काव्यादर्श (महाकवि दण्डी - प्रसादिनी सान्वय हिन्दी व्याख्या सहित)
Kavyadarsha of Mahakavi Dandin with Prasadini Commentary
महाकवि दण्डी द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें१७२ काव्यादर्श [३।१४४-१४५ (५) उद्देशानुगुणोऽर्थानामनुद्देशो न चेत् कृतः । अपक्रमाभिधानं तं दोषमाचक्षते बुधाः१ ॥ १४४ ॥ स्थिति-निर्माण-संहार-हेतवो जगतामजाः । शम्भु-नारायणाम्भोजयोनयः पालयन्तु वः ॥ १४५ ॥ (५) पदार्थोंका अनुकथन यदि उद्देश (पूर्व कथन) के अनुसार नहीं किया गया है, तो विद्वान् लोग उसे अपक्रम नामक दोष कहते हैं ॥ १४४ ॥ लोकोंकी (क) स्थिति (पालन), (ख) सृष्टि एवं (ग) संहार जिनके कारण होते हैं, वे अजन्मा (क) शिव, (ख) विष्णु एवं (ग) कमलयोनि (ब्रह्मा) तुम्हारी रक्षा करें ॥ १४५ ॥ वहाँ चतुर्थ पादमें संशयनिवारण किया गया है ।२ यह दोष भरतके दस दोषोंमें नहीं है । भामहने संशय ज्ञानका शास्त्रीय स्वरूप बताकर यह कहा है कि वाक्यका प्रयोग निश्चत ज्ञानके लिये इष्ट होता है, जिसमे कि श्रोता झूलता न रहे । उन्होंने ससंशयकी अलङ्कारताके विषयमें कुछ नहीं कहा है ॥ १४३ ॥ (५) अपक्रम दोष--काव्योंमें कई पदार्थोंका परिगणन जिस क्रममें किया गया है, उनका अनुदेश (बादमें प्रतिपादन) यदि उसी क्रममें न किया जाये, पूर्वोक्त क्रमको तोड़कर किया जाये, तो वह अपक्रम (क्रमभङ्ग) नामक दोष होता है । पाणिनिके अनुसार उद्दिष्टोंका अनुदेश उद्देशकी सङ्ख्याके अनुसार होना चाहिये ।३ यह नियम काव्यमें भी पालनीय होता है । इसका भङ्ग करनेपर काव्य सदोष हो जाता है ॥ १४४ ॥ उदाहरण—प्रकृत (१४५वें) श्लोकमें कविने पूर्वार्धमें तीन देवताओंके तीन कार्योंका वर्णन जिस क्रमसे किया है, उत्तरार्धमें उनके सम्बन्धी देवताओं १. रत्नश्रीमें 'बुधा:' की व्याख्या नहीं की है, 'यथा' की की है, 'आचक्षते' के कर्ताके रूपमें 'कवय:' का अध्याहार किया है : अपक्रमं नाम दोषं तं यथोक्तमाचक्षते कथयन्ति कवयः । 'यथा' इत्युदाहरति । २. राजा—बलवदसुस्थशरीरा शकुन्तला दृश्यते । (सवितर्कम्) तत् किमयं- मातपदोषः स्याद्, उत यथा मे मनसि वर्तते ? अथवा कृतं सन्देहेन स्तनन्यस्तोशीरं शिथिलितमृणालैकवलयं, प्रियायाः साबाधं किमपि कमनीयं वपुरिदम् । समस्तापः कामं, मनसिजनिदाघप्रसरयोर् न तु ग्रीष्मस्यैवं सुभगमपराधं युवतिषु ॥ ३. अष्टा० १।३।१० : यथासङ्ख्यमनुदेशः समानाम् ।