काव्यादर्श (महाकवि दण्डी - प्रसादिनी सान्वय हिन्दी व्याख्या सहित)
Kavyadarsha of Mahakavi Dandin with Prasadini Commentary
महाकवि दण्डी द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें३।१५६] ५. दोष : (८) भिन्न-वृत्त १८६ नियत क्रमसे अक्षरोंका विन्यास; मात्रिक छन्दोंमें मात्राओंका तथा वर्णिक छन्दोंमें अक्षरों (केवल स्वरों या व्यञ्जनारूढ स्वरों) का क्रमविशेषमें व्यवस्थित विन्यास; (ग) नियत सङ्ख्यापर विराम अर्थात् यति । यतिदोष का निरूपण पीछे (१५२-१५५ श्लोकोंमें) विस्तरेण किया जा चुका है । अब छन्दकी शेष दो विशेषताओंमें दोष आनेसे होने वाले वृत्तदोषका निरूपण १५६-१५८ श्लोकोंमें आचार्यने किया है । (क) शतपथ और कौषीतकि ब्राह्मणोंके प्रमाणसे पीछे देख चुके हैं कि एक दो अक्षरोंकी कमीसे 'छन्दोभङ्ग नहीं माना जाता था । किन्तु वहाँ भी दो स्थितियाँ शास्त्रकारोंने बताई हैं : (i) यदि अक्षरोंकी न्यूनता एकादेश अथवा यणादि सन्धिके कारण है, तो उसे सन्धिच्छेद (व्यूह¹) के द्वारा पूरा किया जाता है ।² ये सन्धिज छन्दोभङ्ग कविकृत नहीं थे, अपितु भाषामें सन्धियोंका स्वरूप बदलनेपर संहिताकारोंने भाषाके नवविकसित स्वरूपके १. व्यूहकी आवश्यकताके बारेमें वेङ्कटमाधवका ऋग्वेदके छठे अष्टकके सातवें अध्यायकी व्याख्याके प्रारम्भमें दिया वक्तव्य द्रष्टव्य है : समीचीना यदा वृत्तिर्न व्यूहेऽपि भवेदिह । न तदा व्यूहमिच्छन्ति; तत्रैतल्लिङ्गदर्शनम् ।। ७ ।। 'अक्षरे पादकॢप्तिः स्यान्न च हल् केवलोऽक्षरम् । संयोगानामतो व्यूहो न कार्य' इति बह्वृचाः ।। १० ।। भवतो द्वौ यणादेशौ यद्येकस्मिन् पदे, तदा । तथा व्यूहेद् यणादेशं यथा वृत्तिर्न दुष्यति ।। ११ ।। व्यूहे च वृत्तिसिद्धिश्चेद्, व्यूहं नेच्छन्ति केचन । व्यूहेनाक्षरसङ्ख्या च कार्येवेत्याह माधवः ।। १२ ।। श्लोकौ भवतः 'चत्वारि सन्धिजातानि यैश्छन्दो हसते न च । प्रश्लिष्टमभिनिहितं क्षिप्रसन्धिरभिद्रुतम् ।। १ ।। एतानि सन्धिजातानि मिमानश्छन्दसोऽक्षरैः । द्वैधं कुर्यादसम्पूर्णे, न पूर्णे किञ्चनेङ्गयेत्' ।। २ ।। इति । २. व्यूहेदेकाक्षरीभावान् पादेषूनेषु सम्पदे ।। ऋक्प्रातिशाख्य १७।२२ क्षैप्रवर्णांश्च संयोगान् व्यवेयात् सदृशैः पदैः ।। २३ छन्दःशास्त्र ३।२ : इयादिपूरणः । ऋक्सर्वानुक्रमणी १।३ : पादपूरणार्थं तु क्षैप्रसंयोगैकाक्षरीभावान् व्यूहेत् । प्रथम परिच्छेदकी भूमिका, पृष्ठ ३-४ भी देखें ।