काव्यादर्श (महाकवि दण्डी - प्रसादिनी सान्वय हिन्दी व्याख्या सहित)
Kavyadarsha of Mahakavi Dandin with Prasadini Commentary
महाकवि दण्डी द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें३।१७३-१७४] ५ दोष : (१० ङ) न्याय-विरोध २११ (ङ) विरोधो हेतुविद्यासु न्यायाख्यासु निदर्श्यते ॥ १७३ ॥ (अ) सत्यमेवाह सुगतः संस्कारानविनश्वरान् । (ङ) 'न्याय' नामक हेतु विद्याओं (दर्शनशास्त्र, आन्वीक्षिकी) के विषय में विरोधका प्रदर्शन किया जा रहा है ॥ १७३ ॥ (अ) 'बुद्धने संस्कारोंको नष्ट नहीं होने वाला ठीक ही कहा है, क्योंकि भामहने लोकका विभाजन दण्डीके समान स्थावर और जङ्गमके रूपमें करके उसके व्यवहारको 'लोक' कहा है । लोकव्यवहारका विरोध लोक- विरोध दोष बताया है । इसके उन्होंने दो उदाहरण दिये हैं : (i) स्थावर नदीकी प्रवृत्तिका; (ii) जङ्गम सेनाओंके व्यवहारका । दोनों प्रत्यक्षसे असिद्ध हैं ।¹ (ङ) न्यायविरोध—प्रमाणोंसे पदार्थके स्वरूपकी परीक्षा करना 'न्याय' होता है ।² इस परीक्षामें हेतु, कारण, तर्क, युक्तिका मुख्यतया उपयोग होने से इसे हेतुविद्या भी कहते हैं ।³ अश्वघोषने दशतोन्मुख पुरुषको 'हेतुबला- धिक' कहा है ।⁴ इस हेतुविद्या, अपरनाम न्यायविद्या, से दर्शनशास्त्र अभिप्रेत है, वह चाहे आस्तिक (वेदानुकूल) हो, चाहे नास्तिक (वेदनिन्दक या ईश्वरका या परलोकका अस्तित्व न मानने वाला) हो । इस प्रकार 'न्याय' शब्द यहाँ दर्शनकी शाखाविशेषके लिये प्रयुक्त नहीं है, अपितु सामान्यस्वरूप- परक है⁵ ॥ १७३ ॥ (अ) आचार्यने प्रथम उदाहरण नास्तिक (वेदनिन्दक) हेतुविद्याके विरोध १. स्थास्नु-जङ्गम-भेदेन लोकं तत्त्वविदो विदुः । स च तद्व्यवहारोऽत्र, तद्विरोधकरं यथा ।। काव्याल० ४।३६ (i) तेषां कट-तट-भ्रष्टैर्गजानां मद-बिन्दुभिः । प्रावर्तत नदी घोरा हस्त्यश्वरथवाहिना ।। ३७ (ii) धावतां सैन्यवाहानां फेनवारि मुखच्युतम् । चकार जानुदघ्नापान् प्रति दिङ्मुखमध्वनः ।। २. न्यायसूत्र १।१।१ पर वात्स्यायन : प्रमाणैरर्थपरीक्षणं न्यायः । ३. ललितविस्तर, अध्याय १२, पृष्ठ १५६, में साङ्ख्य, योग, वैशेषिकके अतिरिक्त हेतुविद्याका उल्लेख कदाचिद् न्यायविद्या (तर्कशास्त्र) के लिये किया है । यहाँ सामान्य 'दर्शन शास्त्र' अर्थमें प्रयुक्त हुआ है । ४. सङ्क्लेशपक्षो द्विविधश्च दृष्टस्तथा द्विकल्पो व्यवदानपक्षः । आत्माश्रयो हेतुबलाधिकस्य बाह्याश्रयः प्रत्ययगौरवस्य ।। सौ० ५।१६ ५. विशेषार्थ देखें तर्कसङ्ग्रहतरङ्गिणी, भूमिका, पृष्ठ चार-पाँच ।