भारतकोश
काव्यादर्श (महाकवि दण्डी - प्रसादिनी सान्वय हिन्दी व्याख्या सहित)

काव्यादर्श (महाकवि दण्डी - प्रसादिनी सान्वय हिन्दी व्याख्या सहित)

Kavyadarsha of Mahakavi Dandin with Prasadini Commentary

महाकवि दण्डी द्वारा

DevanagariHindipublished270 पृष्ठ

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पृष्ठ 225

२०२ काव्यादर्श [३।१६६ (इ) 'चोलाः कालागुरुश्यामाः कावेरीतीरभूमयः ।' इति देशविरोधिन्‍या वाचः प्रस्थानमीदृशम् ॥ १६६ ॥ (इ) 'कावेरी नदीके किनारोंकी धरती वाला 'चोल' नामक जनपद काले अगरसे श्याम है ।' देशके विरोधवाली उक्तिका स्वरूप ऐसा होता है ॥ १६६ ॥ बताये गये हैं, इसी प्रकार गजोंके भद्र, मृग आदि आठ भेद गजशास्त्रमें प्रोक्त हैं । दोनों ही अर्थोंमें यहाँ वनरूप देशका विरोध है : कलिङ्गवनोंमें जब छोटे आकार वाले या मृग जातिके दन्तावल होते ही नहीं, तब वहाँ उन्हें बताना देशविरोध है ॥ १६५ ॥ (इ) राष्ट्रविरोधी कथन : प्रकृत उदाहरण (१६६वें श्लोक)में दण्डीने (क) देशके तृतीय भेद राष्ट्रके विरोधका उदाहरण दिया है । (१) कालागुरु वृक्षों (Aquilaria Agallocha, अपरनाम Aloe Wood, Eagle Wood)की उत्पत्ति भारतवर्षमें उत्तरापथमें भूटानमें, पूर्वमें बंगालमें तथा असमके पहाड़ी क्षेत्रों खसिया, गारो, नाग, कछार और सिल्हटमें ही होती है ।¹ दक्षिणापथमें नहीं । सफेद अगरसे काला अगर उत्तम होता है ।² यह सिल्हटमें सर्वोत्तम होता है । अतः उत्तरापथमें होनेवाली वस्तुको दक्षिणा- पथके एक जनपद चोलमें बताना राष्ट्रविरोध दोष है । (२) दण्डीको यदि इतना ही कहना अभीष्ट होता, तो वे दक्षिणापथको सामान्य रूपसे ही कहते । इससे प्रतीत होता है कि 'चोल जनपदमें' कहनेसे उन्हें कुछ विशेष अभिप्रेत है । वह विशेष यह है कि दक्षिणापथमें चेर और चोल जातिके राजाओंका उच्छेद करके बादामी (वातापी) में चालुक्यों, काञ्चीमें पल्लवों और मदुरामें पाण्ड्योंका राज्य लगभग तीन (छठीसे नौवीं) शती तक रहा । इनमेंसे पूर्वकालमें चोलाधीन कावेरीतीर-भूमि उरैयुर तकका प्रदेश पल्लवसाम्राज्यका भाग था । दण्डीके समय यह परमप्रतापी नरसिंहवर्मा द्वितीय, अपरनाम राजसिंह, के अधीन था ।³ अतः पल्लवाधीन कावेरीतीर- भूमिको चोलाधीन देश कहनेसे भी राष्ट्रविरोध दोष है । चोलोंका अभ्युदय १. काउंसिल आफ साइण्टिफिक एण्ड इण्डस्ट्रियल रिसर्च, दिल्ली, १९४८ : दी वैल्थ आफ इण्डिया, भाग १, पृष्ठ ८६ । २. कृष्णं गुणाधिकं तत्तु लोहवद् वारि मज्जति । भावप्रकाश १।६।२३ ३. श्रीनीलकण्ठ शास्त्री, ए हिस्ट्री आफ साउथ इण्डिया, अध्याय ७-६ ।