काव्यादर्श (महाकवि दण्डी - प्रसादिनी सान्वय हिन्दी व्याख्या सहित)
Kavyadarsha of Mahakavi Dandin with Prasadini Commentary
महाकवि दण्डी द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें१८२ काव्यादर्श [३।१५२ सबसे स्थूल विराम तो होता है श्लोकार्धमें । उससे कम स्थूल होता है पादान्तमें ।¹ उससे सूक्ष्म विराम पादकी लम्बाईके अनुसार अपेक्षित उच्चा- रणसुविधाके लिये एक बार या दो बार लयमें सौन्दर्य जैसे भी आए, वैसे किया जाता है। पादमें यह विच्छेद पदोंके छेदके रूपमें होता है, क्योंकि पाद पदसमुदाय ही होता है । पदोंका यह छेद लम्बे छन्दमें आवश्यकताके अनुसार निश्चित स्थानपर, निश्चित अक्षरसंख्यापर, विहित है । निश्चित स्थानपर भी पदच्छेदके कुछ नियम हैं । शिष्यबुद्धिवैशद्यार्थ वे सङ्क्षेपसे प्रस्तुत किये जा रहे हैं । विस्तारार्थ छन्दःशास्त्रकी हलायुधकी मृतसञ्जीवनी तथा अन्य छन्दोविषयक ग्रन्थ देखें । (१) विच्छेद (i) व्यक्त विभक्ति वाले पदपर या (ii) समासमें अव्यक्त विभक्ति वाले पदपर होना चाहिये ।² (२) पूर्वापर वर्णोंके एक वर्ण न होनेपर पदके मध्यमें भी यति हो सकती है । पदका यह मध्य तोड़नेपर श्रवणोंको कटु न लगे, यह अपेक्षित है । द्वयक्षर एवं त्र्यक्षर पदके मध्यमें यति नहीं करनी चाहिये । चतुरक्षर पदमें दो अक्षरोंके बाद उचित है । पदमध्ययति पादान्तमें नहीं होनी चाहिये ।³ (३) स्वरोंकी एकादेश सन्धिमें आदेशोपनत स्वरको कभी पूर्वशब्दका अन्तवत् माना जाता है । जैसे 'दिक्कालाद्य- नवच्छिन्नानन्त०' (नीतिशतक १), 'तदा सर्वज्ञोऽस्मीत्यभवदवलिप्तं मम मनः (वही ८) । कभी परशब्दका आदिवत् माना जाता है । जैसे 'स्कन्धे विन्ध्याद्रिबुद्ध्या निकषति महिष, स्याहितोऽसूनहार्षीत् । एकादेश सन्धिमें भी यह बात ध्यानमें रखें कि आदेशके अनन्तर पूर्व या पश्चात् एकाक्षर न रहे । जैसे—अस्या वक्त्राब्जमवजितपूर्णेन्दुशोभं विभाति ।⁴ (४) यणादेश सन्धिमें यणादेश परवर्ती पदका आदिवत् होता है ।⁵ जैसे शौर्ये वैरिणि वज्रमाशु निपतत्वर्थोऽस्ति नः केवलम् (नीतिशतक ३६) । (५) च, वा, ह, तु १. यतिः सर्वत्र पादान्ते, श्लोकार्थे तु विशेषतः । हलायुधटीका ६।१ २. समुद्रादिपदान्ते च व्यक्ताव्यक्तविभक्तिके । हलायुध ६।१ ३. क्वचित्तु पदमध्येऽपि समुद्रादौ यतिर्भवेत् । यदि पूर्वापरौ भागौ न स्यातामेकवर्णकौ ।। पदमध्ये यतिः पादान्ते मा भूत् । हलायुध ६।१ ४. पूर्वान्तवत् स्वरः सन्धौ, क्वचिदेव परादिवत् । हलायुध ६।१ ५. द्रष्टव्यो यतिचिन्तायां यणादेशः परादिवत् । हलायुध ६।१