भारतकोश
काव्यादर्श (महाकवि दण्डी - प्रसादिनी सान्वय हिन्दी व्याख्या सहित)

काव्यादर्श (महाकवि दण्डी - प्रसादिनी सान्वय हिन्दी व्याख्या सहित)

Kavyadarsha of Mahakavi Dandin with Prasadini Commentary

महाकवि दण्डी द्वारा

DevanagariHindipublished270 पृष्ठ

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पृष्ठ 191

१६८ काव्यादर्श [३।१३६ (४) निर्णयार्थं प्रयुक्तानि संशयं जनयन्ति चेत् । वचांसि दोष एवासौ ससंशय इति स्मृतः ॥ १३६ ॥ (४) निर्णयके लिये प्रयुक्त वचन यदि संदेह उत्पन्न करते हैं, तो वह 'ससंशय' नामसे स्मृत दोष ही है ॥ १३६ ॥ शब्दपौनरुक्त्यका होनेसे सङ्क्षेप तो धाराधराधीशने कर दिया, १ परंतु उदाहरणके अर्थसौन्दर्यको धराशायी कर दिया। दोषयुक्तको भी काव्य- सौन्दर्यसे युक्त तो होना चाहिये । रत्नश्रीज्ञानने इस प्रसङ्गमें एक श्लोक उद्धृत किया है : विस्मयमें, विषाद में, क्रोधमें, दीनतामें, निषेधमें, प्रसन्नतामें और हर्षमें एक पदका दो बार कथन होता है२ ॥ १३८ ॥ (४) ससंशय दोष - कोई भी बात कहते समय शब्दोंका प्रयोग होता तो है सन्देहनिवारणके लिये, किन्तु तब भी यदि संदेह ही उत्पन्न होता है, तो वह वचनविन्यास निश्चयके विपरीत एकाधिक अर्थोंका प्रतिपादक होनेसे संशययुक्त होनेके कारण 'ससंशय' कहलाता है । निर्णयार्थम् - प्रकरणके अनुसार काव्यके अर्थका निर्णय = निश्चय जिस का साध्य होनेके कारण अर्थ = प्रयोजन है, वह 'निर्णयार्थ' है । यह पद 'प्रयुक्तानि' में निहित क्रियाका विशेषण है ।३ यह निर्णयकी अपेक्षामें संशय दोषकारक होता है । जिस स्थितिमें दोष नहीं होता, वह स्थिति आगे १४१- १४३ श्लोकोंमें खोलकर बताई है । भरतके दोषोंमें इस प्रकारके दोषकी गणना नहीं है । (४ ख) भिन्नार्थ- की व्याख्यासे कदाचित् यह दोष निकल सकता है : विवक्षित (निर्णयार्थ उक्त) अर्थ यदि अन्य अर्थ (विकल्प) से भेद दिया जाता है, विवक्षित अर्थके साथ १. पदं पदार्थश्चाभिन्नौ यत्र, तत् पुनरुक्तितमत् ॥ सरस्वती० १।२२ 'उत्कानुन्मनयन्त्येते गम्भीराः स्तनयित्नवः । अम्भोघरास्तडित्वन्तो गम्भीराः स्तनयित्नवः' ॥ उदाहरण २८ रत्नदर्पण : सङ्क्षेपार्थं त्वेकमुदाहरणम् । २. विस्मये च विषादे च कोपे दैन्ये च वारणं । प्रसादे चैव हर्षे च पदमेकं द्विरुच्यते ॥ ३. रत्नश्री : निर्णयो= निश्चयः प्रकरणात् काव्यार्थविषयः, संशय-विपर्यास- विरोधी प्रत्ययः, अर्थः = प्रयोजनं साध्यत्वाद् यस्मिन् प्रयोगे इति क्रियाविशेषणम् ।