काव्यादर्श (महाकवि दण्डी - प्रसादिनी सान्वय हिन्दी व्याख्या सहित)
Kavyadarsha of Mahakavi Dandin with Prasadini Commentary
महाकवि दण्डी द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें३।१५५] कर्ण-कटु पदमध्य विराम वर्जनीय है १८७ पिङ्गलने विरामके स्थानोंका तो निर्देश किया है, किन्तु उस स्थानमें भी विच्छेद करनेसे कहीं लय टूटनेसे छन्द दूषित होगा, यह स्पष्टतः नहीं कहा है । प्राचीन छन्दःशास्त्रियोंकी तो यह दृष्टि थी कि एकाधिक अक्षर कम या अधिक होनेसे छन्दस्त्व व्याहत नहीं होता । १ परवर्ती आचार्योंकी यह मान्यता है कि प्राचीन छन्दःशास्त्रमें यतिभङ्ग जैसा कोई दोष नहीं था; यदि था, तो केवल इस रूपमें कि प्रदत्त स्थानपर यति न करके अन्य स्थान पर कर दी जाये, तब यतिभङ्ग होता है । इसलिये अर्वाचीन आचार्योंने यतिके स्थानातिरिक्त नियमोंको वृत्तका अङ्ग नहीं माना । गुरुलघुव्यवस्थाको ही वृत्त माना । २ इस प्रकार यतिके नियम और गुरुलघुव्यवस्था दोनों भिन्न- भिन्न पदार्थ हैं । और इनमें दोष होनेसे क्रमशः यतिदोष और वृत्तदोष होते हैं । यह भरतोत्तरवर्ती आचार्योंकी दृष्टि है । यों, इस दृष्टिका मूल भरतमें उपलब्ध है : उन्होंने अभिनयके समय काव्यके पाठमें जहाँ भिन्नवृत्तका निषेध किया है, वहीं बिना विराम (यति) के विश्राम करनेका भी निषेध किया है । ३ यह स्पष्ट ही यतिभ्रंशका निषेध है । भरतने अपने शास्त्रके प्रयोगप्रधान होनेके कारण उसके अनुकूल उसकी वर्जनीयता अभिनय (वाचिक) में बताई है; जबकि दण्डी आदि काव्यशास्त्रियोंने काव्यके प्रणयन १. शतपथब्राह्मण १२।२।३।३ : नाक्षराच्छन्दो व्येत्येकस्मान्न द्वाभ्याम् । कौषीतकिब्रा० २७।१ : न ह्येकेनाक्षरेणान्यच्छन्दो भवति; नो द्वाभ्याम् । २. छन्दःशास्त्र ५।१ पर मृतसञ्जीवनी : तथा चोक्तम्- एकदेशस्थिता जातिर्वृत्तं गुरु-लघु-स्थितम् । वृत्तरत्नाकर १।१२ पर नारायणभट्ट : यतिर्वृत्तस्वरूपाद् भिन्नाऽपि गुणालङ्काराद्यपेक्षयाऽन्तरङ्गाङ्गत्वात् सूत्र- कारादिभिर्लक्षणमध्ये निबद्धा, न तु वृत्तस्वरूपतया । मात्रागुरुलघु- नियमनं हि वृत्तलक्षणम्, विरामात्मकत्वं च यतेः । काव्यालङ्कारसूत्र २।२।५ : न वृत्तदोषात् पृथग् यतिदोषो, वृत्तस्य यत्यात्मकत्वात् । ६ : न, लक्ष्मणः पृथक्त्वात् । वृत्ति : गुरुलघुनियमात्मकं वृत्तम् । विरामात्मिका च यतिरिति । ३. (क) नापशब्दं पठेत् तज्ज्ञो (ख) भिन्नवृत्तं तथैव हि । (ग) विश्रमेन्नाविरामेषु (घ) दैन्ये काकुं न दीपयेत् ।। १७।१४६ (क) 'अपशब्द' को १६।८६ में 'शब्दच्युत' और ६५ में 'शब्दहीन' कहा है । (ख-ग) १६।६४ में प्रोक्त 'वृत्तदोष' अपरनाम 'विषम' का विवरण है । (घ) 'काकु' का सम्बन्ध वाचिक अभिनयसे है, छन्दसे नहीं । यह गद्य पद्य दोनोंमें हो सकती है ।