काव्यादर्श (महाकवि दण्डी - प्रसादिनी सान्वय हिन्दी व्याख्या सहित)
Kavyadarsha of Mahakavi Dandin with Prasadini Commentary
महाकवि दण्डी द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें१६६ काव्यादर्श [३।१३८ अन्य आचार्योंके मतमें एकार्थ—शब्दावली भिन्न होते हुए भी दण्डीके 'एकार्थ'का आधार भरतका एकार्थ है : एक अर्थका अभिधान 'एकार्थ' होता है ।' दण्डीने (१) भरतके 'एक' अर्थके अभिधानको 'अविशेषेण फिरसे कहना' के रूपमें स्पष्ट करके कहा है । (२) अर्थतः और शब्दतः भेदोंकी कल्पना तथा (३) मनोभावविशेषकी विवक्षामें अलङ्कृतित्वकी व्यवस्था भी दण्डी का स्वतन्त्र योगदान है । भामहने भी भरतका लक्षण ही शब्दभेदसे उसमें केवल (१) 'अन्योन्यं' ('आपस में') जोड़कर दिया है । इसके अतिरिक्त, (२) अन्यों (दण्डी) के 'शब्दतो वापि' भेदकथनको स्थूल होनेके कारण यहाँ उसका वर्णन उचित न समझकर केवल अर्थसे पुनरुक्तिको ही स्वीकार किया है । शब्दतः पुनरुक्ति विक्षिप्त ही कर सकता है ।' विक्षिप्तचित्तताके अतिरिक्त भय, शोक, ईर्ष्यामें और हर्ष तथा आश्चर्यमें भी जो 'जाओ, जाओ' जैसा कहना होता है, उसे 'पुनरुक्त' (दोष) नहीं कहते ।' यहाँ (दोषप्रकरणमें) अर्थसे जो पुनरुक्त होता है, वही 'एकार्थ' (दोष) इष्ट है । क्योंकि उक्तको पुनः कहनेपर अर्थप्रतीति रूप कार्य (प्रयोजन) सम्भव नहीं होता ।' जैसे—महलोंपर बादल द्वारा छोड़े (और) पतनालोंसे गिरने वाले पानीकी आवाज उस (सुन्दरी) को अवश्य ही उन्मन मनवाली बना रही है ।" भामहके इस निरूपणमें (१) भरतसे तो अभिन्नता है; अन्यों (दण्डी) के (२) शब्दतः एकार्थताका शिथिलसा खण्डन किया गया है, (३) चित्तवृत्तियों के आवेगमें शब्दतः पुनरुक्तिका उदाहरण देकर इसे आचार्यने दोष नहीं माना; इससे इन परिस्थितियोंमें आर्थिक पुनरुक्तिकी निर्दोषता भी उपलक्षित होती १. एकार्थस्याभिधानं यत्, तदेकार्थमिति स्मृतम् । नाटय० १६।६३ २. यदभिन्नार्थमन्योन्यं, तदेकार्थं प्रचक्षते । पुनरुक्तमिदं प्राहुरन्ये शब्दार्थभेदतः ।। काव्याल० ४।१२ न शब्दपुनरुक्तं तु स्थौल्यादत्रोपवर्ण्यते । कथमक्षिप्तचित्तः सन्नुक्तमेवाभिधास्यति ? ।। १३ ३. भयशोकाभ्यसूयासु, हर्षविस्मययोरपि । यथाऽऽह 'गच्छ, गच्छे'ति, पुनरुक्तं न तद् विदुः ।। काव्यालं० ४।१४ ४. अत्रार्थपुनरुक्तं यत्, तदेवैकार्थमिष्यते । उक्तस्य पुनराख्याने कार्यासम्भवतो, यथा ।। १५ ५. तामुन्मनमनसं नूनं करोति ध्वनिरम्भसाम् । सौधेषु घनमुक्तानां प्रणालीमुखपातिनाम् ।। १६