काव्यादर्श (महाकवि दण्डी - प्रसादिनी सान्वय हिन्दी व्याख्या सहित)
Kavyadarsha of Mahakavi Dandin with Prasadini Commentary
महाकवि दण्डी द्वारा
पृष्ठ 200, कुल 270 में से
संदर्भ में पढ़ें३।१२८ ] ५ दोष : (६) शब्दहीन १७७ अवते भवते बाहुर्महीमर्णवशक्वरीम् । महाराजन्नजिज्ञासौ¹ नास्तीत्यासां गिरां रसः ॥ १४६ ॥ हे महाराजन्, आपके लिये बाहु रक्षा कर रहा समुद्ररूपी शक्वरी (कर- घनी) वाली पृथिवीकी । इस वाणिका रस (शब्दगत अनुप्राससे लभ्य मिठास) अजिज्ञासुके प्रति नहीं है ॥ १४६ ॥ उच्चारणमें शिष्टेष्टताको प्राप्त होकर भी अभी लिपिमें स्वीकृत नहीं हुआ है । 'कवि' शब्द 'कव्' बननेकी ओर चल पड़ा है । जो व्याकरणविरुद्ध प्रयोग समाजके किसी वर्गका अङ्ग न बनकर नितान्त वैयक्तिक प्रयोगका विषय हैं, वे तो प्रयोक्ताको उपहासका पात्र बनाने वाला दोष समझे जाते हैं ॥१४८॥ शब्दहीनका उदाहरण—प्रकृत (१४६वें) श्लोकमें कविने 'अवते'में आत्मने- पदका प्रयोग व्याकरणलक्षणविरुद्ध किया है : अव् धातुपाठमें उदात्तेत् पर- स्मैपदी धातुओंमें पठित है ।² यहाँ आत्मनेपदमें दी है । अतः शब्दहीन है । 'भवते'का सम्बन्ध 'बाहुः' सञ्ज्ञापदसे समुचित है, अतः शेष (कारकेतर) सम्बन्धमें षष्ठी होनी चाहिये । चतुर्थीके कारण इसका 'अवते' क्रियापदसे सम्प्रदान सम्बन्ध प्रकट होता है, जो अपेक्षित नहीं है । पुरुषके दो भुजाएँ होनेके कारण 'बाहु'में द्वित्व उचित है । एकवचन शास्त्रविरुद्ध या आप्त- विरुद्ध होनेसे दोष है । 'अर्णवशक्वरीम्'में बहुव्रीहि समास है : अर्णवः शक्वरी मेखला³ यस्याः, ताम् । दीर्घकारान्त स्त्रीलिङ्ग उत्तरपदमें होनेपर समासान्त 'क' (कप्) प्रत्यय शास्त्रसम्मत है ।⁴ 'अर्णवशक्वरीकाम्' होना चाहिये । वह नहीं किया है । अतः शब्दहीन है । 'महांश्चासौ राजा' व्युत्पत्तिसे कर्मधारय तत्पुरुषसे 'महाराज' (अदन्त) शब्द निष्पन्न होता है ।⁵ उसकी सम्बुद्धिमें १. रत्नश्रीज्ञान : 'महाराजन्, न जिज्ञासा नास्तीत्यासां गिरां रसः ॥' इत्यपि पाठः । तत्र 'आसां गिरां रसो नास्तीति ईदृशी जिज्ञासा न विद्यते । हेयत्वादीदृशस्य रसस्य ।' इति व्याख्येयम् । वादिजङ्घालदेव और तरुणवाचस्पतिने इसी पाठकी व्याख्या की है । २. पाणिनीय धातुपाठ, वर्ग १५ : अथावत्यन्ताः परस्मैपदिनः । ३. मेदिनीकोष २७।२२१ : शक्वरी छन्दसो भेदे, नदी-मेखलयोरपि ॥ अवन्तिसुन्दरीकथा, पृष्ठ १५७, पंक्ति १८ : राज्ञी तु 'नानुरूपा तवाकृते- रसावसारा मेखला' इति स्वशक्वरीप्रेषणातिप्रसादेन विन्ध्यसेना- मभ्यानन्दयत् । ४. अष्टाध्यायी ५।४।१५३ : नद्यृतश्च । ५. अष्टाध्यायी ५।४।६१ : राजाऽहःसखिभ्यष्टच् ।