भारतकोश
काव्यादर्श (महाकवि दण्डी - प्रसादिनी सान्वय हिन्दी व्याख्या सहित)

काव्यादर्श (महाकवि दण्डी - प्रसादिनी सान्वय हिन्दी व्याख्या सहित)

Kavyadarsha of Mahakavi Dandin with Prasadini Commentary

महाकवि दण्डी द्वारा

DevanagariHindipublished270 पृष्ठ

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पृष्ठ 213

१६० काव्यादर्श [३।१५७ (क i) 'इन्दुपादाः शिशिरा स्पृशन्तोत्यूनवर्णता । (ii) 'सहकारस्य किसलयान्यार्द्राणीत्यधिकाक्षरम् ॥ १५७ ॥ (क i) 'इन्दुपादाः शिशिरा' (शीतल चन्द्रकिरण छूती हैं) में पादमें एक वर्ण (अक्षर) की कमी है । (ii) 'सहकारस्य किसलयान्यार्द्राणि' (आम की गीली कोंपलोंको) यह काव्य अधिक अक्षर वाला है ॥ १५७ ॥ अनुरूप करनेको कविके प्रयत्नके विपरीत जाकर नवीन सन्धियोंका प्रयोग कर के छन्दोभङ्ग कर दिया था । व्यूहन (सन्धिच्छेद) से उसे पुनः यथापूर्व लाया जाता है । (ii) यदि कविकी अशक्तिवश हो गया है, या कविने वैचित्र्यार्थ स्वेच्छासे किया है, तब व्यूहसे काम नहीं चलता है, तो उसे कविके प्रति श्रद्धावश न बदलकर निचृत् भुरिक् या विराट् और स्वराट् नामसे व्यवस्थित कर दिया जाता था ।१ काव्यशास्त्रियोंने इस प्रकारके औदार्यकी छूट नहीं दी ।२ अक्षरसङ्ख्या यदि अपेक्षितसे कम या अधिक है, तो उसे दोष ही कहा है । इसका उदाहरण आचार्यने १५७वें श्लोकमें दिया है । (ख) छन्दमें सर्वाधिक महत्त्वपूर्ण वस्तु है गुरु लघु का व्यवस्थित क्रममें विन्यास । उसका भङ्ग छन्दमें सदा दोष समझा जाता रहा है । छन्दकी लयके भङ्गका सर्वाधिक उद्वेजक हेतु गणभङ्ग (गुरुलघुविन्यासका भङ्ग) है । (ग) यतिभङ्गपर विचार १५२-१५५ श्लोकोंमें किया ही जा चुका है । छन्दोभङ्ग दोष हर स्थितिमें वैरस्यकारक ही होता है । अतः यह नित्य दोष है ॥ १५६ ॥ (क i) पादमें अक्षरकी न्यूनतासे भिन्नवृत्तताका उदाहरण—१५७वें श्लोकके पूर्वार्धमें आचार्यने अक्षरन्यूनताजन्य भिन्नवृत्त दोषकी व्याख्या उदाहरण दे कर की है : इस अर्धालीके अनुष्टुप् छन्दोबद्ध प्रथम पादमें आठ अक्षरोंकी बजाय सात अक्षर हैं । अतः यह पाद सम्पूर्ण श्लोकमें प्रयुक्त लयको भङ्ग करनेके कारण उद्वेजक होनेसे दोष है । १. छन्दःशास्त्र ३।५६-६२ : ऊनाधिकेनैकेन निचूद्भुरिजौ । द्वाभ्यां विराट्- स्वराजौ । आदितः सन्दिग्धे । देवताऽऽदितश्च । छन्दोंसे देवताओंके सम्बन्धके आदिम उल्लेखके लिये ऋ० १०।१३०।४-६ देखें । २. हलायुधवृत्ति ३।६३ : वैदिकेष्वेवच्छन्दस्सु निचृद्भुरिजौ तथा विराट्- स्वराजौ च दृश्येते । न लौकिकेषु ।