काव्यादर्श (महाकवि दण्डी - प्रसादिनी सान्वय हिन्दी व्याख्या सहित)
Kavyadarsha of Mahakavi Dandin with Prasadini Commentary
महाकवि दण्डी द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें२१० काव्यादर्श [३।१७२-१७३ (घ i) 'आधूतकेसरो हस्ती, (ii) तीक्ष्णशृङ्गस्तुरङ्गमः । (iii) गुरुसारोऽयमेरण्डो, (iv) निःसारः खदिरद्रुमः ॥ १७२ ॥ इति लौकिक एवायं विरोधः सर्वगर्हितः । (घ) 'हाथी हिलाई हुई सटाओं (अयाल) वाला है। (ii) घोड़ा तीखे सींगों वाला है । (iii) यह एरण्ड वृक्ष बहुत मजबूत है । (iv) खैरका वृक्ष निर्बल है ॥ १७२ ॥ यह लोकमें उपलब्ध विरोध सबके द्वारा निन्दित है । ग्रामके शास्त्रोक्त स्वरूपके विपरीत स्वरूपका वर्णन उदाहरणके रूपमें प्रस्तुत किया है।' दण्डीका कलाविरोधनिरूपण अधिक सूचनापूर्ण तथा शास्त्रके विकासकी प्रक्रियाको प्रस्तुत करता है ॥ १७१ ॥ (घ) लोकविरुद्ध दोष—आचार्यने इस दोषको स्वतः स्पष्ट चार उदाहरण देकर स्पष्ट किया है। (i) 'केसर' (अथवा 'केशर') पशुओंमें सिंहों की या घोड़ोंकी गरदनपर 'अयाल' के नाम से प्रसिद्ध होता है। हाथीके नहीं होता । हाथीकी विशेषता सूँड (शुण्डा) है, जिसे हाथका काम करनेके कारण 'कर' या 'हस्त' कहा जाता है। या फिर आगेको निकले दाँत होते हैं। इन दोनों विशेषताओंके कारण गजको करी, हस्ती (हाथी) और दन्ती, दन्तावल कहा जाता है। (i) हाथीके अयाल और (ii) घोड़ेके सींग लोकमें प्रत्यक्षविरुद्ध हैं। (iii) इसी प्रकार एरण्ड (रेंडी) वृक्ष बहुत कमजोर तने और कम गहरी जड़ों वाला होता है। जबकि (iv) खैरका वृक्ष इसके विपरीत है। इस प्रकार आचार्यने वन्य और ग्राम्य पशुओं और ग्राम्य और वन्य वृक्षोंके एकेक उदाहरण देकर इस दोषका स्वरूप स्पष्ट किया है। १. कला संकलना प्रज्ञा, शिल्पान्यस्याश्च गोचरः । विपर्यस्तं तथैवाहुस्तद्विरोधकरं, यथा ॥ काव्यालङ्कार ४।३३ ऋषभात्पञ्चमस्तस्मात् षड्जं धैवतं स्मृतम् । अयं हि मध्यमग्रामो मध्यमोत्पीडितर्षभः ॥ ३४ इति साधारितं मोहादन्यथैवावगच्छति । अन्यास्वपि कलास्वेवमभिधेया विरोधिता ॥ ३५ षड्ज आदि स्वर पुँल्लिङ्ग हैं। भामहने षड्ज और धैवतको नपुंसक न जाने किस आधारपर दिया है। उदाहरणका भाष्य देवेन्द्रनाथ शर्माजीके महाभाष्यमें देखें ।