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काव्यादर्श (महाकवि दण्डी - प्रसादिनी सान्वय हिन्दी व्याख्या सहित)

काव्यादर्श (महाकवि दण्डी - प्रसादिनी सान्वय हिन्दी व्याख्या सहित)

Kavyadarsha of Mahakavi Dandin with Prasadini Commentary

महाकवि दण्डी द्वारा

DevanagariHindipublished270 पृष्ठ

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पृष्ठ 215

१६२ काव्यादर्श [३।१५८ दण्डीको उपेन्द्रवज्रा ही इष्ट है, और दोनों पादोंमें प्रथम अक्षरमें लघुके स्थानमें दीर्घका अयथावत् प्रयोग है, यह माना जाये, इसमें कोई युक्ति नहीं है। अतः यहाँ प्रथम पादमें इन्द्रवज्रामें ही गुरुका अयथावत् प्रयोग बताने वाला ‘निशाता’ (मध्यगुरु) पाठ ही ठीक है। वादिजङ्घालदेवने उपजातिवाले इस श्लोकमें अनुष्टुप्‌की लघु-गुरु व्यवस्थाका उल्लङ्घन बताया है।¹ इसपर क्या टिप्पणी की जाये ? भरतने इस दोषका निरूपण 'विषम' नामसे किया है। यह 'यतिभ्रष्ट'के प्रसङ्गमें कहा जा चुका है। इसकी व्याख्या उन्होंने 'वृत्तका दोष विषम होता है।' कहकर की है। वृत्तके तीन अवयव पीछे श्लोक १५६ पृष्ठ १८८में बताये जा चुके हैं। अतः भरतके अनुसार इन तीनोंमेंसे किसी भी एक अवयव के लक्षणविरुद्ध होनेसे वृत्तमें दोष निष्पन्न हो जानेसे 'विषम' नामक छन्दो- भङ्ग दोष होगा। आचार्य दण्डीने भरतके कथनको व्याख्यानसे लभ्य इस विशेषप्रतिपत्तिका विस्पष्ट रूपसे 'यतिभ्रष्ट' और 'भिन्नवृत्त' दो दोषोंके रूपमें प्रतिपादित किया है। भामहने भी शब्दान्तरसे इसी प्रकार इन दोषोंका निरूपण किया है।² उन्होंने मालिनी³ छन्दका उदाहरण दिया है। इसके द्वितीय पादमें नवम अक्षर गुरुके स्थानपर लघु दिया है और बारहवां अक्षर दीर्घके स्थानमें लघु दिया है। इसके अतिरिक्त पूरे पादमें १४ अक्षर होनेसे एक अक्षरकी न्यूनता है। आठवें अक्षर ‘को’ पर एकादेश सन्धिके अन्तवद्भावसे यति की गई है⁴ ॥ १५८ ॥ १. वादिटीका ४।३५ : पञ्चमं लघु सर्वत्रानुष्टुपूछन्दस्यषष्ठं द्विचतुर्थयोः पादयोः, षष्ठं गुरु चतुर्ष्वपि भवत्यक्षरमिति नियमः । इह तु 'कामेन बाणा' इति पञ्चमं गुरु । 'निशिता' इत्यषष्ठं लघु । 'द्विचतुर्थयोः' इति विशेषणात् प्रथम-तृतीययोः सप्तमं गुरु भवति । अत्र च प्रथमपादे सप्त- माक्षरस्य लघुत्वादयथागुरुत्वम् ।...अयथालघुत्वमाह—'मदनबाणा निशिताः पतन्ति'। 'शि' स्थाने गुरुणा भवितव्यम् । पञ्चमेन च लघुना सप्तमं द्विचतुर्थयोः पादयोर्लघु, प्रथमतृतीययोश्च गुरु भवतीति लघु प्रयुक्तम् । इत्ययथालघुत्वम् । इति 'नि', 'शि' शब्दौ दोषः । २. गुरोलंघोश्च वर्णस्य योऽस्थाने रचनाविधिः । तन्न्यूनताऽधिकता वाऽपि भिन्नवृत्तमिदं यथा ।। काव्याल० ४।२६ ३. ननमयययुतेयं मालिनी भोगिलोकैः । वृत्तरत्नाकर ४. भ्रमति भ्रमरमाला काननेषून्मदाऽसौ । विरहितरमणीकोऽहंति त्वद्य गन्तुम् ।। काव्याल० ४।२७