भारतकोश
काव्यादर्श (महाकवि दण्डी - प्रसादिनी सान्वय हिन्दी व्याख्या सहित)

काव्यादर्श (महाकवि दण्डी - प्रसादिनी सान्वय हिन्दी व्याख्या सहित)

Kavyadarsha of Mahakavi Dandin with Prasadini Commentary

महाकवि दण्डी द्वारा

DevanagariHindipublished270 पृष्ठ

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३।१५६-१६०] ५. दोष : (६) विसन्धि १६३

(६) न संहितां विवक्षामीत्यसन्धानं पदेषु यत् । तद् विसन्धीति निर्दिष्टं न प्रगृह्यादिहेतुकम् १ ॥ १५६ ॥ (क) मन्दानिलेन चरता अङ्गनागण्डमण्डले । (६) पदोंमें सन्धि नहीं करनेकी इच्छासे जो सन्धिका अभाव होता है, उसे 'विसन्धि' नामसे कहा है। प्रगृह्य आदिके कारण होने वाला सन्धिका अभाव विसन्धि नहीं होता ॥ १५६ ॥ (क) रमणीके गोल-गोल कपोलपर उमगा पसीना आकाशमें और हमारे (६) विसन्धि दोष—'विसन्धि' विगत-सन्धिके अर्थमें है । 'सन्धि' का अर्थ है योग, जुड़ाव, सन्धान, संहिता । (i) पदोंके अवयवोंमें आन्तरिक तथा (ii) पदोंमें परस्पर बाह्य सन्धि होती है । (१) प्रथम और द्वितीय पादोंमें एवम् (२) तृतीय तथा चतुर्थ पादोंमें सन्धि होनी चाहिये । इस प्रकार श्लोकार्ध के घटक दो पादोंमें (i) आन्तरिक और (ii) बाह्य सन्धि व्याकरणमें बताये नियमोंके अनुसार अनिवार्य बताई गई है । व्याकरणके अनुसार सन्धिके तीन रूप हैं : (१) कुछ स्थितियोंमें यह नित्य होती है, तो (२) कहीं विकल्प से । इसी प्रकार (३) कुछ स्थितियोंमें सन्धिका अभाव भी शास्त्रोंमें विहित है । इसे पाणिनीय व्याकरणमें 'प्रकृतिभाव' कहा जाता है और प्रातिशाख्यों तथा तदनुसारी शिक्षावेदाङ्गमें 'विवृत्ति' कहा जाता है ।२ इसके अतिरिक्त, अयादि आदेशोंके पदान्तीय 'य्' और 'व्'का स्वरके पूर्व शाकटायनाभिमत लोप होनेपर अकार और परवर्ती स्वरकी वृद्धि आदि सन्धियाँ नहीं होती ।३ यह सन्ध्यभाव भी नित्य है । (क) शास्त्रके अनुसार सन्धि नित्य विहित है, वहाँ यदि प्रयोक्ता सन्धि नहीं करता तब वह शास्त्रविरुद्ध विवृत्ति सन्धिके जानकारोंको उद्वेजक होनेसे दोष है । किन्तु जहाँ (ख) सन्धिके अभावकी शास्त्रीय विकल्पके कारण प्राप्ति है, अथवा (ii) प्रकृतिभावके कारण, वहाँ वह दोष नहीं होगी ॥ १५६ ॥ (क) विसन्धि दोषका उदाहरण—प्रकृत १६०वें श्लोकमें प्रथमपादान्त- स्थ 'आ' ('ता') की द्वितीयपादादिस्थ 'अ' से दीर्घ एकादेश सन्धि छन्दः- १. यह श्लोक त्रिपुरहरभूपालने काव्यालङ्कारसूत्रकामधेनु २।२।८में 'यदवादि दण्डिना' कहकर उद्धृत किया है । २. अष्टा० ६।१।११५-१२८; विशेषकर 'प्लुतप्रगृह्या अचि नित्यम् । ऋक्प्रा० २।३-४ : स्वरान्तरं तु विवृत्तिः । सा वा स्वरभक्तिकाला । ३. अष्टा० ८।३।१६ : लोपः शाकल्यस्य । ८।२।१ : पूर्वत्रासिद्धम् ।