काव्यादर्श (महाकवि दण्डी - प्रसादिनी सान्वय हिन्दी व्याख्या सहित)
Kavyadarsha of Mahakavi Dandin with Prasadini Commentary
महाकवि दण्डी द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें३।१५३] ५ दोष : (७) यतिभ्रष्ट १८३ 'स्त्रीणां सङ्गीत, विधिमयम| दित्यवंशयो नरेन्द्रः, 'यह सूर्यवंशी राजा यहाँ शिष्टजनोंके साथ स्त्रियोंके क्लेश (कष्ट) के आदि निपातोंसे पूर्व यति नहीं होती, क्योंकि इनका सम्बन्ध हमेशा पूर्ववर्ती पदसे होता है । ‘स्वादु स्वच्छं, च हिमसलिलं प्रीतये कस्य न स्यात् ?’ में ‘च’ से पूर्व यति उचित नहीं है । ‘प्रत्यादेशादपि च, मधुनो विस्मृतभ्रूविलासम्’ (मेघदूत २।२८) में ‘च’ के बाद यति है, वह उचित है । (५) प्र, परा आदि जब उपसर्गके रूपमें प्रयुक्त होते हैं, तब उनका सम्बन्ध परवर्ती पदसे होता है, इस लिये इनके पश्चात् यति नहीं करनी चाहिये । किन्तु यदि ये कर्म- प्रवचनीयके रूपमें प्रयुक्त हैं, तो इनके पश्चात् यति की जा सकती है ।१ जैसे ‘दुःखं मे प्र, क्षिपति हृदये दुस्सहस्त्वद्वियोगः’में प्रपर यति उचित नहीं है । किन्तु ‘द्वारारूढप्रमोवं हसितमिव परिस्पष्टमासां सखीभिः ।' में परि के पश्चात् यति उचित है ।२ इस प्रकार विहित यतिका भङ्ग होनेपर काव्य श्रुतिकटु हो जाता है । अतः उद्वेगकर होनेके कारण यह दोष होता है ।। १५२ ।। यतिभ्रष्ट दोषका उदाहरण—अगले (१५३वें) श्लोकके पूर्वार्धमें आचार्य ने 'यतिभ्रष्ट' दोषका उदाहरण कतिपय यतिभङ्गोंसे प्रदर्शित किया है । यह श्लोक मन्दाक्रान्ता छन्दमें निबद्ध है । उसके पादमें चौथे, दसवें और सत्रहवें १. नित्यं प्राक्पदसम्बन्धाश्चादयः प्राक्पदान्तवत् । परेण नित्यसम्बन्धाः प्रादयश्च पदादिवत् ।। हलायुधटीका ६।१ २. पादान्त एव केचिच्च पादमध्येऽपि केचन । यतिं वदन्ति; तत्रापि विशेषः स्फुटमुच्यते ।। मन्दारमरन्द, शेषबिन्दु (i) धातुनामस्वभिन्नेषु यतिर्भवति, नान्यथा । (ii) उपसर्गन्तितश्छेदः, (iii) प्रत्ययादौ तयोः क्वचित् ।। (iv) स्वरसन्धौ तु सम्प्राप्तसौन्दर्याद्यतिरिच्यते । (v) तु, चादयो न प्रयोज्या विच्छेदात् परतस्तथा ।। (vi) प्रत्ययादौ यतिर्नाम्नां षष्ठचामेवेति केचन* ।। स्वरसन्धिक्कृते प्रायो, धातुभेदे तदिष्यते । नामभेदे च शेषेषु न दोष इति सूरयः ।। तरुणवाचस्पति द्वारा उद्धृत यह विवरण वामनके कथन (काव्या- लङ्कारसूत्र २।२।४) का सङ्क्षेप है । *जैसे ‘न तव बलमनङ्गस्यापि वा दुःखभाजो’ । आश्चर्यचूड़ामणि ५।६