भारतकोश
काव्यादर्श (महाकवि दण्डी - प्रसादिनी सान्वय हिन्दी व्याख्या सहित)

काव्यादर्श (महाकवि दण्डी - प्रसादिनी सान्वय हिन्दी व्याख्या सहित)

Kavyadarsha of Mahakavi Dandin with Prasadini Commentary

महाकवि दण्डी द्वारा

DevanagariHindipublished270 पृष्ठ

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आपसमें मिल जाना (एकादेश) । १ भामहने विसन्धिका निरूपण केवल उदा- हरण देकर चलता किया है। इसमें सन्धिभङ्गके तीनों स्थल कान्ते + इन्दु शिरोरत्ने + आधाने + उदंशनी एदन्त द्विवचन होनेके कारण प्राप्त नित्य प्रकृतिभावसे सन्ध्यभावके उदाहरण हैं ।२ शास्त्रविहित प्रकृतिभावजन्य सन्ध्य- भावको दोष माननेकी महती मति भामहमें ही है । भामहके अनुकरणमें वामनने भी इस प्रकारके प्रगृह्यहेतुक विश्लेषको दोष ही माना है ।३ परवर्ती लोगोंने भामहके उदाहरणमें लगातार तीन विवृत्तियोंको देखकर, उससे संकेत पाकर, भामहादिकी इस अतिवादी दृष्टिमें कुछ नरमी लाकर समन्वयका प्रयास किया है कि पुनः पुनः इस प्रकारके प्रकृतिभावके प्रयोग करना दोष है, एकाध बार करनेपर दोष नहीं है ।४ वामनने विसन्धिको एक और आयाम भी दिया : शब्दोंके सन्धानके कारण यदि कोई अश्लील शब्दका प्रतिभास हो जाता है, तो उन्होंने उस अग्राम्यताको भी 'विसन्धि' ही बताया है ।५ परवर्तीरुद्रट, अग्निपुराणकार तथा भोज आदि सभी आचार्योंने वामनकी दृष्टि ही अपनाई है ।। १६१ ।। १. अभिनवभारती १६।६४ : सन्धानं द्वयोर्नैरन्तर्यं, विचारयोगः, अन्योन्य- लयोवेति त्रिधा । तदनुपारूढमयुक्तं पारुष्याद्युत्पादकं वा यत्रापशब्दः स्मृतो मुनित्रयेणादृतः । २. कान्ते इन्दुशिरोरत्ने आधाने उदंशनी । पातां वः शम्भुशर्वाण्याविति प्राहुर्विसन्ध्यदः ।। काव्याल० ४।२८ ३. काव्यालङ्कारसूत्र २।२।८ : पदसन्धिवैरूप्यं (i) विश्लेषो (ii) ऽश्लीलत्वं (iii) कष्टत्वं च । (i) वृत्तिविश्लेषो यथा— मेघानिलेन अमुना एतस्मिन्नद्रिकानने । कमले इव लोचने इमे अनुबध्नाति विलासपद्धतिः ।। लोलालकानुबद्धानि आननानि चकासति । ४. काव्यप्रकाश ७ उ०, २१२ : 'संहितां न करोमी'ति (तु० काव्यादर्श ३।१५६) स्वेच्छया सकृदपि दोषः । प्रगृह्यादिहेतुकत्वे त्वसकृत् । काव्या- लङ्कारकामधेनु २।२।८ : यदवादि दण्डिना, 'न संहितां...न प्रगृह्यादि- हेतुकम् ।।' (काव्यादर्श ३।१५६) इति । अत्र प्रगृह्यादिहेतुकं विसन्धि न भवतीति सकृत्प्रयोगविषयमिदं द्रष्टव्यम् । असकृत्प्रयोगे तु दुष्टमेव । ५. काव्यालङ्कारसूत्रवृत्ति २।२।८ : (ii) अश्लीलत्वं यथा— विरेचकमिदं नृत्तमाचार्याभासयोजितम् । चकासे पनसप्रायैः पुरी षण्डमहाद्रुमैः ।।