भारतकोश
काव्यादर्श (महाकवि दण्डी - प्रसादिनी सान्वय हिन्दी व्याख्या सहित)

काव्यादर्श (महाकवि दण्डी - प्रसादिनी सान्वय हिन्दी व्याख्या सहित)

Kavyadarsha of Mahakavi Dandin with Prasadini Commentary

महाकवि दण्डी द्वारा

DevanagariHindipublished270 पृष्ठ

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३।१६२] ५. दोष : (१०) देशादि-विरोध १६७ (१० क) देशोऽद्रि-वन-राष्ट्रादिः, (ख) कालो रात्रिन्दिवर्तवः । (ग) १नृत्य-गीत-प्रभृतयः कलाः कामार्थ-संश्रयाः ॥१६२॥ (१०. क. अ) पर्वत, (आ) वन तथा (इ) राष्ट्र आदि 'देश' होता है । (ख. अ) रात, (आ) दिन, (इ) मौसम 'काल' होता है । (ग) काम, (ii) अर्थ पुरुषार्थोंपर आश्रित (अ) नृत्य (आ) गीत आदि कला होती हैं ॥१६२॥ (१०) दशम देशादि-विरोध दोषके आधार देशादिके लक्षण—अगले दो श्लोकों (१६२-१६३) में दशम दोष देशादिविरोधके देश आदि छह आधारोंका परिगणन करके उसका लक्षण १६४वें श्लोकमें किया गया है । देश आदि छह पदार्थोंके विषयमें कविके प्रमाद (असावधानी) के कारण यदि कोई ऐसी बात कह दी जाती है, जो उन-उन आधारोंमें प्रसिद्धिके विपरीत हो, तो वह क्रमशः (क) देश-विरोधी, (ख) कालविरोधी, (ग) कलाविरोधी, (घ) लोकविरोधी, (ङ) न्यायविरोधी और (च) आगमविरोधी दोष कहलाता है । ये छह दशम दोषके अवान्तर भेद हैं । इस दोषका मूल भरतके 'न्यायादपेत' दोषमें निहित है : प्रमाणों (लोक, वेद तथा अध्यात्म) से रहित कथन न्यायसे रहित होनेसे न्यायापेत (न्याय- विरोधी) दोष होता है । २ प्रत्यक्ष, अनुमान आदि प्रमाणोंसे पदार्थके स्वरूपकी परीक्षा 'न्याय' कहलाता है । भरतोक्त या दर्शनशास्त्रोक्त प्रमाणोंके द्वारा परीक्ष्य पदार्थों (प्रमेयों)को काव्यमें इस रूपमें प्रयुक्त करना कि वे प्रमाणोंसे परीक्षा करनेपर सही न उतर सकें, न्यायापेत दोष होता है । काव्यके वर्ण्य प्रमेयोंका वर्गीकरण दार्शनिक वर्गीकरणके समान तो नहीं हो सकता । अतः दण्डीने देश आदि छह प्रमेय बताकर इनके विषयमें प्रमाणविरुद्ध कथनको विनाशपथदानाभ्यां पदवादसमुत्सकम् । कामधेनु : विरेचक-याभ-पुरीष-विनाश-पदविन्यासैर्विरेचन-मिथुनीभाव- पुरीष-विनाश-प्रतीतेस्त्रिविधान्यश्लीलानि द्रष्टव्यानि । १. इसका उदाहरण १७०वें श्लोकमें नाट्यसे सम्बद्ध दिया है । अतः उचित पाठ तो 'नाट्य' प्रतीत होता है । नृत्य नाट्य (प्रेक्षणीयक्र)का ही अङ्ग है, यह समझकर कदाचित् 'नृत्य' कहा है । २. न्यायादपेतं विज्ञेयं प्रमाणपरिवर्जितम् । नाट्यशास्त्र १६।६३ लोको वेदस्तथाऽध्यात्मं प्रमाणं त्रिविधं स्मृतम् ।। २५।१३२