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काव्यादर्श (महाकवि दण्डी - प्रसादिनी सान्वय हिन्दी व्याख्या सहित)

काव्यादर्श (महाकवि दण्डी - प्रसादिनी सान्वय हिन्दी व्याख्या सहित)

Kavyadarsha of Mahakavi Dandin with Prasadini Commentary

महाकवि दण्डी द्वारा

DevanagariHindipublished270 पृष्ठ

पृष्ठ 218, कुल 270 में से

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पृष्ठ 218

३।१६१ ] ५. दोष : (६) विसन्धि अन्योंके मतमें १६५

आसु रात्रिष्विति प्राज्ञैर्ज्ञातन्यङ्गमीदृशम् ॥ १६१ ॥ रमणियोंके प्रति ईर्ष्या क्षीण हो जाते हैं। इस प्रकारका (सन्धिरहित प्रयोग) प्राज्ञोंको दोषरहित प्रतीत होता है ॥ १६१ ॥


रूपमें नित्य निषेध है। (ii) द्वितीय उदाहरण सन्धिविकल्पका है : 'हिमऋतौ' समस्त पद है। इसमें गुण सन्धि प्राप्त है। उसका प्रतिषेध प्रकृतिभावके विकल्पसे होता है। अर्थात् गुण एकादेश सन्धि भी उचित है, उसका अभाव भी। यहाँ गुणका अभाव किया गया है ।^२ वह बुद्धिमानोंको न्यङ्ग=अङ्गहीन, दोषयुक्तके रूपमें ज्ञात नहीं है। अर्थात् वे इसे निर्दोष समझते हैं। भरतने उपश्लेषण=सन्धानसे रहित शब्दवाला होना 'विसन्धि' दोष बताया है।^३ अभिनवगुप्तने सन्धिके तीन प्रकार बताये हैं : (क) दो वर्णोंमें निरन्तरता, (ख) विचारका योग (भामहने इसे 'विचारणा' कहा है), (ग)


१. रत्नश्री और वादीटीकामें इस श्लोकका पूर्वार्ध धृत, व्याख्यात नहीं है। अपितु उत्तरार्धको १६०वें श्लोकसे मिलाकर व्याख्या की गई है कि इस प्रकारका श्लोकार्धोंके अन्त और आदिमें सन्धिका अभाव शिष्टोंको दोषके रूपमें विदित नहीं है। इससे प्रतीत होता है कि रत्नश्रीज्ञान यहाँ पूर्वार्ध और उत्तरार्धमें विसन्धिको निर्दोष मानते हैं। अर्थात् 'आसु रात्रिषु०' आदि अर्ध उत्तरार्ध है और इसके पूर्व एक पूर्वार्ध है जो किसी कारणसे रत्नश्रीमें विच्छिन्न हो गया है। अन्यथा (१) दो श्लोकोंके अन्तादिकी सन्धि तो कहीं भी विहित नहीं है। उसके अभावमें दोषत्व वा अदोषत्वका प्रश्न ही नहीं उठता। (२) यदि 'मानेष्ये' आदि पूर्वार्ध यहाँ नहीं है, तो यह श्लोकार्ध परिच्छेदमें लटकता रहेगा, जो कोई भी ग्रन्थकार नहीं करेगा। (३) जब श्लोकोंके अन्तादिमें सन्धि होती ही नहीं है, तब इसे 'प्राज्ञैर्ज्ञातन्यङ्ग' कहनेका क्या अभिप्राय है। जबकि इसे पूरा श्लोक माननेपर प्रकृतिभाव सन्धिके कारण यहाँ सन्धिके अभावकी निर्दोषताका उदाहरण होनेसे यह कथन बिल्कुल प्रासङ्गिक है। अतः भोटपाठ, रत्नश्री और वादीटीकामें उपलब्ध न होते हुए भी 'मानेष्ये०' आदि पूर्वार्ध यहाँ मौलिक ही है। २. अष्टा० १।१।११ : ईदूदेद् द्विवचनं प्रगृह्यम् । ६।१।१२५ : प्लुतप्रगृह्या अचि नित्यम् । १२८ : ऋत्यकः । ३. अनुपश्लिष्टशब्दं यत्, तद् 'विसन्धी'ति कीर्तितम् । नाट्यशास्त्र १६।६४

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