भारतकोश
काव्यादर्श (महाकवि दण्डी - प्रसादिनी सान्वय हिन्दी व्याख्या सहित)

काव्यादर्श (महाकवि दण्डी - प्रसादिनी सान्वय हिन्दी व्याख्या सहित)

Kavyadarsha of Mahakavi Dandin with Prasadini Commentary

महाकवि दण्डी द्वारा

DevanagariHindipublished270 पृष्ठ

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पृष्ठ 208

३।१५४] पदमध्यमें विरामके अदोषत्वकी संगति १८५ तथा सन्धिविकारान्तं पदमेवेति गण्यते ॥ १५४ ॥ निश्चित होती है, वैसे ही सन्धिके (कारण होने वाले) विकारोंसे युक्तका अन्त भी पद ही है, यह कहा जाता है ॥ १५४ ॥ विच्छेदके । वहाँ यतिभ्रष्ट दोष कैसे नहीं है ? आचार्यने अगला श्लोक इस शङ्काको दृष्टिमें रखकर दिया है । पाणिनिके अनुसार सुप्-प्रत्ययान्त और तिङ्-प्रत्ययान्त शब्द 'पद' होता है ।१ किन्तु समासमें तथा नामधातुओंमें विभक्तियोंका लोप होनेपर भी अन्तर्वर्तिनी विभक्तिको निमित्त मानकर वहाँ पदत्व माना जाता है । तो, पदके अन्तिम भाग विभक्तिका लोप होनेपर भी जैसे वहाँ पदत्व अव्याहत माना जाता है, वैसे ही पदके अन्त भाग विभक्तिकी परवर्ती पदसे एकादेशरूप या अन्य प्रकारकी यण्, अयादि आदेशके रूपमें सन्धि होनेपर भी विकृत हुए अंशोंके पूर्वान्तवद्भाव या परादिवद्भावसे तथा व्यञ्जनको परवर्ती स्वरसे मिलानेके कारण पराङ्गताके कारण सम्बन्धको रखकर विकारांशसे पूर्ववर्ती या परवर्ती अंशको भी 'पद' मान लिया जाता है ।२ अतः सन्धिविकारोंपर यति होनेसे वह पदमध्यका विच्छेद नहीं, अपितु पदका ही विच्छेद समझा जाता है । इसका सीधा-सा तात्पर्य आचार्य वामनने यह लिया है कि नाम भाग (प्रातिपदिक) और धातु भाग (विकरणान्त अङ्ग) के मध्य यदि विच्छेद होता है, तभी दोष होता है । यह भागविच्छेद यदि स्वरसन्धिके होनेपर होता है, तब दोष नहीं होता ।३ दण्डीने केवल यण्सन्धि होनेपर पदविच्छेदके तीन स्थल प्रकृत उदाहरणमें दिये हैं । एकादेशसन्धि होनेपर पदविच्छेदका उदाहरण नहीं देनेका कारण सम्भवतः यह है कि एकादेश सन्धिमें पदत्व छन्दःशास्त्रकी परम्परामें ही विदित है, व्याकरणमें नहीं । अतः लोकमें अप्रसिद्ध होनेके कारण उसका ही प्रदर्शन आचार्यने किया है ॥ १५४ ॥ १. अष्टा० १।४।१४ : सुप्तिङन्तं पदम् । २. अष्टा० ६।१।८४-८५ : एकः पूर्वपरयोः । अन्तादिवच्च । अज्झीनं परेण संयोज्यम् । पूर्वाङ्ग-पराङ्गताका विवेचन हमारे शीघ्र प्रकाश्य 'शिक्षा- वेदाङ्ग' ग्रन्थमें देखें । ३. काव्यालङ्कारसूत्र २।२।३-४ : विरस-विरामं यतिभ्रष्टम् । तद् धातु- नाम-भाग-भेदे स्वरसन्धयकृते । वृत्ति : 'स्वर-सन्धयकृत' इति वचनात् स्वरसन्धयकृते भेदे न दोषः ।