ॥ १४६ ॥ अपक्रमकी अदोषताका उदाहरण—१४७वें श्लोकमें पूर्वार्धमें (क) बन्धुत्याग, (ख) तनुत्याग और (ग) देशत्याग ये तीन चीजें बताई हैं। फिर १. सरस्वतीकण्ठाभरण १।१।२ में 'निर्ज्ञान' पाठ है । रत्नश्रीमें इसे पाठान्तर बताया है। रत्नश्रीमें 'यत्नसम्बन्ध०' पाठ इष्ट प्रतीत होता है ।