काव्यादर्श (महाकवि दण्डी - प्रसादिनी सान्वय हिन्दी व्याख्या सहित)
Kavyadarsha of Mahakavi Dandin with Prasadini Commentary
महाकवि दण्डी द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें३।१६५] ५. दोष : (१० क. अ) अद्रि-देशविरोध २०१
(१० क. अ) 'कर्पूर पादपामर्श-सुरभिर्मलयानिलः' । (आ) 'कलिङ्ग-वन-सम्भूता मृग-प्राया मतङ्गजाः' ।। १६५ ।। (१०. क. अ) 'मलयानिल कपूरके पेड़ोंको छूनेसे सुगन्धित है' । (आ) कलिङ्ग देशके वनोंमें उत्पन्न हाथी प्रायः मृग जातिके, अथवा मृगों जैसे छोटे, होते हैं' ।। १६५ ।। (१० क.) देशविरोध--(अ) अद्रिविरोध : 'मलय' शब्द दक्षिणमें (तमिलमें) 'पर्वत' का वाचक है । उत्तर भारतमें (संस्कृतमें) यह शब्द दक्षिण के एक पर्वतविशेषके लिये रूढ हो गया है, जिसकी प्रसिद्धि यह है कि वहाँ चन्दनके वृक्ष होते हैं । दक्षिणसे आनेवाली हवा उन्हें छूकर आती है, इसलिये सुगन्धित होती है । प्रकृत १६५वें श्लोकके पूर्वार्धमें मलयानिलकी सुरभिता चन्दनसे न बताकर कपूरके पेड़ोंके स्पर्शसे बताई है । यह यथार्थ नहीं है । क्योंकि (१) कपूरके पेड़ नहीं होते । (२) मलयाद्रिकी कर्पूरपादपके अधिष्ठानके रूपमें प्रसिद्धि भी नहीं है । अतः यहाँ अद्रिरूप देशका अयथार्थ (प्रत्यक्षप्रमाणविरुद्ध) वर्णन करनेके कारण देशविरोधिता दोष है । (आ) वन-विरोधी : श्लोकके उत्तरार्धमें दक्षिणापथके दण्डकारण्य जैसे कलिङ्गवन, अपरनाम 'महाकान्तार', के दक्षिणपूर्वी भागके एक प्रदेशको बहुत प्राचीन कालसे 'कलिङ्ग' कहा जाता था । इसके जङ्गलोंमें पाये जानेवाले हाथी श्रेष्ठ जातिके माने जाते थे ।१ हाथियोंकी आठ जातियोंमें से श्रेष्ठ जातिका नाम 'भद्र' है । उनका डीलडौल विशाल होता है ।२ उन्हें कविने 'मृगप्राय' कहा है । इसके दो अर्थ हो सकते हैं : कलिङ्गवनोंमें उत्पन्न हाथी (१) विशालकाय होनेके बजाय मृगोके समान ह्रस्वाकार होते हैं; (२) वे 'भद्र' जातिके होनेके बजाय गजोंकी तृतीय 'मृग' जातिके होते हैं । रत्नश्रीज्ञानने हाथियोंकी 'भद्र'के समान 'मृग' भी एक जाति बताई है ।३ जिस प्रकार पुरुषों के बलाबल, आकार, स्वभाव आदिके आधारपर शश, मृग, वाजी आदि भेद १. कालिङ्गाङ्गगजाः श्रेष्ठाः प्राच्याश्चेति करूषजाः । अर्थशास्त्र २।२ २. भद्रात्मनो दुरधिरोहतनोर्विशालवंशोन्नतेः....। काव्यप्रकाश २।१२ वामनझळकीकरटीका : 'भद्रो, मन्दो, मृगश्च' इत्युक्त्वा 'एतेऽष्टौ गजयोनयः ।' इत्युक्तेः । ३. रत्नश्री ३।१६५ : मृगप्रायाः--'मृग'-लक्षणा हस्तिजातिः प्राया भूयसी येषां, तया वा प्रायाः समधिका मृगप्रायाः । ...कलिङ्गवनजन्मनां हस्तिनां भद्रजातिप्रायत्वात् ।