भारतकोश
काव्यादर्श (महाकवि दण्डी - प्रसादिनी सान्वय हिन्दी व्याख्या सहित)

काव्यादर्श (महाकवि दण्डी - प्रसादिनी सान्वय हिन्दी व्याख्या सहित)

Kavyadarsha of Mahakavi Dandin with Prasadini Commentary

महाकवि दण्डी द्वारा

DevanagariHindipublished270 पृष्ठ

पृष्ठ 209, कुल 270 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 209

१८६ काव्यादर्श [३।१५५ तथापि कटु कर्णानां कवयो न प्रयुञ्जते । ‘ध्वजिनी तस्य राज्ञः केतूदस्तजलदे’त्यदः ॥ १५५ ॥ तब भी कानोंको कडुवा लगने वाला प्रयोग कवि लोग नहीं किया करते । जैसे ‘ध्वजिनी तस्य राज्ञः केतूदस्त-जलदा’१ यह प्रयोग है ॥ १५५ ॥ कर्णकटु पदमध्यविराम वर्जनीय है — आचार्य दण्डीने पदमध्यमें ग्रहणीय यति बतानेके बाद प्रकृत (१५५वें) पद्यमें वर्ज्य पदमध्य यति बताई है ।२ पदमध्यमें भी कवि लोग कानोंको अप्रिय लगे, ऐसी यतिका प्रयोग नहीं करते । ‘कर्णोंको कटु’ कहनेका आशय यतिकी वर्ज्यताका निमित्त श्रुतिकटुत्व- जन्य उद्वेग बताना है । उत्तरार्धमें प्रदत्त उदाहरणके दो पादोंके मध्य अपेक्षित यति द्वितीय (श्लोकके चतुर्थ) पादके आदिम द्वक्षर ‘केतू’ पदके मध्यमें ‘के’ पर पड़ती है । यह सुननेमें अच्छी नहीं लगती । अतः यह यतिदोष है । यह कर्णकटुत्व यहाँ और यतिशेष पदभागके एकवर्णात्मक होनेसे है ।३ भरतने ‘यतिभ्रष्ट’ दोषको पृथक् न मानकर इसे कदाचिद् ‘विषम’ वृत्त- दोष में ही समाहित किया है ।४ छन्दःशास्त्रके पिङ्गल आदि आचार्य यति एवं गणव्यवस्था दोनोंको वृत्तके स्वरूपमें समाहित मानते हैं, यह (क) वृत्ताधिकार में यतिका लक्षण देनेसे तथा (ख) वृत्तोंके लक्षणमें विराम और गणव्यवस्था दोनोंको देनेसे सिद्ध होता है । १. उस राजाकी सेना ध्वजोंसे उत्क्षिप्त मेघों वाली (ऊँचे हाथियों पर लगे होनेसे गगनचुम्बी ध्वजों वाली) है । २. रत्नश्रीज्ञान, वादी जी और तरुणवाचस्पतिने इस श्लोकको सन्धि- विकारान्त पदके भङ्गमें यतिकी वर्जनीयताका उदाहरण बताया है । पर ‘केतु + उदस्त = केतूदस्त’ स्थिति न होनेपर ‘केतुक्षिप्त’ पाठ यदि होता, तो ‘के’ पर यति होती, तो क्या यह यति वर्जनीय न होती ? सन्धिविकारसे निष्पन्न दो पदोंके अन्तवद्भाव और आदिवद्भावसे यदि यति निष्पन्न होती, तो उसे ‘सन्धिविकारान्त श्रवणोद्वेजक यति’ कहा जा सकता था । अतः यहाँ पदमध्यमें वर्ज्य यतिका विवरण मानना ही उचित है । ३. पृष्ठ १८२ में हलायुधका द्वितीय यतिनियम देखें । ४. वृत्तदोषो भवेद् यत्र ‘विषमं’ नाम तद् भवेत् । नाट्यशास्त्र १६।६३ वृत्तरत्नाकर १।१२ ‘यतिर्विच्छेदसञ्ज्ञितः’ पर नारायणभट्ट : भरता- दयस्तु यतिमेव नेच्छन्ति ।

काव्यादर्श (महाकवि दण्डी - प्रसादिनी सान्वय हिन्दी व्याख्या सहित) · पृष्ठ 209, कुल 270 में से · BharatKosha