भारतकोश
काव्यादर्श (महाकवि दण्डी - प्रसादिनी सान्वय हिन्दी व्याख्या सहित)

काव्यादर्श (महाकवि दण्डी - प्रसादिनी सान्वय हिन्दी व्याख्या सहित)

Kavyadarsha of Mahakavi Dandin with Prasadini Commentary

महाकवि दण्डी द्वारा

DevanagariHindipublished270 पृष्ठ

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पृष्ठ 204

३।१५२] ५ दोष : (७) यतिभ्रष्ट—यतिक स्वरूप १८१ तदपेतं यतिभ्रष्टं श्रवणोद्वे जनं, यथा ॥ १५२ ॥ उससे रहित, कानोंका उद्वेजक यतिभ्रष्ट दोष होता है। जैसे—॥ १५२ ॥ स्वरूप बताया है। आचार्य पिङ्गलने विच्छेदको यति बताया है।¹ श्लोक और तदन्तर्गत पदोंमें विच्छेद, उच्चारणविराम उच्चारणमें सुविधा और लयमें श्रुतिसुख लानेको किया जाता है। भरतने यति अर्थात् विराम के दो प्रकार बताये हैं : (१) छन्दःशास्त्रके नियमोंके अधीन किया जाने वाला (वृत्तपादसमुद्भव) विराम उच्चारण करने वालेके प्राणबलके अनुकूल² उच्चा- रणसुविधाके लिये होता है । अतः उन्होंने इसे 'प्राणवश विराम' कहा है । (२) अभिनयमें रस भावकी सम्यग् अभिव्यक्ति के लिये अर्थके किसी उचित अंशपर विराम 'अर्थवश विराम' होता है । उनकी दृष्टिमें अभिनयकी मुख्यताके कारण प्राणवशा यतिकी अपेक्षा अर्थवशा यति महत्त्वपूर्ण है । पद्यमय काव्यमें उसका महत्त्व नहीं होता । अतः छन्दःशास्त्रमें प्राणवशा यतिका ही विधान किया जाता है। भरतने विरामकी अवधि एक मात्रासे लेकर छह मात्रा तक बताई है।³ १. छन्दःशास्त्रे ६।१ : यतिर्विच्छेदः । नाट्यशास्त्रमें विराम (१७।१३० गद्यके बाद) भी देखें । २. इदमत्रावगन्तव्यमवधानविवर्जितः । यावन्ति शक्नुयाद्वक्तुमप्राणन्नेव मानवः ।। वेङ्कट, ऋग्भा ६।८।१।२१ तावद्भिरक्षरैरर्थः प्रायेण प्रतिपाद्यते । २२ ३. ये विरामाः स्मृता वृत्ते तेष्वलङ्कार* इष्यते । समाप्तेऽर्थे पदे वाऽपि, तथा प्राणवशेन वा ।। नाटच० १७।१३८ कार्यों विरामः पादान्ते, तथा प्राणवशेन वा । शेषमर्थवशेनैव विरामं संप्रयोजयेत् ।। १३६ कलाकालप्रमाणेण पाठ्यं कार्यं प्रयोक्तृभिः ।। १४१ शेषाणामर्थयोगेन विरामे विरमेदिह । एकद्वित्रिचतुष्पञ्चषट्कलं च विलम्बितम् ।। १४२ अथवा कारणोपेतं प्रयोगं कार्यमेव च । समीक्ष्य वृत्ते कर्तव्यो विरामो रसभावतः ।। १४४ ये विरामाः स्मृताः पाठ्ये वृत्तपादसमुद्भवाः । उत्क्रम्यापि क्रमं तज्ज्ञैः कार्यास्ते स्यू रसानुगाः ।। १४५ *उच्चो दीप्तश्च मन्द्रश्च नीचो द्रुतविलम्बितौ । पाठ्यस्यैते ह्यलङ्कारा लक्षणं च निबोधत ।। ११२