भारतकोश
काव्यादर्श (महाकवि दण्डी - प्रसादिनी सान्वय हिन्दी व्याख्या सहित)

काव्यादर्श (महाकवि दण्डी - प्रसादिनी सान्वय हिन्दी व्याख्या सहित)

Kavyadarsha of Mahakavi Dandin with Prasadini Commentary

महाकवि दण्डी द्वारा

DevanagariHindipublished270 पृष्ठ

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पृष्ठ 217

१६४ काव्यादर्श [३।१६०-१६१ लुप्तमुद्भूदि घर्माम्भो नभस्यस्मन्मनस्यपि१ ॥ १६० ॥ (ख i) 'मानेष्ये इह शीर्यन्ते स्त्रीणां (ii) हिमऋतौ प्रिये । मनमें चलते हुए मन्द पवनके द्वारा लुप्त हो गया ॥ १६० ॥ (ख) हे प्रिये, इस ठण्डीके मौसममें इन रातोंमें स्त्रियोंके पतिके प्रति मान और जिन्हें मानकी आवश्यकता नहीं पड़ती, उन स्वाधीनपतिका शास्त्रके अनुसार आवश्यक (नित्य प्राप्त) है । पर यहाँ यह जानकर नहीं की है । अतः विसन्धि दोष है । तरुण वाचस्पतिने यहाँ 'मन्दानिलेन के स्थानपर 'मेघानिलेन' पाठ मान कर 'नभसि' का अर्थ नभोमास (श्रावण) किया है । मन्दानिल या मेघानिल का नभस (आकाश या श्रावण मास) से आधाराधेयभाव सम्बन्ध है । मनसे इन दोनोंका सम्बन्ध मनोहरताके कारण मनमें घूमनेका है । इससे सुन्दरीके प्रति रतिका व्यभिचारी भाव औत्सुक्य व्यक्त होता हैं । वादिजङ्घाल देवने 'एक और विशिष्ट उदाहरणका ऊह यहाँ किया जा सकता है', कहा है । उसे तरुणवाचस्पतिने दण्डिकृतके रूपमें समझा है ।२ रत्नश्री में यह उपलब्ध नहीं है । अतः प्रतीत होता है कि वादिजीके परामर्शके बाद यहाँ भ्रमसे समझ लिया गया है । तिरुपतिसंस्करणके संस्कर्ताने बिना विचार किये उसे मूलके रूपमें रख दिया है ॥ १६० ॥ (ख) निर्दोष विच्छेदके दो उदाहरण—व्याकरणमें 'प्रकृतिभाव सन्धि'के नामसे विदित सन्धिके अभावकी स्थितिके दो उदाहरण उपलक्षणार्थ दिये हैं : (i) प्रथम उदाहरण नित्य सन्ध्यभावका है : 'मानेष्ये' एकारान्त द्विवचनान्त होनेके कारण प्रगृह्य पद है और इसकी परवर्ती स्वरसे सन्धिका प्रकृतिभावके १. प्रथम पादका पाठ तरुणवाचस्पतिने सम्भवतः काव्यालङ्कारसूत्र २।२।८ और सरस्वती० १।२७के प्रभावमें 'मेघानिलेन अमुना' माना है । या वामन और भोजका उदाहरण दण्डीके उदाहरणसे बिल्कुल भिन्न है । लगता है किसी ने अन्य समान उदाहरणके प्रतीकके रूपमें हाशियेपर लिख दिया और कालान्तरमें भ्रमसे दण्डीके श्लोकका पाठ समझ लिया गया । २. वादिटीका : 'आधिव्याधिपरीताय अद्य श्वो वा विनाशिने' इत्यादिकमपि विशिष्टमुदाहरणमूह्यम् । तरुणटीका : 'पादान्ते सन्धेरकरणं न दोषाय' इति केचित् । तदुदाहरति 'आधिव्याधी'ति । तिरुपतिसं० में उत्तरार्ध यों दिया है : को हि नाम शरीराय धर्मापेतं समाचरेत् ॥