भारतकोश
काव्यादर्श (महाकवि दण्डी - प्रसादिनी सान्वय हिन्दी व्याख्या सहित)

काव्यादर्श (महाकवि दण्डी - प्रसादिनी सान्वय हिन्दी व्याख्या सहित)

Kavyadarsha of Mahakavi Dandin with Prasadini Commentary

महाकवि दण्डी द्वारा

DevanagariHindipublished270 पृष्ठ

पृष्ठ 192, कुल 270 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 192

३।१४०] ५. दोष : (४) संशय १६६ मनोरथप्रियालोकरसलोलेक्षणे सखि । आराद्वृत्तिरसौ माता न क्षमा द्रष्टुमीदृशम् ॥ १४० ॥ मनचीते प्रियको देखनेके आनन्दसे चञ्चल नयनों वाली हे सखि, आराद् विद्यमान वह माँ है। ऐसेको नहीं देख सकती ॥ १४० ॥ अन्य अर्थकी प्रतीति यदि होती है, तो एकाधिक अर्थोंकी प्रतीति करानेके कारण इस प्रकारका अभिधान 'ससंशय' ही तो होगा । इस प्रकार भरतके (४) भिन्नार्थकी द्विविध व्याख्यासे दण्डीके (३) व्यर्थ और (४) संशय दोष विकसित हुए हों, यह हो सकता है। भामहने इस दोषका निरूपण यों किया है : एकाधिक पदार्थोंके समान धर्मोंका शब्दके द्वारा कथन होनेसे और उनमें भेद बताने वाले धर्मोंका कथन न होनेसे जो ज्ञान प्रतिष्ठा (निश्चयकी स्थिति) को न प्राप्त कर सके, ऐसा जो ज्ञान होवे, उसे यहाँ 'ससंशय' जानते हैं।¹ इस ज्ञानको उत्पन्न करने वाले वचनको 'ससंशय' कहते हैं। वाक्यका प्रयोजन निश्चय अभीष्ट होता है, जिससे कि वह झूले नहीं।² जैसे— भूभृत् व्यालोंसे युक्त, दुर्गम, रत्नों वाले, फलोंसे युक्त होते हैं। प्रमादशील लोगोंको उनसे सदा भय होता है।³ इस उदाहरणमें प्रयुक्त सञ्ज्ञापद 'भूभृत्'के दो अर्थ हैं : राजा, पर्वत ।⁴ भूभृत्के लिये जिन विशेषणोंका प्रयोग किया है, वे दोनों अर्थोंपर लागू होते हैं। अतः सामान्यधर्मोंका यहाँ श्रवण है। राजा और पर्वतमें भेद करने वाले विशेषणोंका यहाँ प्रयोग नहीं किया गया है। अतः यह निश्चय नहीं हो पाता कि यहाँ राजा विवक्षित है, या पर्वत । अतः यहाँ ससंशय दोष है ॥ १३६ ॥ ससंशयका उदाहरण—प्रस्तुत (१४०वें) श्लोकमें अपने प्रियतमको देखने के आनन्दसे चञ्चल हुए नयनों वाली अर्थात् प्रियको देखनेका आनन्द उठाने को अत्यन्त आतुर रमणीके प्रति उसकी सखी कहती है कि वो माँ आरात् है। ऐसे को नहीं देख सकती । यहाँ उत्तरार्धसे यह निश्चित नहीं होता कि वह १. श्रुतेः सामान्यधर्माणां, विशेषस्यानुदाहृतेः । अप्रतिष्ठं यदत्रैतज्ज्ञानं तत् 'ससंशय' विदुः ।। काव्याल० ४।१७ २. 'ससंशय'मिति प्राहुस्ततस्तज्जननं वचः । इष्टं निश्चितये वाक्यं, न दोलायेत, तद् यथा ।। काव्याल० ४।१८ ३. व्यालवन्तो, दुरारोहा, रत्नवन्तः, फलान्विताः । विषमा भूभृतस्तेभ्यो भयमाशु प्रमादिनाम् ।। काव्याल० ४।१६ ४. अमर ३।३।६१ : भूभृद् भूमिधरे नृपे । २।३।१ महीध्रे क्ष्माभृदहार्य- धरपर्वताः ।