भारतकोश
काव्यादर्श (महाकवि दण्डी - प्रसादिनी सान्वय हिन्दी व्याख्या सहित)

काव्यादर्श (महाकवि दण्डी - प्रसादिनी सान्वय हिन्दी व्याख्या सहित)

Kavyadarsha of Mahakavi Dandin with Prasadini Commentary

महाकवि दण्डी द्वारा

DevanagariHindipublished270 पृष्ठ

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पृष्ठ 229

२०६ काव्यादर्श [३।१७० शृङ्गारके व्यभिचारी अलबत्ता हो सकते हैं । उनके परिहारके लिये 'स्थायिनो' विशेषण आचार्यने दिया है । (ii) सङ्गीत कलाके विरोधका उदाहरण : गान्धर्व शास्त्रमें गान और वाद्य (तन्त्री) में षड्ज, ऋषभ, गान्धार, पञ्चम, धैवत, निषादवान्, (निषाद) ये सात स्वर (स, रि, ग, म, प, ध, नि) होते हैं ।१ इनके समूहको 'सप्तक' कहते हैं । संवादी स्वरोंका वह समूह ग्राम है, जिसमें श्रुतियाँ व्यवस्थित रूपमें विद्यमान हों और जो मूर्च्छना, तान, वर्ण, क्रम, अलङ्कार इत्यादिका आश्रय हो ।२ प्राचीन कालमें षड्ज, मध्यम, गान्धार नामक तीन ग्राम होते थे । भरत ने षड्ज और मध्यम दो ही ग्राम माने हैं ।३ गान्धार ग्राममें तार और मन्द्र सप्तकोंकी (१) अधिकताके कारण और (२) वैस्वर्यके कारण भरतने उसे नहीं अपनाया है ।४ दूसरे शब्दोंमें, गान्धार ग्राम अपने इन दोषोंके कारण लोकप्रिय नहीं रह सका, स्वर्ग सिधार गया ।५ इससे स्पष्ट है कि ग्राम होता ही वह है, जिसमें सातों स्वर पूर्ण हों ।६ किन्तु परवर्ती कुछ आचार्य, जैसे बृहद्देशीके प्रणेता मतङ्ग (६-७वीं सदी ई०) छह स्वरों वाले 'षाडव' और 'औडुवित' नामक तानोंको७ भी 'ग्राम' कहने लगे । प्रसिद्ध ग्रामों से भेद १. षड्जश्च, ऋषभश्चैव, गान्धारो, मध्यमस्तथा । पञ्चमो धैवतश्चैव सप्तमोऽथ निषादवान् ॥ नाटच० २८।२१ अमरकोष (१।७।१) में यह क्रम सम्भवतः छन्दोनुरोधसे तोड़ा है : निषादर्भगान्धारषड्जध्यमधैवताः । पञ्चमश्चेत्यमी सप्त तन्त्री-कण्ठोत्थिताः स्वराः ॥ २. भरतका सङ्गीतसिद्धान्त, पृष्ठ ५ । तथा अभिनवभारती १८।५ । ३. नाट्यशास्त्र २८।२४से पूर्व : अथ द्वौ ग्रामौ— षड्जग्रामो मध्यमग्राम- श्चेति । अत्राश्रिता द्वाविंशतिः श्रुतयः स्वरमण्डलसाधिकाः* । अभिनव- भारती : 'अथ द्वौ ग्रामौ' इति गान्धारग्रामं निरस्यति । *बड़ौदासंस्करणमें 'साधिता' स्वीकृत है; 'सघिका' (शुद्ध रूप 'साधिकाः') पाठभेद पादटिप्पणीमें दिया है । 'स्वरमण्डलस्य = स्वर- समूहस्य = सप्तकस्य द्वाविंशत्यैव सिद्धिः' (अभिनवभारती) में 'साधिकाः' पाठ ही व्याख्यात है । ४. द्वौ ग्रामौ भरतेनोक्तौ, ग्रामो गान्धारपूर्वकः । अतितारातिमन्द्रत्वाद् वैस्वर्यान्नोपदर्शितः ॥ भरतकोश पृष्ठ १८६ ५. प्रवर्त्तते स्वर्गलोके ग्रामोऽसौ न महीतले ॥ संगीतदर्पण ८० ६. ग्रामौ पूर्णस्वरौ द्वौ तु, यथा वै षड्जमध्यमौ । नाटचशास्त्र १८।६ ७. क्रमयुक्ताः स्वराः सप्त मूर्च्छनेत्यभिसञ्जिताः । षट्-पञ्च-स्वरकास्तानाः षाडवौडुदिताश्रयाः ॥ नाट्यशास्त्र २८।३२