भारतकोश
काव्यादर्श (महाकवि दण्डी - प्रसादिनी सान्वय हिन्दी व्याख्या सहित)

काव्यादर्श (महाकवि दण्डी - प्रसादिनी सान्वय हिन्दी व्याख्या सहित)

Kavyadarsha of Mahakavi Dandin with Prasadini Commentary

महाकवि दण्डी द्वारा

DevanagariHindipublished270 पृष्ठ

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पृष्ठ 193

१७० काव्यादर्श [३।१४१ ईदृशं संशयायैव यदि जातु प्रयुज्यते । स्यादलङ्कार एवासौ, न दोषस्तत्र, तद् यथा ॥ १४१ ॥ इस प्रकारका (संशययुक्त वचन) अगर संशयके लिये ही कभी प्रयोगमें लाया जाता है, तब वह अलङ्कार ही होगा । उस (कथन)में दोष नहीं है । जैसे—॥ १४१ ॥ माता आराद् होनेसे उसकी इस चेष्टाको नहीं देख सकती, या माँ निकट (आरात्) होनेके कारण वह रमणी अपने प्रियको नहीं देख सकेगी, माँ जो देख रही है । यहाँ सखीने यह विवरण दिया तो था निश्चय करनेको, पर उससे ही उत्पन्न हो रहा है संशय । क्यों कि 'आरात्' पद 'दूर' और 'निकट' दोनों अर्थोंका वाचक है ।¹ श्लोकके पूर्वार्धमें भी 'मनोरथप्रिय' शब्द 'अभीष्ट' अर्थमें हो सकता है : आलोक = प्रकाश घरसे बाहरके प्रति रुचिसं, बाहर निकलकर घूमनेके आनन्द या रुचिसे चञ्चल नयनों वाली हे सखि, तुम जा सकती हो; माँ दूर है, तुम्हारा जाना नहीं देख सकती, अथवा माँ नजदीक है, तुम बाहर जाकर नहीं देख सकती²। यहाँ 'असौ' भी परोक्ष और प्रत्यक्ष दोनोंके लिये प्रयुक्त होनेसे निश्चित अर्थका अभिधान नहीं करता ।³ और 'आरात्'के दूर और समीप दोनों अर्थोंसे ठीक अन्वित होता है : (क) 'असौ' (वह प्रिय) दूर है । माँ उसे नहीं देख सकती । तुम झटपट जाकर उससे मिल लो । (ख) यह माँ निकट है । इस लिये तुम ऐसे (मातृदृष्ट प्रिय) को नहीं देख सकती । चुपचाप बैठो । इस प्रकार यहाँ पूर्वार्धका आमन्त्रण वाक्य भी अनिश्चिता- र्थक है । और उत्तरार्धका वाक्य पूर्वार्धके अर्थके विधान या निषेध किसी भी एक अर्थका निर्णय करनेमें समर्थ नहीं है अतः इस कविताके अङ्ग-अङ्गमें संशय छाया हुआ है ॥ १४० ॥ ससंशय अनित्य दोष है—यदि कभी संशयमें पर्यवसित होने वाला वचन निर्णयकी विवक्षासे नहीं, अपितु संशयकी विवक्षासे ही प्रयुक्त होता है, तो वह दोष नहीं होगा । अपितु 'ससंशय' ('ससन्देह') नामक अलङ्कार (२।२६ तथा ३५६) होगा । संशयकी अविवक्षामें यदि संशय आ धमकता है, तो वह अनिष्ट मेहमान दोष ही तो माना जायेगा ! ॥ १४१ ॥ १. अमरकोष ३।३।२४२ : आराद् दूर-समीपयोः । २. रत्नश्री : यद्वा 'मनोरथप्रिय इष्टः आलोकः प्रकाशो बाह्यः । तद्गत- रसलोलेक्षणत्वं न संवृत्तम् । आत्मानमन्तस्तिष्ठन्तं नेच्छसि । किंतु यथेष्टं बहिरालोके भ्रमितुं वाञ्छसि ।' इत्यभिप्रायेणैवमामन्त्रयते । ३. मेदिनीकोष ३२।१५ : अदः परस्मिन्नत्र स्यात् ।