भारतकोश
काव्यादर्श (महाकवि दण्डी - प्रसादिनी सान्वय हिन्दी व्याख्या सहित)

काव्यादर्श (महाकवि दण्डी - प्रसादिनी सान्वय हिन्दी व्याख्या सहित)

Kavyadarsha of Mahakavi Dandin with Prasadini Commentary

महाकवि दण्डी द्वारा

DevanagariHindipublished270 पृष्ठ

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पृष्ठ 201

१७८ काव्यादर्श [३।१५० दक्षिणाद्रेरुपसरन् मारुतश्चूतपादपान् । कुरुते ललिताधूतप्रवालाङ्कुरशोभिनः ॥ १५० ॥ दक्षिण पर्वत (मलय) से आता हुआ वायु आम्रवृक्षोंको ललित प्रकार (कोमलता) से थोड़ा-थोड़ा कम्पित कोंपलों और मञ्जरियोंसे शोभायुक्त बना रहा है ॥ १५० ॥ ‘महाराज’ बनता है । अतः यह प्रयोग शब्दहीन है । इस प्रकार यह उदाहरण क्रिया, कारक, सङ्ख्या और समासान्तकी दृष्टिसे आदिसे अन्त तक व्याकरण- शास्त्रसे च्युत होनेके कारण नितान्त दोषयुक्त है । भाषाकी तनिकसी समझ रखने वालोंको भी इससे उद्वेग होगा । अधीतशब्दशास्त्र अथवा शब्दपारावार- वेत्तृचूडामणियोंको होने वाले वैरस्यका तो कहना ही क्या है ! यदि यह कहा जाए कि ‘अवते भवते’ में व्याकरणकी ऐसी-तैसी अनुप्रास के लिए की गई है, तो यह उचित नहीं है । क्योंकि अनुप्रासादि उसे रस प्रदान करेंगे, जो उसे जानना चाहेगा । उद्वेजक होनेके कारण इस प्रकारके काव्यके प्रति सहृदयकी जिज्ञासा ही नहीं होगी, तो रसबोध किसे होगा ? ॥ १४६ ॥ व्याकरणनियमके उल्लङ्घनमें भी निर्दोषताका उदाहरण—प्रकृत (१५०) वें श्लोकमें शतृमें √सृका प्रयोग शास्त्रविरुद्ध है : 'उपधावन्' प्राप्त है । किन्तु शिष्टोंके अनुसार धाव् ‘तीव्र गति’ (दौड़ना) अर्थमें प्रसिद्ध है । अतः यदि वायुकी मन्दगतिकी विवक्षामें √धाव्का प्रयोग न करके √सृ (सरकना, रेंगना, धीरे-धीरे चलना) का प्रयोग किया है, तो यह व्याकरणनियमोल्लङ्घन दोष नहीं होता । अपितु शिष्टजन विवक्षितार्थको आदर देकर इसका अनु- मोदन ही करेंगे ।१ इसी प्रकार 'मारुतः'के क्रियापद 'कुरुते' में प्रयुक्त आत्मनेपद भी तब उचित शास्त्रानुसारी होता, अगर हवा खुदके लिये बहती ।२ पर यह तो अन्य लोगोंके सुखके लिये बह रही है । अतः परस्मैपद शास्त्रानुसारी है । इसी प्रकार 'उपसरन्'के योगमें दक्षिणाद्रिकी अपादानता भी उचित नहीं है । 'उपसरन्'का कर्म यदि कोई उक्त होता, तो अपादानता उचित होती । पर 'दक्षिणाद्रिसे' आनेकी कहनेसे वायुकी सुगन्धिता विवक्षित है । अतः यह प्रयोग शिष्टसम्मत है । रत्नश्रीज्ञानने 'दक्षिणाद्रिको स्पर्श करके' अर्थकी विवक्षामें १. अष्टा० ७।३।७८ : प्रा-घ्रा-ध्मा...सर्ति-शद-सदां...धौ-शीय-सीदाः । २. अष्टा० १।३।१२ : स्वरित-ञितः कर्त्रभिप्राये क्रियाफले ।