भारतकोश
काव्यादर्श (महाकवि दण्डी - प्रसादिनी सान्वय हिन्दी व्याख्या सहित)

काव्यादर्श (महाकवि दण्डी - प्रसादिनी सान्वय हिन्दी व्याख्या सहित)

Kavyadarsha of Mahakavi Dandin with Prasadini Commentary

महाकवि दण्डी द्वारा

DevanagariHindipublished270 पृष्ठ

पृष्ठ 194, कुल 270 में से

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पृष्ठ 194

३।१४२-१४३ ] ५. दोष : (४) संशयकी अदोषता १७१ पश्याम्यनङ्गजातङ्कलङ्घितां तामनिन्दिताम् । कालेनैव कठोरेण ग्रस्तां किं नस्त्वदाशया ॥ १४२ ॥ कामार्त्ता, घर्मतप्ता वेत्यनिश्चयकरं वचः । युवानमाकुलीकर्तुमिति दूत्याह नर्मणा ॥ १४३ ॥ उस अनिन्दित सुन्दरी अनङ्गज (क. अनङ्ग = कामसे जन्य, ख. न अङ्गज) आतङ्क (क. पीडा, कामबाधा, ख. सन्ताप, गर्मी) से लङ्घित कठोर (भीषण) काल (क. मृत्यु, ख. ग्रीष्मकाल) से ही ग्रस्त देख रहा हूँ । तुम्हारे आशा (बाँधने) से हमें क्या लेना है ? ॥ १४२ ॥ (वर्ण्य बाला क.) कामपीडित है, या (ख) गरमीसे सन्तप्त है, यह निश्चय नहीं करने वाला वचन दूती युवक (प्रेमी) को व्याकुल करनेको प्रणयपरिहासमें कहती है ॥ १४३ ॥ ससंशयकी अलङ्कारताका उदाहरण—प्रकृत (१४२वें) श्लोकमें किसी सुन्दरीकी कष्टावस्थाका वर्णन किया है । इससे प्रकट होता है कि वह सुन्दरी (क) कामबाधासे पीडित है, या (ख) उसे गर्मी लग गई है, यह निश्चित नहीं हो पा रहा । यहाँ 'अनङ्गज' के दो अर्थ हैं : (क) अनङ्गसे होने वाला है, (ख) जो अङ्गज (कामका) नहीं है, कामेतर कारणसे है, इसी प्रकार 'काल' शब्दके भी दो अर्थ हैं : (क) मृत्यु, कामपीडाकी अन्तिम अवस्था, (ख) ग्रीष्म समय । 'आतङ्क' और 'कठोर' शब्द दोनों स्थितियोंमें अनुकूल हैं : (क) वह कामबाधाकी उस अन्तिम स्थितिको पहुँच गई है, और तुम अब भी अगर उसके जीनेकी आस लगाये बैठे हो, तो नादान प्रेमी, हम क्या कहें; (ख) वह ग्रीष्मबाधासे पीडित है, कामबाधासे नहीं, और तुम इसे अगर प्रेमबाधा समझकर उसका प्यार पानेकी आस लगाये बैठे हो, तो हम क्या करें ! इस प्रकार यहाँ दोनों अर्थ विवक्षित होनेसे संशय विवक्षित है । इस लिये दोष नहीं है, अपितु 'ससंशय' अलङ्कार है ॥ १४२ ॥ उदाहरणकी सङ्गति—किसी दूती (रमणीका सन्देश लेकर उसके प्रियके पास गई उसकी सखी आदि) रमणीके प्रेममें व्याकुल प्रियको और व्याकुल करनेको (क) 'वह उमके प्रेममें व्याकुल है,' या (ख) 'लू लगनेसे उसकी वैसी हालत हो गई है', यह निश्चय न करने वाले, संशययुक्त, शब्दोंमें कह रही है । अतः संशयके विवक्षित होनेसे यहाँ 'ससंशय' अलङ्कार है । कामबाधा और ग्रीष्मबाधाकी समानताके लिये शाकुन्तल (३।७) देखें ।

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