भारतकोश
काव्यादर्श (महाकवि दण्डी - प्रसादिनी सान्वय हिन्दी व्याख्या सहित)

काव्यादर्श (महाकवि दण्डी - प्रसादिनी सान्वय हिन्दी व्याख्या सहित)

Kavyadarsha of Mahakavi Dandin with Prasadini Commentary

महाकवि दण्डी द्वारा

DevanagariHindipublished270 पृष्ठ

पृष्ठ 214, कुल 270 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 214

३।१५८] ५. दोष : (८) भिन्नवृत्त १६१ (ख i) कामेन बाणा निशाता' विमुक्ता, मृगेक्षणाष्वित्ययथागुरुत्वम् । (ii) मदनबाणा निशिताः पतन्ति वामेक्षणास्वित्ययथालघुत्वम् । १५८। (ख i) 'कामेन बाणा निशाता विमुक्ता' (मृगनयनियोंपर कामदेवने तीखे छोड़े बाण) में गुरु अनुचित है । (ii) 'मदनबाणा निशिताः पतन्ति' '(कामदेवके तीखे बाण तिरछी चितवन वालियों पर पड़ते हैं) में लघु वर्ण अनुचित है ।। १५८ ।। (ii) अक्षरकी अधिकतासे भिन्नवृत्तताका उदाहरण—श्लोकके उत्तरार्ध में यण्सन्धिके परादिवद्भावकी स्थितिमें 'किसलया' पर यति होती है । तब इस पादमें आठकी बजाय नौ, एक अक्षर अधिक होनेसे छन्दकी लय टूटती है । इससे यह पाद श्रुतिविरस हो जाता है ।। १५७ ।। (ख i) लघुके स्थानमें गुरुके प्रयोगसे भिन्नवृत्तताका उदाहरण—१५८वें श्लोकके प्रथमपादमें कविने एकादशाक्षर त्रिष्टुप् जातिके इन्द्रवज्राछन्दका प्रयोग किया है । इस छन्दमें सातवां अक्षर दीर्घ नहीं, अपितु लघु अपेक्षित होता है ।१ किन्तु यहाँ यह 'निशाता' में 'शा' के रूपमें दीर्घ है । अतः गुरुका अयथावत् (अनुचित रूपसे) प्रयोग छन्दोभङ्गकारक है । 'निशिता' पाठसे दोषनिवारण हो जाता है । (ii) गुरुके स्थानमें लघुके प्रयोगसे भिन्नवृत्तताका उदाहरण—तृतीय पादके द्वितीय अक्षरमें लघु वर्ण 'द'का प्रयोग करनेसे उपजातिमें इस स्थानपर गुरु प्रयोगका उल्लङ्घन हुआ है । अतः यहाँ लघु वर्ण अयथावत् (अनुचित रूपसे) प्रयुक्त हुआ है । इस लिये छन्दोभङ्गके कारण भिन्नवृत्त दोष है । 'मदनबाणाः'के स्थानपर 'अनङ्गबाणाः' पाठसे इस दोषका निवारण हो जाता है । रत्नश्री और वादीटीकामें 'निशिताः' पाठ माना है । रत्नश्रीज्ञानने इस पादको उपेन्द्रवज्राका२ पाद समझकर प्रथम अक्षरमें लघुके स्थानपर दीर्घ 'का'के प्रयोगसे छन्दोभङ्ग बताया है । उन्होंने ऐसा सम्भवतः द्वितीय और तृतीय पादोंमें उपेन्द्रवज्राके शुद्ध और खण्डित प्रयोगको देखकर किया होगा । पर प्रथम और चतुर्थ पादोंमें इन्द्रवज्रा और बीचके दो पादोंमें उपेन्द्रवज्राके मिश्रणसे उपजातिका संभव होते प्रथम और चतुर्थ पादोंमें भी १. रत्नश्री, वादीटीका : निशिता, तरुणवाचस्पति : निशाता । २. छन्दः शास्त्र ६।१५ : इन्द्रवज्रा तौ जगौ ग् । ३, उपेन्द्रवज्रा ज्तौ जगौ ग् । ४. आद्यन्तावृपजातयः ।