भारतकोश
काव्यादर्श (महाकवि दण्डी - प्रसादिनी सान्वय हिन्दी व्याख्या सहित)

काव्यादर्श (महाकवि दण्डी - प्रसादिनी सान्वय हिन्दी व्याख्या सहित)

Kavyadarsha of Mahakavi Dandin with Prasadini Commentary

महाकवि दण्डी द्वारा

DevanagariHindipublished270 पृष्ठ

पृष्ठ 211, कुल 270 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 211

१८८ काव्यादर्श [३।१५६ (८) वर्णानां न्यूनताऽऽधिक्ये गुरु-लघ्वयथास्थितिः । यत्र, तद् भिन्नवृत्तं स्यादेष दोषः सुनिन्दितः ॥ १५६ ॥ (८) जहाँ अक्षरोंकी (क) कमी या बेशी हो, (ख) गुरु और लघुका उसके विपरीत विन्यास हो, वह 'भिन्नवृत्त' होवै । यह दोष बहुत निन्दित दोष होता है ॥ १५६ ॥ में ही यतिभ्रंशको दोष (वर्ज्य) बताया है । इसी दृष्टिके तहत दण्डी या उनसे पूर्वके आचार्योंने भरतके 'विषम' नामक वृत्तदोषको ही 'यतिभ्रष्ट' और 'भिन्नवृत्त' नामक दो दोषोंमें विभाजित कर दिया । भामहका 'यतिभ्रष्ट'का विवेचन दण्डीसे कुछ भिन्न है : छन्दमें प्रयुक्त शब्दोंकी वि-चारणा यति होती है। उससे भ्रष्ट 'यतिभ्रष्ट' कहलाता है ।¹ भामहने पिङ्गलके 'विच्छेद' और दण्डीके 'पदच्छेद' जैसे स्पष्टार्थक शब्दोंके स्थानपर 'शब्दोंकी विचारणा' जैसी अस्पष्ट अभिव्यक्ति दी है । उनके उदाहरणमें तो और भी गड़बड़ है : तमाल + असित = 'तमालासित' में दीर्घ एकादेश सन्धिके अन्तवद्भावके कारण 'तमाला' के शब्दत्व या पदत्वमें न छन्दःशास्त्रियोंके अनुसार यतिभ्रंश दोष है, और न कविपरम्परामें । महाकवियोंने इस प्रकारकी सन्धियोंपर यतिके असङ्ख्य प्रयोग किये हैं । यदि कविसम्प्रदायमें इन्हें दोष माना जाता, तो वे ऐसे प्रयोग क्यों करते ? अतः भामहका न लक्षण निर्दोष है, और न उदाहरण ही ठीक है । निष्कर्ष : यतिभङ्ग दोषके बारेमें दण्डीका विवेचन समस्त आचार्यपरम्परा में सर्वाधिक युक्तिसङ्गत एवं यथार्थपरक है । यतिका उद्देश्य श्रुतिसुख है । श्रुतिकटु यतिका परिहार कविको करना चाहिये । कविकल्पलताके आचार्य का यह कथन दण्डीके मतकी ही पुष्टि करता है : यति मधुरताका हेतु है । उसे इस रूपमें करना चाहिये कि वह उद्वेजक न बने² ॥ १५५ ॥ (८) भिन्नवृत्त दोष—छन्दमें तीन बातें होती हैं : (क) अक्षरोंकी नियत सङ्ख्या; इसमें भेदसे छन्दोंकी जाति बदल जाती है; (ख) गुरु लघुके १. यतिश्छन्दोऽधिरूढानां शब्दानां या विचारणा । तदपेतं यतिभ्रष्टमिति निर्दिश्यते, यथा ॥ काव्याल० ४।२४ विद्युत्वन्तस्तमाला, सितवपुष मे वारिवाहा ध्वनन्ति ॥ २५ २. वृत्तरत्नाकर १।१२ पर नारायणभट्ट : तदुक्तं कविकल्पलतायाम् एवं यथा यथोद्वेगः सुधियां नोपजायते । तथा तथा मधुरतानिमित्तं यतिरिष्यते ॥