भारतकोश
काव्यादर्श (महाकवि दण्डी - प्रसादिनी सान्वय हिन्दी व्याख्या सहित)

काव्यादर्श (महाकवि दण्डी - प्रसादिनी सान्वय हिन्दी व्याख्या सहित)

Kavyadarsha of Mahakavi Dandin with Prasadini Commentary

महाकवि दण्डी द्वारा

DevanagariHindipublished270 पृष्ठ

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पृष्ठ 207

१८४ काव्यादर्श [३।१५३-१५४ पश्यत्यक्लिष्, टरसमिह शिष्, टंरमेत्यादि दुष्टम् । 'कार्याकार्या, ण्ययमविक्ला, न्यागमेनैव पश्यन् वश्यामुर्वी, वहति नृप इ, त्यस्ति चैवं प्रयोगः' ॥ १५३ ॥ लुप्ते पदान्ते शिष्टस्य पदत्वं निश्चितं यथा । विपरीत सुखकारी रससे युक्त सङ्गीतके अनुष्ठानको देख रहा है ।' इस तरह का प्रयोग दोषयुक्त है । 'समस्त कार्यों और अकार्योंको शास्त्र (रूपी आँख) के द्वारा ही देखता हुआ यह राजा अपने बसमें आई हुई पृथ्वीका पालन करता है।' इस प्रकारका यह (उचित) प्रयोग है ॥ १५३ ॥ पदके अन्तमें (विभक्तिका) लोप होनेपर शेष अंशकी पदस्वरूपता जैसे अक्षरपर यति होती है ।' प्रकृत श्लोकके प्रथम पादमें चौथा अक्षर 'सङ्गीत' पदका मध्यम वर्ण 'ङ्गी' है, तो दसवाँ अक्षर 'आदित्य'का आदिम वर्ण 'भा' है । प्रथम यतिमें यतिके दोनों ओर एकेक अक्षर रहता है । तथा द्वितीय यतिमें यति वाला वर्ण एकाक्षर भाग है । अतः यह यति द्वितीय यतिनियमके विरुद्ध अनुचित प्रकारसे है । इस लिये प्रथम पादमें दो बार यतिभङ्ग लयमें बाधक है । अतः दोष है । इसी प्रकार द्वितीय पादमें चतुर्थ अक्षर 'अक्लिष्ट' का मध्यम अक्षर 'क्लिष्' है । दशम अक्षर 'शिष्ट'के प्रथम वर्ण 'शिष्'के पश्चात् यति प्राप्त है । दोनोंमें ही उभयतः एकेक अक्षर शेष रहनेके कारण उचित यति नहीं है । अतः यह पाद भी द्वितीय यतिनियमके अनुसार सदोष है । उचित यतिका उदाहरण— मन्दाक्रान्ता छन्दमें निबद्ध १५३वें श्लोकके उत्तरार्धमें कविने पदके मध्यमें उचित विच्छेदका उदाहरण प्रस्तुत किया है । 'कार्याकार्या, ण्ययमविक्ला, न्या'में 'चौथे 'र्या' और दसवें 'ला' पर यति पदके मध्यमें ही है । यहाँ पूर्वापर पद यण् सन्धिसे जुड़े हुए हैं । सन्धिज यण् (य्) चतुर्थ यतिनियमके अनुसार परवर्ती पदका आदिम अवयव हो गया है । अतः यहाँ यति पदमध्यमें न मानी जाकर पदान्तमें ही मानी जायेगी । उच्चारणमें भी यह यति वैरस्यकारक नहीं है । चतुर्थ पादमें चौथे अक्षरपर यति पदान्तमें होनेके कारण उचित है । दसवें अक्षर 'इत्यस्ति' के 'इ' पर भी यण्सन्धिके परादिवद्भावसे पदान्तपर ही है । अतः निर्दोष है ॥ १५३ ॥ पदमध्यमें विरामके अदोषत्वकी सङ्गति— आचार्यने यतिभ्रंश दोषका कारण पदपर विच्छेद बताया है । पर उत्तरार्धमें उदाहरण दिये हैं पदमध्यमें १. मन्दाक्रान्ता म्भौ न्तौ त्गौ ग् समुद्रर्तुस्वराः । छन्दःशास्त्र ७।१६