काव्यादर्श (महाकवि दण्डी - प्रसादिनी सान्वय हिन्दी व्याख्या सहित)
Kavyadarsha of Mahakavi Dandin with Prasadini Commentary
महाकवि दण्डी द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें३।१५१] ५. दोष : (६) शब्द-हीन अन्य आचार्योंके मतमें १७६ इत्यादि शास्त्रमाहात्म्यदर्शनालसचेतसाम् । अपभाषणवद् भाति, न च सौभाग्यमुज्झति ॥ १५१ ॥ इस प्रकारका प्रयोग शास्त्रके माहात्म्य (प्रभाव अथवा गहराई) के दर्शन में आलस्ययुक्त चित्त वाले लोगोंको अपशब्द (शब्दहीन, व्याकरणविरुद्ध) जैसा प्रतीत होता है । (ऐसा प्रयोग) सौन्दर्यका त्याग नहीं करता (अर्थात् शोभाघातक, दोष नहीं होता) ॥ १५१ ॥ पञ्चमीसे समाधान किया है ।¹ पर जब पञ्चमी शास्त्रानुसार है, तब शब्द- हीन कैसे हुआ ? अतः यह समाधान अनपेक्षित है ॥ १५० ॥ शास्त्रोल्लङ्घनमें भी दोषाभावताकी सङ्गति—विशेष अर्थकी विवक्षासे किये ऐसे शास्त्राननुमोदित प्रयोग शास्त्रकी गम्भीरताको नहीं समझनेवाले, केवल प्राप्तिज्ञ लोगोंको दोष प्रतीत हो सकते हैं । पर काव्यका प्रयोजन अर्थ- को सुचारु रूपमें प्रस्तुत करना होता है। यदि शास्त्रकी किसी बातका उल्लङ्घन उसमें बाधा नहीं पहुँचाता, उससे अर्थकी सौन्दर्यसे प्रस्तुतिमें सुकरता ही आती है, तो वह अप-प्रयोग दोष (शोभाविघातक) नहीं होगा। उदा- हरणार्थ पाणिनिने √सृ को √धौ का आदेशमात्र किया है । पर शिष्टोंने उसका प्रयोग 'वेगित गति'में ही माना है ।² अतः √सृ का शतृमें प्रयोग पाणिनीय शास्त्रके विरुद्ध होते हुए भी मन्दगतिमें शिष्टेष्ट होनेसे दोष नहीं है । काव्यमें दोषता अदोषताका मानदण्ड शोभाका त्याग या आधान है। भरतने इस दोषकी उद्भावना यों की है : अशब्दके योजनसे 'शब्दहीन' दोष समझना चाहिये ।³ 'अशब्द' का तात्पर्य 'शब्दशास्त्रविरुद्ध', या 'शब्द- शास्त्राननुमोदित' है। भामहने इस दोषका निरूपण यों किया है : सूत्रकार १. अत्र किल दक्षिणाद्रेरपसरणे भावात्पञ्चमी न युज्यतेऽपायलक्षणत्वात् तस्याः । उपसरणापेक्षया त्वाधारेण, व्याप्येन वा दक्षिणानिलेन भाव्यम् । ततश्च सप्तमी, द्वितीया वा युज्यते ।···न चैतदेवम्—उपसरणं हि तत आगमनमिति विश्लेषयोगाद् दक्षिणाद्रिमाभृश्योपसरन्निति ल्यब्लोप- लक्षणा पञ्चम्येव युज्यते । २. काशिका ७।३।७८ : सर्तेर्वेगितायां गतौ धावादेशमिच्छन्ति । अन्यत्र 'सरति', 'अनुसरति' इत्येव भवति । ३. शब्द-हीनं च विज्ञेयमशब्दस्य च योजनात् ॥ नाटच० १६।६५