भारतकोश
काव्यादर्श (महाकवि दण्डी - प्रसादिनी सान्वय हिन्दी व्याख्या सहित)

काव्यादर्श (महाकवि दण्डी - प्रसादिनी सान्वय हिन्दी व्याख्या सहित)

Kavyadarsha of Mahakavi Dandin with Prasadini Commentary

महाकवि दण्डी द्वारा

DevanagariHindipublished270 पृष्ठ

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३।१६३] ५ दोष : (१०) देशादि-विरोध १६६ (घ) चराचराणां भूतानां प्रवृत्तिर्लोकसञ्ज्ञिता । (ङ) हेतुविद्याऽऽत्मको न्यायः, (च) सस्मृतिः श्रुतिरागमः ॥१६३॥ (घ) स्थावर-जङ्गमात्मक पदार्थोंकी प्रवृत्ति (व्यवहार) 'लोक' है । (ङ) कारणविद्या (तर्कशास्त्र) के रूपमें 'न्याय' होता है । (च i) स्मृतियों सहित (ii) श्रुति (मन्त्रब्राह्मणात्मक वेद) 'आगम' है ।। १६३ ।। गान्धर्वका प्रतिनिधित्व करने वाली गीत कलाका और (ii) ताल विधाकी उपलक्षक नृत्य कलाका कथन किया है । ये कलाएँ (१) पेशेवर प्रयोक्ताके लिए अर्थ-संश्रय हैं और (२ अ) आत्मतोषके लिए प्रयोग करने वालेके लिए तथा (आ) श्रोताके लिए काम-संश्रय हैं । ये तीनों प्रमेय भरतके 'लोक' नामक प्रमाणमें समाहित हैं । दण्डीने इन्हें पृथक् कर दिया है ।। १६२ ।। (घ) लोक—देश और कालरूप अधिष्ठान तथा कलाओंकी निष्पत्ति उनके आधेय तथा अनुष्ठाता स्थावर जङ्गम भोग्य और भोक्ता पदार्थोंके बिना निष्प्रयोजन है । इसलिये आचार्यने देश, काल और कलाके बाद स्थावरजङ्ग- मात्मक पदार्थोंको 'लोक'के नामसे बताया है । (i) स्थावर वृक्ष, लता, आदि उद्दीपन विभावके रूपमें और (ii) चेतन पदार्थ आलम्बन विभावके रूपमें काव्यमें अपने व्यवहारके माध्यमसे उपयोगी होते हैं । अतः चराचर अव्यक्त, अल्पव्यक्त और सुव्यक्त चैतन्य वाले पदार्थोंके अस्तित्वमात्रका नाम 'लोक' नहीं है । अपितु इनकी भोक्तृ-भोग्यके रूपमें प्रवृत्ति, व्यवहार ही लोकसे इष्ट है । वस्तुके स्वरूपावस्थानके बिना कोई भी व्यवहार सम्भव नहीं होता, अतः देशादिमें आधेय वस्तुओंका स्वरूप 'लोक'में पहले ही समाहित है । काव्यका विषय यही लोक है । समस्त आलम्बन, उद्दीपन विभाव, उनकी चेष्टाओंके रूपमें अनुभाव तथा उनके समस्त मनोजगत्में सञ्चरण करनेवाले संचारी भाव आदि इस लोकप्रवृत्तिका ही अङ्ग है । अतः लोकका ही अङ्ग हैं । नामाख्यातोपसर्गाश्च निपातास्तद्धिताः कृतः ।। १६ छन्दो-विधिरलङ्कारा ज्ञेयः पद-गतो विधिः । निबद्धं चानिबद्धं च द्विविधं तत्पदं स्मृतम् ।। १७ ध्रुवस्तवावापनिष्कामौ...पाद-मार्गाः स-पाणयः ।। १८-१६ इत्येकविंशतिविधं ज्ञेयं तालगतं बुधैः । २० अभिनवभारती २८।११ : "आश्रित-वाची 'विधा'-शब्द" इति चिरं- तनाः ।... तथा च विशाखिलाचार्यः— 'स्वर-पद-ताल-समवाये तु गान्धर्वम्' इति ।