काव्यादर्श (महाकवि दण्डी - प्रसादिनी सान्वय हिन्दी व्याख्या सहित)
Kavyadarsha of Mahakavi Dandin with Prasadini Commentary
महाकवि दण्डी द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें२०० काव्यादर्श [३।१६४ तेषु तेष्वयथारूढं यदि किञ्चित् प्रवर्तते । कवेः प्रमादाद् देशादिविरोधीत्येतदुच्यते ॥ १६४ ॥ उन-उन (देशादि) विषयोंमें कविके प्रमादसे यदि प्रसिद्धिके विपरीत कुछ (काव्यमें) होता है, तो वह (१०) देशादिविरोधी कहा जाता है ॥ १६४ ॥ (ङ) न्याय — 'हेतुविद्या' शब्द 'आन्वीक्षिकी'का पर्याय है, जो स्वयं 'दर्शनशास्त्र'का पर्याय है । कार्य-कारण सम्बन्धके विवेचनसे समस्त जगत्का अन्वीक्षण करनेसे यह विद्या 'कारणविद्या', 'हेतुविद्या', 'तर्कशास्त्र', 'अन्वी- क्षण', 'दर्शन' आदि शब्दोंसे अभिहित होती है ।¹ लोककी प्रवृत्ति तथा उसके प्रयोजनको सूक्ष्मतासे समझनेके लिये हेतुविद्याकी परम उपयोगिता है । अतः आचार्यने (घ) लोकके बाद तथा उससे पृथक् इसका निरूपण किया है । यह अन्य इसी प्रकारकी विद्याओंका उपलक्षक है । (च) आगम — विद्यास्वरूप होते हुए भी श्रुति और उसकी अविरोधी या विरोधी परम्परा (स्मृति) सदासे हेतुविद्यासे पृथक् एक प्रमाणके रूपमें मान्य रही है । यह उपलक्षक है इतिहास, पुराण तथा विभिन्न देशों, कालोंमें विभिन्न समाजोंमें विकसित सामाजिक शास्त्रोंका ॥ १६३ ॥ काव्यके इस षड्विध वर्ण्य विषयके यथार्थ, प्रमाणसिद्ध स्वरूपके विरुद्ध जो कुछ अपनी अशक्तिसे, या प्रमादसे कवि प्रतिपादित करता है, वह सब जिस-जिस विषयका विरोध उसमें होता है, उस-उसका विरोधी कहलाता है । सहृदय जनको उद्वेजक होनेसे यह दोष है । भामहने दण्डी जैसा विस्तार तो नहीं किया है, पर छहों भेदोंका निरूपण प्रायः दण्डीकी दिशामें ही किया है । वामनने सम्भवतः भरतके अधिक अनु- कूल होनेकी चेष्टामें (क) देश, काल और स्वभावसे विरोधीको देशविरोधी दोष बताया है । और (ख i) कलाशास्त्रों, तथा (ii) चतुर्वर्ग (धर्मार्थकाम- मोक्ष सम्बन्धी) शास्त्रोंसे विरोधीको 'विद्याविरुद्ध' नामक दोष बताया है ।² इस वर्णनमें वामनके (क) देश, काल एवं स्वभाव दण्डीके देश, काल एवं लोकप्रवृत्ति हैं ! (ख i) कलाशास्त्र दण्डीकी कला है । (ii) चतुर्वर्गशास्त्रमें दण्डीके न्याय और आगम समाहित हैं । १६४ ॥ १. तर्कसङ्ग्रह तारोदय, भूमिका, पृष्ठ चार देखें । २. काव्याल० सूत्र २।२।२३-२४ : (क) देशकालस्वभावविरुद्धार्थानि लोक- विरुद्धानि । (ख) कला-चतुर्वर्गशास्त्र-विरुद्धार्थानि विद्याविरुद्धानि ।