काव्यादर्श (महाकवि दण्डी - प्रसादिनी सान्वय हिन्दी व्याख्या सहित)
Kavyadarsha of Mahakavi Dandin with Prasadini Commentary
महाकवि दण्डी द्वारा
२१० काव्यादर्श [३।१७२-१७३ (घ i) 'आधूतकेसरो हस्ती, (ii) तीक्ष्णशृङ्गस्तुरङ्गमः । (iii) गुरुसारोऽयमेरण्डो, (iv) निःसारः खदिरद्रुमः ॥ १७२ ॥ इति लौकिक एवायं विरोधः सर्वगर्हितः । (घ) 'हाथी हिलाई हुई सटाओं (अयाल) वाला है। (ii) घोड़ा तीखे सींगों वाला है । (iii) यह एरण्ड वृक्ष बहुत मजबूत है । (iv) खैरका वृक्ष निर्बल है ॥ १७२ ॥ यह लोकमें उपलब्ध विरोध सबके द्वारा निन्दित है । ग्रामके शास्त्रोक्त स्वरूपके विपरीत स्वरूपका वर्णन उदाहरणके रूपमें प्रस्तुत किया है।' दण्डीका कलाविरोधनिरूपण अधिक सूचनापूर्ण तथा शास्त्रके विकासकी प्रक्रियाको प्रस्तुत करता है ॥ १७१ ॥ (घ) लोकविरुद्ध दोष—आचार्यने इस दोषको स्वतः स्पष्ट चार उदाहरण देकर स्पष्ट किया है। (i) 'केसर' (अथवा 'केशर') पशुओंमें सिंहों की या घोड़ोंकी गरदनपर 'अयाल' के नाम से प्रसिद्ध होता है। हाथीके नहीं होता । हाथीकी विशेषता सूँड (शुण्डा) है, जिसे हाथका काम करनेके कारण 'कर' या 'हस्त' कहा जाता है। या फिर आगेको निकले दाँत होते हैं। इन दोनों विशेषताओंके कारण गजको करी, हस्ती (हाथी) और दन्ती, दन्तावल कहा जाता है। (i) हाथीके अयाल और (ii) घोड़ेके सींग लोकमें प्रत्यक्षविरुद्ध हैं। (iii) इसी प्रकार एरण्ड (रेंडी) वृक्ष बहुत कमजोर तने और कम गहरी जड़ों वाला होता है। जबकि (iv) खैरका वृक्ष इसके विपरीत है। इस प्रकार आचार्यने वन्य और ग्राम्य पशुओं और ग्राम्य और वन्य वृक्षोंके एकेक उदाहरण देकर इस दोषका स्वरूप स्पष्ट किया है। १. कला संकलना प्रज्ञा, शिल्पान्यस्याश्च गोचरः । विपर्यस्तं तथैवाहुस्तद्विरोधकरं, यथा ॥ काव्यालङ्कार ४।३३ ऋषभात्पञ्चमस्तस्मात् षड्जं धैवतं स्मृतम् । अयं हि मध्यमग्रामो मध्यमोत्पीडितर्षभः ॥ ३४ इति साधारितं मोहादन्यथैवावगच्छति । अन्यास्वपि कलास्वेवमभिधेया विरोधिता ॥ ३५ षड्ज आदि स्वर पुँल्लिङ्ग हैं। भामहने षड्ज और धैवतको नपुंसक न जाने किस आधारपर दिया है। उदाहरणका भाष्य देवेन्द्रनाथ शर्माजीके महाभाष्यमें देखें ।
३।१७८] ५. दोष : (१० च) आगमविरोध २१५ (ii) असावनुपनीतोऽपि वेदानधिजगे गुरोः । स्वभावशुद्धः स्फटिको न संस्कारमपेक्षते ॥ १७८ ॥ (ii) उसने उपनयन संस्कारसे रहित होते हुए भी गुरुसे वेदोंका अध्ययन किया । स्वभावसे शुद्ध (स्वच्छ) स्फटिक मणिको संस्कार (पालिश) की जरूरत नहीं होती ॥ १७८ ॥ इसे वैश्वानरी इष्टि कहते हैं । इस इष्टिमें अग्निका आधान आवश्यक है । ब्राह्मण यजमान और उसकी पत्नी दोनों क्षौम वस्त्र धारण करके वसन्त ऋतुमें आहवनीय अग्निका आधान करें ।¹ इस प्रकार अग्निका आधान करने वाले ब्राह्मण दम्पति आहिताग्नि कहलाते हैं । प्रकृत उदाहरणमें अग्न्याधान नहीं करने वाले विप्रोंको, और वह भी शास्त्रशुद्ध आचरण करने वाले विप्रों को, वैश्वानरी इष्टिका अनुष्ठान करता बताया है । अतः श्रुतिरूप आगमका विरोध यहाँ स्पष्ट है । इसके अतिरिक्त, इस कथनका एक आशय और हो सकता है : श्रौत परम्पराके अनुसार विप्रोंको स्नातक होनेके बाद अग्न्याधान करके योग्य पत्नीका पाणिग्रहण करनेके बाद ही सन्तानोत्पत्ति करनी चाहिए । ये ब्राह्मण यद्यपि शास्त्रानुसारी शुद्ध आचार वाले हैं, तथापि इन्होंने (१) अग्न्याधान किये बिना घरमें औरत लाकर (२) उनसे स्वेच्छाचारसे पुत्र प्राप्त कर लिये । (३) अब वे लोग वह वैश्वानरी इष्टि कर रहे हैं, जो विधिवद् आहिताग्नि अजातपुत्र पुरुषके द्वारा पहले सन्तानोत्पत्तिका निमित्त और फिर पुत्र हो जाने पर की जानी चाहिये । इस प्रकार इस श्लोकमें श्रुतिविरोध नाना प्रकार से है । वितन्वते—वि + √ तन् विस्तारे, कर्तरि लट्, प्र० पु० ब० व० । श्रौत (आहित) अग्नियोंमें यज्ञकर्म करनेके लिये वि + √ तन्का प्रयोग शास्त्रमें किया जाता है । इसीलिये श्रौत यज्ञोंको ‘वितान’ कहते हैं² ॥ १७७ ॥ (ii) स्मृतिविरोध—मनुस्मृति आदि धर्मशास्त्रोंके अनुसार एक उचित वयस् तक गुरुसे उपनयन संस्कार प्राप्त नहीं करने वाला द्विज न केवल वेदा- १. तैत्तिरीय ब्राह्मण १।२।६ : वसन्ता ब्राह्मणोऽग्निमादधीत । वसन्तो वै ब्राह्मणस्यर्तुः । आपस्तम्ब श्रौतसूत्र ५।४।१० : क्षौमे वसानौ जाय-पती अग्निमादधीयाताम् । २. अमरकोष ३।३।१९३ : क्रतुविस्तारयोरस्त्री, वितानं त्रिषु तुच्छके ॥
२१४ काव्यादर्श [३।१७६-१७७ (च) अथागमविरोधस्य प्रस्थानं दर्शयिष्यते ॥ १७६ ॥ (i) ‘अनाहिताग्नयोऽप्येते जातपुत्रा वितन्वते । विप्रा वैश्वानरीमिष्टमक्लिष्टाचारभूषणाः’ ॥ १७७ ॥ (च) अब आगमविरोधका स्वरूप (उदाहरणोंसे) प्रदर्शित किया जायेगा ॥ १७६ ॥ (i) ‘अग्न्याधान नहीं करने वाले भी उत्पन्न हुए पुत्रों वाले, सरल, शुद्ध आचरण रूपी अलङ्कारों वाले ये ब्राह्मण वैश्वानरीया इष्टि (श्रौत याग) का अनुष्ठान कर रहे हैं ॥ १७७ ॥ अन्तर्गत भी उन्होंने धर्मशास्त्रों और उनके द्वारा विहित लोकमर्यादाको लिया है । आन्वीक्षिकीकी कहीं चर्चा नहीं है ।¹ (३) वस्तुतः धर्मशास्त्रकी गणना त्रिवर्गोक्तिरूप शास्त्र अर्थात् न्यायके रूपमें की ही जा चुकी है । अतः आगम- विरोधी (धर्मशास्त्र और तत्कृत लोकमर्यादाओंका विरोध करना) दोषका पृथक्से उल्लेख स्ववचनविरोध है । इस प्रकार भामहका इन दोषोंका निरूपण शिथिल है, युक्तिसङ्गत नहीं है । दण्डनीतिका सम्बन्ध केवल धर्म या अर्थसे है । कामपुरुषार्थसे सम्बन्ध है कामशास्त्रका । तत्सम्बन्धी दोष कलाविरोधमें या आगमविरोधमें समाहित हो जायेगा । तब, यहाँ उसके पुनः कथनकी आवश्यकता ही नहीं है । (च) आगमविरोध—दण्डीने ‘आगम’के अन्तर्गत मनुष्यके लिये व्यक्तिगत और सामाजिक आचारकी विधायक (i) श्रुति और (ii) स्मृतिको लिया है, यह पीछे ‘आगम’के लक्षणमें देख चुके हैं । यहाँ इन दोनोंके एकेक उदा- हरण आचार्यने अगले दो श्लोकोंमें प्रस्तुत किये हैं : (i) श्रुतिविरोध : तैत्तिरीय संहिताके अनुसार शास्त्रानुसार प्रजोत्पादनके योग्य (शास्त्रीय पद्धतिसे अग्न्याधान करके दारकर्म कर चुके) पुरुषको सन्तान नहीं है और सन्तानकी इच्छा है, तो वह अग्न्याधान करके वैश्वानर देवताके निमित्त द्वादश कपालोंपर संस्कृत पुरोडाशका निर्वाप (आहुति दे) । और फिर पुत्र होनेपर वैश्वानरके निमित्त द्वादशकपाल पुरोडाशकी आहुति दे ।² १. आगमो धर्मशास्त्राणि लोकसीमा च तत्कृता । तद्विरोधि तदाचारव्यतिक्रमणतो, यथा ॥ काव्याल० ४।४८ २. तैत्तिरीय संहिता २।२।५।१-३ : वैश्वानरं द्वादशकपालं निर्वपेत् ।... एतामेव निर्वपेत् प्रजाकामः ।...योऽलं प्रजायै सन् प्रजां न विन्दते । यद् वैश्वानरो द्वादशकपालो भवति ।...विन्दते प्रजाम् । वैश्वानरं द्वादश- कपालं निर्वपेत्...पुत्रे जाते ।
३।१७८] ५. दोष : (१० च) आगमविरोध २१५ (ii) असावनुपनीतोऽपि वेदानधिजगे गुरोः । स्वभावशुद्धः स्फटिको न संस्कारमपेक्षते ॥ १७८ ॥ (ii) उसने उपनयन संस्कारसे रहित होते हुए भी गुरुसे वेदोंका अध्ययन किया । स्वभावसे शुद्ध (स्वच्छ) स्फटिक मणिको संस्कार (पालिश) की जरूरत नहीं होती ॥ १७८ ॥ इसे वैश्वानरी इष्टि कहते हैं । इस इष्टिमें अग्निका आधान आवश्यक है । ब्राह्मण यजमान और उसकी पत्नी दोनों क्षौम वस्त्र धारण करके वसन्त ऋतुमें आहवनीय अग्निका आधान करें । १ इस प्रकार अग्निका आधान करने वाले ब्राह्मण दम्पति आहिताग्नि कहलाते हैं । प्रकृत उदाहरणमें अग्न्याधान नहीं करने वाले विप्रोंको, और वह भी शास्त्रशुद्ध आचरण करने वाले विप्रों को, वैश्वानरी इष्टिका अनुष्ठान करता बताया है । अतः श्रुतिरूप आगमका विरोध यहाँ स्पष्ट है । इसके अतिरिक्त, इस कथनका एक आशय और हो सकता है : श्रौत परम्पराके अनुसार विप्रोंको स्नातक होनेके बाद अग्न्याधान करके योग्य पत्नीका पाणिग्रहण करनेके बाद ही सन्तानोत्पत्ति करनी चाहिए । ये ब्राह्मण यद्यपि शास्त्रानुसारी शुद्ध आचार वाले हैं, तथापि इन्होंने (१) अग्न्याधान किये बिना घरमें औरत लाकर (२) उनसे स्वेच्छाचारसे पुत्र प्राप्त कर लिये । (३) अब वे लोग वह वैश्वानरी इष्टि कर रहे हैं, जो विधिवद् आहिताग्नि अजातपुत्र पुरुषके द्वारा पहले सन्तानोत्पत्तिका निमित्त और फिर पुत्र हो जाने पर की जानी चाहिये । इस प्रकार इस श्लोकमें श्रुतिविरोध नाना प्रकार से है । वितन्वते—वि + √ तन् विस्तारे, कर्तरि लट्, प्र० पु० ब० व० । श्रौत (आहित) अग्नियोंमें यज्ञकर्म करनेके लिये वि + √ तन्का प्रयोग शास्त्रमें किया जाता है । इसीलिये श्रौत यज्ञोंको ‘वितान’ कहते हैं२ ॥ १७७ ॥ (ii) स्मृतिविरोध—मनुस्मृति आदि धर्मशास्त्रोंके अनुसार एक उचित वयस् तक गुरुसे उपनयन संस्कार प्राप्त नहीं करने वाला द्विज न केवल वेदा- १. तैत्तिरीय ब्राह्मण १।२।६ : वसन्ता ब्राह्मणोऽग्निमादधीत । वसन्तो वै ब्राह्मणस्यर्तुः । आपस्तम्ब श्रौतसूत्र ५।४।१० : क्षौमे वसानौ जाय-पती अग्निमादधीयाताम् । २. अमरकोष ३।३।११३ : क्रतुविस्तारयोरस्त्री, वितानं त्रिषु तुच्छके ॥
२१४ काव्यादर्श [३।१७६-१७७
(च) अथागमविरोधस्य प्रस्थानं दर्शयिष्यते ॥ १७६ ॥ (i) 'अनाहिताग्नयोऽप्येते जातपुत्रा वितन्वते । विप्रा वैश्वानरीमिष्टमक्लिष्टाचारभूषणाः' ॥ १७७ ॥ (च) अब आगमविरोधका स्वरूप (उदाहरणोंसे) प्रदर्शित किया जायेगा ॥ १७६ ॥ (i) 'अग्न्याधान नहीं करने वाले भी उत्पन्न हुए पुत्रों वाले, सरल, शुद्ध आचरण रूपी अलङ्कारों वाले ये ब्राह्मण वैश्वानरीया इष्टि (श्रौत याग) का अनुष्ठान कर रहे हैं ॥ १७७ ॥ अन्तर्गत भी उन्होंने धर्मशास्त्रों और उनके द्वारा विहित लोकमर्यादाको लिया है । आन्वीक्षिकीकी कहीं चर्चा नहीं है ।१ (३) वस्तुतः धर्मशास्त्रकी गणना त्रिवर्गोक्तिरूप शास्त्र अर्थात् न्यायके रूपमें की ही जा चुकी है। अतः आगम- विरोधी (धर्मशास्त्र और तत्कृत लोकमर्यादाओंका विरोध करना) दोषका पृथक्से उल्लेख स्ववचनविरोध है । इस प्रकार भामहका इन दोषोंका निरूपण शिथिल है, युक्तिसङ्गत नहीं है। दण्डनीतिका सम्बन्ध केवल धर्म या अर्थसे है । कामपुरुषार्थसे सम्बन्ध है कामशास्त्रका । तत्सम्बन्धी दोष कलाविरोधमें या आगमविरोधमें समाहित हो जायेगा। तब, यहाँ उसके पुनः कथनकी आवश्यकता ही नहीं है । (च) आगमविरोध—दण्डीने 'आगम'के अन्तर्गत मनुष्यके लिये व्यक्तिगत और सामाजिक आचारकी विधायक (i) श्रुति और (ii) स्मृतिको लिया है, यह पीछे 'आगम'के लक्षणमें देख चुके हैं। यहाँ इन दोनोंके एकेक उदा- हरण आचार्यने अगले दो श्लोकोंमें प्रस्तुत किये हैं : (i) श्रुतिविरोध : तैत्तिरीय संहिताके अनुसार शास्त्रानुसार प्रजोत्पादनके योग्य (शास्त्रीय पद्धतिसे अग्न्याधान करके दारकर्म कर चुके) पुरुषको सन्तान नहीं है और सन्तानकी इच्छा है, तो वह अग्न्याधान करके वैश्वानर देवताके निमित्त द्वादश कपालोंपर संस्कृत पुरोडाशका निर् वाप (आहुति दे) । और फिर पुत्र होनेपर वैश्वानरके निमित्त द्वादशकपाल पुरोडाशकी आहुति दे ।२
१. आगमो धर्मशास्त्राणि लोकसीमा च तत्कृता । तद्विरोधि तदाचारव्यतिक्रमणतो, यथा ॥ काव्याल० ४।४८ २. तैत्तिरीय संहिता २।२।५।१-३ : वैश्वानरं द्वादशकपालं निर्वपेत् ।··· एतामेव निर्वपेत् प्रजाकामः ।···योऽलं प्रजायै सन् प्रजां न विन्दते । यद् वैश्वानरो द्वादशकपालो भवति ।···विन्दते प्रजाम् । वैश्वानरं द्वादश- कपालं निर्वपेत्···पुत्रे जाते ।
३।१८२-१८३] कविका कौशल दोषको भी गुण बना देता है २१६ कामिनां लयवैषम्याद् गेयं रागमवर्धयत् ॥ १८२ ॥ (घ) ऐन्दवादर्चिषः कामी शिशिरं हव्यवाहनम् । अबलाविरहक्लेशविक्लवो गणयत्ययम् ॥ १८३ ॥ के मुखसे निकले हुए गीतने लयमें विषमताके कारण कामिजनोंका राग बढ़ा दिया ॥ १८२ ॥ (घ) सुन्दरीके विरहके कष्टसे व्याकुल वह कामी आगको चन्द्रमाकी किरणकी अपेक्षा शीतल समझता है ॥ १८३ ॥ दिया कि अब गिरी तब गिरी । परिणामतः उनके गीतोंकी लय बिगड़ गई । किन्तु उसी लयवैषम्यने आसपास विद्यमान उनके कामी प्रियोंके मनमें उनके प्रति प्रेम और गहरा कर दिया । गीत, वाद्य और पाद आदिके विन्यासकी द्रुत मध्य विलम्बितके रूपमें क्रिया और काल (मात्रा) की समता लय होती है ।¹ समतायुक्त विन्यास ही गीत वाद्य और नृत्यको आनन्द- दायी बनाता है । लयभङ्ग होनेपर ये उद्वेजक हो जाते हैं । किन्तु प्रियाओंकी भयत्रस्त मुद्रा और उसके कारण होने वाला गीतमें लयवैषम्य उनके प्रियोंको आनन्दित ही करता है । इस प्रकार यह कलाविरोध दोष न होकर कविके कौशलसे रतिका उद्दीपक होनेके कारण गुण हो गया है² ॥ १-२ ॥ (घ) लोकविरोधकी गुणताका उदाहरण—चन्द्रमाकी किरणोंका स्वभाव लोकमें शीतल समझा जाता है । आगका स्वभाव शीतके विपरीत उष्ण होता है । किन्तु यहाँ कविने उसे चन्द्रकिरणसे अधिक शीतल कहा है । इस प्रकार यहाँ लोकस्वभावका विरोध स्पष्ट है । किन्तु यह विरोध कामियोंकी रतिकी विशेष अवस्थाका सूचक होनेसे दोषकी बजाय गुण हो गया है । चन्द्रकिरणोंके स्पर्शसे कामियोंकी व्याकुलता बढ़ती है, उनकी कामाग्नि उद्दीप्त होती है; जबकि अग्निसे इस प्रकारकी कोई अनुभूति नहीं होती । अतः चन्द्रकिरण उनके लिये उष्ण हैं और अग्नि शीतल ॥ १८३ ॥ १. अमरकोष १।७।६ : तालः कालक्रियामानं लयः साम्यम् । रामाश्रमी : गीतिवाद्यपादादिन्यासानां क्रियाकालयोः साम्यं लयः । २. तनिक भिन्न परिवेशमें लयवैषम्य और भिन्नगीतताके वर्णनके लिये अवन्तिसुन्दरी कथा, पृष्ठ १६३, पंक्ति १६ देखें : अनवधानस्खलितपाद- विषमितलयम्, आयासश्वासभिन्नगीतरागम्, ॰॰॰आरब्धानन्दनृत्तया॰॰॰ विन्ध्यसेनया॰॰॰।
२१८ काव्यादर्श [३।१८१-१८२ धुन्वन् कदम्बरजसा सह सप्तच्छदोद्गमान् ॥ १८१ ॥ (ग) दोलाऽति प्रेरणत्रस्तवधूजनमुखोद्गतम् । कदम्ब पुष्पोंकी परागके साथ सप्तच्छदके अङ्कुरोंको हिलाता हुआ वायु चला ॥ १८१ ॥ (ग) झूलेको अधिक वेगसे झुलानेके कारण डरी (सहमी) हुई बहुओं आते हैं । (३) खर वायु ग्रीष्ममें चला करता है । इस प्रकार भिन्नकाल- भावी ये तीनों बातें यहाँ एककालभावीके रूपमें बताई होनेके कारण काल- विरोधी हैं । किन्तु कविने इन्हें राजाओंके विनाशके सूचक दुर्निमित्त १ (उत्पात), अपशकुनके रूपमें प्रस्तुत करके इस कालविरोधको दोष (उद्वेजक) नहीं रहने दिया है, अपितु विवक्षित अर्थका पोषक होनेके कारण गुण बना दिया है । प्रखर वायु, बेमौसमके पुष्पोद्गम आदि अशुभके सूचक उत्पात शकुनशास्त्रमें और लोकमें प्रसिद्ध हैं ।२ (१) शरद्ऋतुका समय, जब कि छतौनके वृक्षोंमें पुष्पोद्गम स्वाभाविक होता है, राजाओंके विजयार्थ सैन्यप्रयाणका समय होता है । उस समय (२) ग्रीष्ममें चलने वाली प्रखर हवा और (३) प्रयाणमें बाधक वर्षामें फूलने वाले कदम्बोंमें ऋतुके बीतनेपर भी पुष्पोद्गम अशुभ प्राकृतिक शकुन है । ये सब विजयार्थी राजाके विनाशके सूचक हैं ॥ १८१ ॥ (ग) कालविरोध की गुणताका उदाहरण—सावनमें झूला झूलती बहुओं को उनकी ननदों या सहेलियोंने झूलेको बहुत जोर-जोरसे झोंटे देकर डरा १. भौम, आन्तरिक्ष और दिव्य महोत्पातोंका विशद वर्णन अवन्तिसुन्दरी, पृष्ठ ५२-५४ तथा ११७-११८ में देखें । पृष्ठ ५२ : अनन्तरं च सर्वस्या- मेवोर्व्यां सर्वक्षत्र (विनाश) पिशुनाः ⋯ चरितुमारभन्त घोररूपा महो- त्पाताः । तथा हि— ⋯ ऋतवः सर्व एव स्वचिह्न लक्ष्म्याः समन्ततः समं समाजग्मुः । ⋯ प्रसभोत्पाटितनिरस्तवृक्षवीरुधः, क्षुण्णपाषाणशर्कराः क्षणमपि नोपरेमुरुग्रस्वनाः प्रभ्रमन्तः प्रभञ्जनाः । पृष्ठ ११८ : भ्रमन्ति भीमा वायवः ⋯ । २. उत्पाता बहवस्तत्र निपेतुर्र्जायमानयोः । दिवि भुव्यन्तरिक्षे च लोकस्योरुभयावहाः ॥ श्रीमद्भागवतपु० ३।१७।३ ववौ वायुः सुदुःस्पर्शः फूत्कारानीरयन् मुहुः । अकाले फलपुष्पाणि देशोपद्रवकारणम् । विष्णुध० पु० १।३७ भी देखें ।
३।१८२-१८३] कविका कौशल दोषको भी गुण बना देता है २१६ कामिनां लयवैषम्याद् गेयं रागमवर्धयत् ॥ १८२ ॥ (घ) ऐन्दवार्चिषः कामी शिशिरं हव्यवाहनम् । अबलाविरहक्लेशविकलवो गणयत्ययम् ॥ १८३ ॥ के मुखसे निकले हुए गीतने लयमें विषमताके कारण कामिजनोंका राग बढ़ा दिया ॥ १८२ ॥ (घ) सुन्दरीके विरहके कष्टसे व्याकुल वह कामी आगको चन्द्रमाकी किरणकी अपेक्षा शीतल समझता है ॥ १८३ ॥ दिया कि अब गिरी तब गिरी । परिणामतः उनके गीतोंकी लय बिगड़ गई । किन्तु उसी लयवैषम्यने आसपास विद्यमान उनके कामी प्रियोंके मनमें उनके प्रति प्रेम और गहरा कर दिया । गीत, वाद्य और पाद आदिके विन्यासकी द्रुत मध्य विलम्बितके रूपमें क्रिया और काल (मात्रा) की समता लय होती है ।¹ समतायुक्त विन्यास ही गीत वाद्य और नृत्यको आनन्द- दायी बनाता है । लयभङ्ग होनेपर ये उद्वेजक हो जाते हैं । किन्तु प्रियाओंकी भयत्रस्त मुद्रा और उसके कारण होने वाला गीतमें लयवैषम्य उनके प्रियोंको आनन्दित ही करता है । इस प्रकार यह कलाविरोध दोष न होकर कविके कौशलसे रतिका उद्दीपक होनेके कारण गुण हो गया है² ॥ १८२ ॥ (घ) लोकविरोधकी गुणताका उदाहरण—चन्द्रमाकी किरणोंका स्वभाव लोकमें शीतल समझा जाता है । आगका स्वभाव शीतके विपरीत उष्ण होता है । किन्तु यहाँ कविने उसे चन्द्रकिरणसे अधिक शीतल कहा है । इस प्रकार यहाँ लोकस्वभावका विरोध स्पष्ट है । किन्तु यह विरोध कामियोंकी रतिकी विशेष अवस्थाका सूचक होनेसे दोषकी बजाय गुण हो गया है । चन्द्रकिरणोंके स्पर्शसे कामियोंकी व्याकुलता बढ़ती है, उनकी कामाग्नि उद्दीप्त होती है; जबकि अग्निसे इस प्रकारकी कोई अनुभूति नहीं होती । अतः चन्द्रकिरण उनके लिये उष्ण हैं और अग्नि शीतल ॥ १८३ ॥ १. अमरकोष १।७।६ : तालः कालक्रियामानं लयः साम्यम् । रामाश्रमी : गीतिवाद्यपादादिन्यासानां क्रियाकालयोः साम्यं लयः । २. तनिक भिन्न परिवेशमें लयवैषम्य और भिन्नगीतताके वर्णनके लिये अवन्तिसुन्दरी कथा, पृष्ठ १६३, पंक्ति १६ देखें : अनवधानस्खलितपाद- विषमितलयम्, आयासश्वासभिन्नगीतरागम्,···आरब्धानन्दनृत्यया··· विन्ध्यसेनया···।
२१८ काव्यादर्श, [३।१८१-१८२ धून्वन् कदम्बरजसा सह सप्तच्छदोद्गमान् ॥ १८१ ॥ (ग) दोलाऽति प्रेरणत्रस्तवधूजनमुखोद्गतम् । कदम्ब पुष्पोंकी परागके साथ सप्तच्छदके अङ्कुरोंको हिलाता हुआ वायु चला ॥ १८१ ॥ (ग) झूलेको अधिक वेगसे झुलानेके कारण डरी (सहमी) हुई बहुओं आते हैं । (३) खर वायु ग्रीष्ममें चला करता है । इस प्रकार भिन्नकाल- भावी ये तीनों बातें यहाँ एककालभावीके रूपमें बताई होनेके कारण काल- विरोधी हैं । किन्तु कविने इन्हें राजाओंके विनाशके सूचक दुर्निमित्त (उत्पात), अपशकुनके रूपमें प्रस्तुत करके इस कालविरोधको दोष (उद्वेजक) नहीं रहने दिया है, अपितु विवक्षित अर्थका पोषक होनेके कारण गुण बना दिया है । प्रखर वायु, बेमौसमके पुष्पोद्गम आदि अशुभके सूचक उत्पात शकुनशास्त्रमें और लोकमें प्रसिद्ध हैं ।¹ (१) शरद्ऋतुका समय, जब कि छतौनके वृक्षोंमें पुष्पोद्गम स्वाभाविक होता है, राजाओंके विजयार्थ सैन्यप्रयाणका समय होता है । उस समय (२) ग्रीष्ममें चलने वाली प्रखर हवा और (३) प्रयाणमें बाधक वर्षांमें फूलने वाले कदम्बोंमें ऋतुके बीतनेपर भी पुष्पोद्गम अशुभ प्राकृतिक शकुन हैं । ये सब विजयार्थी राजाके विनाशके सूचक हैं ॥ १८१ ॥ (ग) कलाविरोध की गुणताका उदाहरण — सावनमें झूला झूलती बहुओं को उनकी ननदों या सहेलियोंने झूलेको बहुत जोर-जोरसे झोंटे देकर डरा १. भौम, आन्तरिक्ष और दिव्य महोत्पातोंका विशद वर्णन अवन्तिसुन्दरी, पृष्ठ ५२-५४ तथा ११०-११८ में देखें । पृष्ठ ५२ : अनन्तरं च सर्वस्या- मेवोर्व्यां सर्वंक्षत्र (विनाश) पिशुनाः <sup>...</sup> चरितुमारभन्त घोररूपा महो- त्पाताः । तथा हि — <sup>...</sup>ऋतवः सर्वे एव स्वचिह्न लक्ष्म्याः समन्ततः सम समाजग्मुः । <sup>...</sup>प्रसभोत्पाटितनिरस्तवृक्षवीरुधः, क्षुण्णपाषाणशर्कराः क्षणमपि नोपरेमुरुग्रस्वनाः प्रभ्रमन्तः प्रभञ्जनाः । पृष्ठ ११८ : भ्रमन्ति भीमा वायवः<sup>...</sup> । २. उत्पाता बहवस्तत्र निपेतुर्जायमानयोः । दिवि भुव्यन्तरिक्षे च लोकस्योरुभयावहाः ॥ श्रीमद्भागवतपु० ३।१७।३ ववौ वायुः सुदुःस्पर्शः फूत्कारानीरयन् मुहुः । अकाले फलपुष्पाणि देशोपद्रवकारणम् । विष्णुध० पु० १।३७ भी देखें ।
[३।१८५] दोषोंका इतिहास २८३
तो निरूपण किया है और कुछका निरूपण सम्भवतः उनकी सुपरिचित दोषके रूपमें मान्यताके कारण न करके उनका उल्लेखमात्र प्रसङ्गेन किया है। अलङ्कारपरम्परामें मेधावी द्वारा उद्भावितके रूपमें प्रसिद्ध सात उपमा- दोषोंमें से तीनको उन्होंने अनित्यदोषके रूपमें लिङ्गभेद और वचनभेद दोषों के अतिरिक्त भामहप्रोक्त मेधाविसम्मत विपर्ययको उपमानकी हीनता और अधिकताके रूपमें प्रस्तुत किया है। मेधावीके असम्भव और सादृश्य दोष दण्डीकी उपमामें सम्भव ही नहीं है। मेधावीके भामहाभिमत हीनता और अधिकताके बारेमें दण्डी मौन हैं। १ इस प्रकार दण्डीके अनुसार कुल दोष प्रकृत दस दोषोंको मिलाकर २३ हैं। आचार्य भामहने दोषोंका निरूपण कई स्थानोंमें किया है। प्रकृत अपार्थ आदि ११ दोषोंका निरूपण उन्होंने चतुर्थ और पञ्चम परिच्छेदोंमें सुव्यव- स्थित रूपसे किया है। इसके अतिरिक्त निम्नलिखित २२ दोषोंमें से कुछका निरूपण और कुछका प्रसङ्गसे उल्लेखमात्र भिन्न-भिन्न स्थानोंपर किया है : १ आकुलताका उल्लेख (१।२५,३५; ३।५४; ५।६७में) किया है। २ अपुष्टार्थ (१।३४), ३ ग्राम्य शब्द (१।१६), ४ ग्राम्य अर्थ (१।३५) का भी उल्लेख किया है। ५ नेयार्थ, ६ क्लिष्ट, ७ अन्यार्थ, ८ अवाचक, ६ अयुक्तिकमत् और १० गूढशब्दाभिधान दोषोंका पूर्णतया या अंशतः निरूपण (१।३७में) किया है। ११ श्रुतिदुष्ट, १२ अर्थदुष्ट, १३ कल्पनादुष्ट, १४ श्रुतिकष्ट दोषोंका निरूपण (१।४७में) किया है। इनके अतिरिक्त भामहने आचार्य मेधावी द्वारा प्रोक्तके नामसे उल्लेख करते हुए उपमा अलङ्कारके सात दोषोंका निरूपण (२।३६में) किया है : १५ हीनता, १६ असम्भव, १७ लिङ्गभेद १८ वचनभेद, १६ विपर्यय, २० अधिकता और २१ असादृश्य, २२ बहूपूरण, (शब्दोंकी अनावश्यक भरती, अधिकपदताका) उल्लेख (५।६७में) किया है। इनके अतिरिक्त (५।६२में) अदृष्ट और असुनिभेद एवम् अपेशलताका उल्लेख किया है। किन्तु ये पूर्वोक्त श्रुतिकष्टत्व, अवाचकत्व आदिके ही परिणाममूलक नामान्तर हैं। अतः पृथक् सञ्ज्ञाके अधिकारी नहीं हैं। इसी प्रकार (५।६७में प्रोक्त) विरुद्धपद एवम् अस्वर्थ भी अन्य दोषोंके ही नामान्तर हैं। इस प्रकार भामहने ११ + २२ = ३३ दोषोंका उल्लेख किया है। इनमें से कुछको भामहने शब्ददोषके रूपमें निरूपित किया है और कुछको अर्थदोषके रूपमें। यद्यपि इनका भामहकृत निरूपण व्यवस्थित और बहुत गम्भीर नहीं १. प्रसादिनी २।५१, पृष्ठ ४५ देखें।
२२२ काव्यादर्श [३।१८५
तथा उसके अनुसार स्थापित लोकमर्यादाके विपरीत था । किन्तु द्रौपदीके भाग्यमें विधाताने लेख ही ऐसा लिखा था, जिसके अनुसार उसे इस प्रकारकी धर्मविरुद्ध स्थितिका निश्छल भावसे पालन करना था । अपने इसी कर्तव्यबोध तथा उसके पालनके कारण वह 'परम सती' कहलाई । इस प्रकार कविने चतुर्थ पादसे आगमविरोध दोषका परिहार कर दिया । महाभारतके लेखकने भी इसी लिये द्रौपदीके चरित्रके निरूपणमें शङ्करसे पाँच बार पति देनेकी प्रार्थना करने वाली ऋषिकन्याको शङ्कर द्वारा पाँच पति पानेके वरकी कल्पना की है । इस प्रकार आचार्यने (१०) देशादिविरोध दोषके छहों भेदोंमें कवि- कौशलसे दोषत्वका परिहार करके गुणत्वका उदाहरणोंसे निदर्शन किया । अन्य दोषोंके दोषत्वके परिहारकी दिशाका निर्देश आचार्य तत्तद् दोषके प्रसङ्गमें कर चुके हैं । दोषधून्युत्तरीं प्राप्ता नगोच्चं भरतं शुभा । काव्यदोषनिराकृत्या सोपयोगा पयस्विनी ॥ १ ॥ दण्डिदेवप्रयागेऽथ रम्या हृद्या सुधीहिता । मामहोपत्यकाग्राप्तमवगाहधौतधीमला ॥ २ ॥ दोषस्रोतस्विनी सेयं व्याख्याता मूलशोधनात् । भाद्रार्जैकादशीसौम्ये प्रातश्चन्द्रे रहो गते ॥ ३ ॥ — ० — शुभे विंशे दिनेऽगस्त्यमासस्याद्य गुरौ पुनः । दोषशैवलिनी रम्या वामनग्रामतो गता ॥ १ ॥ विशेषान् यानथ प्राप्ता रुद्रतीर्थसङ्गता । व्याख्यास्ये तानहं सम्यक् सर्वस्यानन्दवर्धनान् ॥ २ ॥ प्रीयतामथ पुण्येयं भवभूतिप्रदा शिवा । इदम्परमवद्वेषा धीप्रदा शारदा मयि ॥ ३ ॥ दोषोंका इतिहास—आचार्य दण्डीने इन सर्वमार्गसाधारण दस दोषोंके अतिरिक्त मार्गविशेषके कुछ अन्य दोषोंकी चर्चा भी काव्यादर्शमें यत्र तत्र की है । उनमें से बन्धके १ शैथिल्य, २ वैषम्य और ३ पारुष्य नामक तीन दोष, ४ दुष्प्रतीति, ५ शब्दगत और ६ अर्थगत ग्राम्यता दोष, ७ नेयार्थता, ८ आकुलता और ६ लोकसीमातिक्रमण दोषोंका उल्लेख प्रथम परिच्छेदके गुणप्रकरणमें (पृष्ठ ६८में) किया जा चुका है। दण्डीने इनमें से कुछका
३१८५] दोषोंका इतिहास २:३
तो निरूपण किया है और कुछका निरूपण सम्भवतः उनकी सुपरिचित दोषके रूपमें मान्यताके कारण न करके उनका उल्लेखमात्र प्रसङ्गेन किया है। अलङ्कारपरम्परामें मेधावी द्वारा उद्भावितके रूपमें प्रसिद्ध सात उपमा- दोषोंमें से तीनको उन्होंने अनित्यदोषके रूपमें लिङ्गभेद और वचनभेद दोषों के अतिरिक्त भामहप्रोक्त मेधाविसम्मत विपर्ययको उपमानकी हीनता और अधिकताके रूपमें प्रस्तुत किया है। मेधावीके असम्भव और सादृश्य दोष दण्डीकी उपमामें सम्भव ही नहीं है। मेधावीके भामहाभिमत हीनता और अधिकताके बारेमें दण्डी मौन हैं ।¹ इस प्रकार दण्डीके अनुसार कुल दोष प्रकृत दस दोषोंको मिलाकर २३ हैं। आचार्य भामहने दोषोंका निरूपण कई स्थानोंमें किया है। प्रकृत अपार्थ आदि ११ दोषोंका निरूपण उन्होंने चतुर्थ और पञ्चम परिच्छेदोंमें सुव्यव- स्थित रूपसे किया है। इसके अतिरिक्त निम्नलिखित २२ दोषोंमें से कुछका निरूपण और कुछका प्रसङ्गसे उल्लेखमात्र भिन्न-भिन्न स्थानोंपर किया हैं : १ आकुलताका उल्लेख (१।२५,३५; ३।५४; ५।६७में) किया है। २ अपुष्टार्थ (१।३४), ३ ग्राम्य शब्द (१।१६), ४ ग्राम्य अर्थ (१।३५) का भी उल्लेख किया है। ५ नेयार्थ, ६ क्लिष्ट, ७ अन्यार्थ, ८ अवाचक, ६ अयुक्तिमत् और १० गूढशब्दाभिधान दोषोंका पूर्णतया या अंशतः निरूपण (१।३७में) किया है। ११ श्रुतिदुष्ट, १२ अर्थदुष्ट, १३ कल्पनादुष्ट, १४ श्रुतिकष्ट दोषोंका निरूपण (१।४७में) किया है। इनके अतिरिक्त भामहने आचार्य मेधावी द्वारा प्रोक्तके नामसे उल्लेख करते हुए उपमा अलङ्कारके सात दोषोंका निरूपण (२।३६में) किया है : १५ हीनता, १६ असम्भव, १७ लिङ्गभेद १८ वचनभेद, १६ विपर्यय, २० अधिकता और २१ असादृश्य, २२ बहुपूरण, (शब्दोंकी अनावश्यक भरती, अधिकपदताका) उल्लेख (५।६७में) किया है। इनके अतिरिक्त (५।६२में) अहृद्य और असुनिभेद एवम् अपेशलताका उल्लेख किया है। किन्तु ये पूर्वोक्त श्रुतिकष्टत्व, अवाचकत्व आदिके ही परिणाममूलक नामान्तर हैं। अतः पृथक् सञ्ज्ञाके अधिकारी नहीं हैं। इसी प्रकार (५।६७में प्रोक्त) विरुद्धपद एवम् अस्व्यर्थ भी अन्य दोषोंके ही नामान्तर हैं। इस प्रकार भामहने ११ + २२ = ३३ दोषोंका उल्लेख किया है। इनमें से कुछको भामहने शब्ददोषके रूपमें निरूपित किया है और कुछको अर्थदोषके रूपमें। यद्यपि इनका भामहकृत निरूपण व्यवस्थित और बहुत गम्भीर नहीं १. प्रसादिनी २।५१, पृष्ठ ४५ देखें।
२२२ काव्यादर्श [३।१८५ तथा उसके अनुसार स्थापित लोकमर्यादाके विपरीत था । किन्तु द्रौपदीके भाग्यमें विधाताने लेख ही ऐसा लिखा था, जिसके अनुसार उसे इस प्रकारकी धर्मविरुद्ध स्थितिका निश्छल भावसे पालन करना था । अपने इसी कर्तव्यबोध तथा उसके पालनके कारण वह 'परम सती' कहलाई । इस प्रकार कविने चतुर्थ पादसे आगमविरोध दोषका परिहार कर दिया । महाभारतके लेखकने भी इसी लिये द्रौपदीके चरित्रके निरूपणमें शङ्करसे पाँच बार पति देनेकी प्रार्थना करने वाली ऋषिकन्याको शङ्कर द्वारा पाँच पति पानेके वरकी कल्पना की है । इस प्रकार आचार्यने (१०) देशादिविरोध दोषके छहों भेदोंमें कवि- कौशलसे दोषत्वका परिहार करके गुणत्वका उदाहरणोंसे निदर्शन किया । अन्य दोषोंके दोषत्वके परिहारकी दिशाका निर्देश आचार्य तत्तद् दोषके प्रसङ्गमें कर चुके हैं । दोषधुन्धुत्तरी प्राप्ता नगोच्चं भरतं शुभा । काव्यदोषनिराकृत्या सोपयोगा पयस्विनी ॥ १ ॥ दण्डिदेवप्रयागेऽथ रम्या हृद्या सुधीहिता । भामहोपत्यकाग्रामवगाहधौतधीमला ॥ २ ॥ दोषस्रोतस्विनी सेयं व्याख्याता मूलशोधनात् । भाद्राजैकादशीसौम्ये प्रातश्चन्द्रे रहो गते ॥ ३ ॥ — ० — शुभे विंशे दिनेऽगस्त्यमासस्याद्य गुरौ पुनः । दोषशैवलिनी रम्या वामनग्रामतो गता ॥ १ ॥ विशेषान् यानथ प्राप्ता रुद्रटतीर्थसङ्गता । व्याख्यास्ये तानहं सम्यक् सर्वस्यानन्दवर्धनान् ॥ २ ॥ प्रीयतामथ पुण्येयं सर्वभूतिप्रदा शिवा । इदम्परमवद्धेजा धीप्रदा शारदा मयि ॥ ३ ॥ दोषोंका इतिहास—आचार्य दण्डीने इन सर्वमार्गसाधारण दस दोषोंके अतिरिक्त मार्गविशेषके कुछ अन्य दोषोंकी चर्चा भी काव्यादर्शमें यत्र तत्र की है । उनमें से बन्धके १ शैथिल्य, २ वैषम्य और ३ पारुष्य नामक तीन दोष, ४ दुष्प्रतीति, ५ शब्दगत और ६ अर्थगत ग्राम्यता दोष, ७ नेयार्थता, ८ आकुलता और ६ लोकसीमातिक्रमण दोषोंका उल्लेख प्रथम परिच्छेदके गुणप्रकरणमें (पृष्ठ ६८में) किया जा चुका है । दण्डीने इनमें से कुछका
३१=५] दोषोंका इतिहास २२५ आचार्य रुद्रटने वामनकी व्यवस्थामें थोड़ा परिष्कार किया : उन्होंने दोषों को (१) शब्दगत और (२) अर्थगत दो प्रकारका बताकर पदमें अथवा वाक्यमें स्थित (i) पदगत, (ii) वाक्यगत एवम् (iii) अर्थगतके रूपमें व्यवस्थित किया । १ आचार्य भोजने तो रुद्रटके वर्गीकरणको आधार बनाया ही है, मम्मटने भी रुद्रटके वर्गोंमें आनन्दवर्धनोक्त रसविरोधको एक वर्गके रूपमें जोड़कर व्यवस्थाको पूर्णतया विकासकी स्थितिमें प्रस्तुत किया है । रुद्रटने कुछ नवीन दोषोंकी उद्भावना भी की है । उनमें सर्वाधिक महत्त्व- पूर्ण दोष है विरस नामक अर्थदोष : अन्य रसके प्रसङ्गमें क्रमके विपरीत जो कोई दूसरा रस आ जाए, तब विरस नामक दोष होता है । २ इस दोषका महत्त्व इस बातसे और बढ़ जाता है कि काव्यमें रसके महत्त्वको अपने-अपने ढंगसे स्वीकार करते हुए भी दण्डी, भामह और वामन रसके महत्त्वके बारेमें उतने स्पष्ट और मुखर नहीं हैं, जितने कि रुद्रट हैं । काव्यको रसयुक्त बनाने को अत्यधिक (महीयस्) यत्नका उनका उपदेश ३ और शान्तसमेत नौ रसोंका उनका निरूपण उन्हें रसको ‘रसवत्’ नामक अलङ्कार मानने वाले आचार्योंकी अपेक्षा रसको अत्यन्त महत्त्व देनेवाले आचार्य आनन्दवर्धनके कहीं अधिक निकट सिद्ध करता है । आगेका इतिहास भी यही कहता है । रीतियोंका रसोंसे सम्बन्ध भी रुद्रटने ही सर्वप्रथम जोड़ा है । ४ इस प्रकार गुणों और १. असमर्थमप्रतीतं विसन्धि विपरीतकल्पनं ग्राम्यम् । अव्युत्पत्ति च देश्यं पदमिति सम्यग् भवेद् दुष्टम् ।। काव्यालं० ६।२ तत्र पदं वाक्यं वा पुनरुक्तं नैव दोषाय ।। ३४ यस्मिन्तनेकमर्थं स्वयमेवालोचयेत् तदर्थानि । जल्पन् पदानि तेषामसङ्गतिर्नैव दोषाय ।। ३८ वाक्यं भवति तु दुष्टं सङ्कीर्णं गर्भितं गतार्थं च । ४० अपहेतुरप्रतीतो निरागमो बाध्यन्नसम्बद्धः । ग्राम्यो विरसस्तद्वानतिमात्रश्चेति दुष्टोऽर्थः ।। ११।२ २. अन्यस्य यः प्रसङ्गे रसस्य निपतेद् रसः क्रमापेतः । विरसोऽसौ; स च शक्यः सम्यग् ज्ञातुं प्रबन्धेष्यः ।। काव्या० ११।१२ ३. ननु काव्येन क्रियते सरसानामवगमश्चतुर्वर्गे । लघु मृदु च; नीरसेभ्यस्ते हि त्रस्यन्ति शास्त्रेभ्यः ।। काव्या० १२।१ तस्मात् तत् कर्तव्यं यत्नेन महीयसा रसैर्युक्तम् । ४. इह वैदर्भी रीतिः पाञ्चाली वा विचार्य रचनीया । मधुरललिते कविना कार्ये वृत्तौ तु शृङ्गारे ।। काव्यालं० १४।३७
२२६ काव्यादर्श [३।१८५ रीतियोंका रससे अविनाभाव सम्बन्ध स्थापित करनेकी दिशामें प्रेरणास्रोत परोक्ष रूपसे रुद्रटका ही योगदान है। यह हमें बादमें आनन्दवर्धनके ध्वनि- सिद्धान्तमें निरूपित मिलता है। अतः रुद्रट कुछ बातोंमें आनन्दवर्धनके पथिकृत् हैं, यह कहना अनुचित नहीं होगा। आनन्दवर्धनने रुद्रटके विरसको ही अपने सिद्धान्तके अनुकूल सर्वाधिक शोभाविघातक माना है। श्रुतिकष्टत्व आदि अन्य दोषोंको वे रसविरोधक होनेपर ही हेय (दोष) मानते हैं।१ किन्तु रसविरोध और तीन प्रकारसे व्या- ख्यात वृत्त्यनौचित्यको उन्होंने काव्यमें सर्वाधिक हेय माना है।२ इस प्रकार आनन्दवर्धनकी दृष्टिमें दोषत्वका आधार रसभङ्ग है। रुद्रटसे एक दोष विरसके रूपमें सूक्ष्म रूपसे उद्भूत इस दृष्टिभेदको इस प्रकार आनन्दवर्धनने सैद्धान्तिक आधार दिया तथा दोषके स्वरूपको एक नई दिशा दी। आचार्य महिमभट्टने उसे पल्लवित किया। उन्होंने आनन्दवर्धन द्वारा सङ्केतित अनौचित्यका यों विस्तार किया—विवक्षित रस आदिकी प्रतीतिमें विघ्न डालना अनौचित्यका सामान्य स्वरूप है।३ उसके (क) अन्त- रङ्ग और (ख) बहिरङ्ग दो भेद हैं। (क) विभाव, अनुभाव और व्यभि- चारी भावोंके अयथावत् विनियोगके कारण रसादिकी प्रतीतिमें साक्षात् (अर्थ के द्वारा) विघ्न आनेसे अन्तरङ्ग अनौचित्यके कारण रसभङ्ग होता है। यही १. श्रुतिदुष्टादयो दोषा अनित्या ये च दर्शिताः । ध्वन्यात्मन्येव शृङ्गारे ते हेया इत्युदाहृताः ।। ध्वन्यालोक० २।११ २. विरोधिरससम्बन्धिविभावादिपरिग्रहः । विस्तरेणान्वितस्यापि वस्तुनोऽन्यस्य वर्णनम् ।। ध्वन्यालोक ३।१८ अकाण्ड एव विच्छित्तिरकाण्डे च प्रकाशनम् ।। परिपोषं गतस्यापि पौनःपुन्येन दीपनम् ।। रसस्यापि स्याद् विरोधाय वृत्त्यनौचित्यमेव च ।। १६ वृत्ति : तथा (i) वृत्तेर्व्यवहारस्य यदनौचित्यं, तदपि रसभङ्गहेतुरेव ।... यदि वा (ii) वृत्तीनां भरतप्रसिद्धानां कैशिक्यादीनां, (iii) काव्यालङ्का- रान्तरप्रसिद्धानामुपनागरिकाद्यानां वा यदनौचित्यमविषये निबन्धनम्, तदपि रसभङ्गहेतुः । ३. व्यक्तिविवेक, चौखम्बा, १६६४ ई०, पृष्ठ १८२ : एतस्य च विवक्षित- रसादिप्रतीतिविघ्नविधायित्वं नाम सामान्यलक्षणम् । अन्तरङ्ग- बहिरङ्गभावश्चानयोः साक्षात् पारम्पर्येण च रसभङ्गहेतुत्वादिष्टः ।
[३।२८५] दोषोंका इतिहास २२७ आनन्दवर्धनका रसविरोध दोष है। (ख) शब्दके अनुचित प्रयोगके द्वारा अर्थप्रतीतिमें विघ्न आनेसे रसभङ्ग करना बहिरङ्ग अनौचित्य है। महिम- भट्टने इस शब्ददोषके छह भेद बताये हैं : (१) विधेयाविमर्श, (२) प्रक्रमभेद, (३) क्रमभेद, (४) पौनरुक्त्य, (५) वाच्यावचन एवम् (६) अवाच्यवचन।¹ अग्निपुराणमें दण्डिसम्मत (क) उद्वेजकता तथा (ख) असुखोच्चार्यमाणता को दोषका व्यावर्तक धर्म बताकर दण्डी, भामह और वामनके दोषोंको ही अपने ढंगसे व्यवस्थित किया गया है।² उनका पूर्वाचार्योंसे तत्त्वतः दृष्टिभेद नहीं है। पद, वाक्य और वाक्यार्थके रूपमें तीन आधारोंमें प्रत्येकमें १६, कुल ४८ दोष बतानेपर³ भी दोषोंके सैद्धान्तिक विकासमें भोजका कोई विशिष्ट योगदान नहीं है। अवान्तरभेदनिरूपणमें उनके चिन्तनका यत्किञ्चित् महत्त्व हो सकता है। परंतु तत्त्वतः वे रुद्रटसे आगे नहीं बढ़े हैं। मम्मटाचार्यने आनन्दवर्धन और महिमभट्टके निरूपणके आधारपर मुख्य अर्थके अपकर्षको दोषका लक्षण बताया। 'मुख्य अर्थ' उनके मतमें ध्वनि- सम्प्रदायके परमाचार्य आनन्दवर्धन द्वारा प्रोक्त तथा अग्निपुराण द्वारा अनूदित 'रस' है। महिमभट्टने ही 'रसप्रतीतिविघ्नविधायित्व' को दोषका सामान्य लक्षण कहा था। मम्मटने उसीका सङ्क्षेप 'मुख्यार्थहति'के रूपमें किया है। १. व्यक्तिविवेक, पृष्ठ १७६ : इह खलु द्विविधमनौचित्यमुक्तम् (क) अर्थ- विषयं शब्दविषयं चेति। तत्र (क) विभावातुभावव्यभिचारिणामयथायथं रसेषु यो विनियोगः, तन्मात्रलक्षणमेकमन्तरङ्गमाचार्यैरेवोक्तमिति नेह प्रतन्यते । (ख) अपरं पुनर्बहिरङ्गं बहुप्रकारं सम्भवति । तद्यथा— १ विधेयाविमर्शः, २ प्रक्रमभेदः, ३ क्रमभेदः, ४ पौनरुक्त्यं, ५ वाच्या- वचनमपि सङ्गृहीतं वेदितव्यम्, तस्यापीष्टार्थविपर्ययात्मकत्वात् । महिम- भट्ट दोषोंके इष्टविपर्ययात्मकत्वके बारेमें वामनके 'गुणविपर्ययात्मानो दोषाः' सिद्धान्तसे प्रभावित हैं। वामनके यहाँ चाहे गुण रसके धर्म न हों, रसवादी आचार्य आनन्दवर्धन और उनसे प्रभावित अन्य आचार्योंके मतमें गुण और रस अविनाभूत हैं। २. उद्वेगजनको दोषः सभ्यानाम् । अग्निपुराण ३४७।१ दोषत्वमनुबध्नाति सज्जनोद्वेजनादृते । असुखोच्चार्यत्वं कष्टत्वम्...।। १० ३. दोषाः पदानां, वाक्यानां, वाक्यार्थानां च षोडश । हेयाः काव्ये कवीन्द्रैर्यै तानेवादौ प्रचक्ष्महे ।। सरस्वती० १।३
२२८ काव्यादर्श [३।१८५ पूर्वचार्योंके दोषलक्षणका अनुवाद करनेके बाद व्यवस्थापण्डित मम्मटने भरतसे प्रारब्ध भोजावधिक दोषभेदपरम्पराकी सुन्दर व्यवस्था (१) पददोष (२) वाक्यदोष, (३) अर्थ दोष और (४) रसदोषके रूपमें निम्नलिखित प्रकारसे की :१ (१) पद-दोष १६ बताये हैं।२ इनमें से ७ दोष पदांशगत भी हैं, तथा १३ दोष वाक्यगत भी हैं।३ (२) इन १३ के अतिरिक्त २१ दोष वाक्यके ही बताये हैं।४ (३) अर्थदोष २३ बताये हैं।५ (४) रस दोष १३ दिये हैं।६ इसके अतिरिक्त विशेष परिस्थितियोंमें दोषोंकी दण्डी आदि द्वारा १. काव्यप्रकाश ७।१ (७१) : मुख्यार्थहतिर्दोषः । रसश्च मुख्यः । तदाश्रयाद् वाच्यः । उभयोपयोगिनः स्युः शब्दाद्याः । तेन तेष्वपि सः । वृत्ति : हतिरपकर्षः । 'शब्दाद्या' इत्याद्यग्रहणाद् वर्णरचने । २. दुष्टं पदं १श्रुतिकटु२ च्युतसंस्कृत्यप्रयुक्त३मसमर्थम्४ । ५निहतार्थमनुचितार्थं६, ७निरर्थकमवाचकं८, ९त्रिधाऽश्लीलम्१० ।। १०सन्दिग्धमप्रतीतं११, ग्राम्यं१२, १३नेयार्थमथ भवेत् क्लिष्टम्१४ । अविमृष्टविधेयांशं१५, विरुद्धमतिकृत्१६ समासगतमेव ।। काव्यप्रकाश ७२ ३. अपास्य च्युतसंस्कारमसमर्थं निरर्थकम् । वाक्येऽपि दोषाः सन्त्येते; पदस्यांशेऽपि केचन ।। काव्यप्रकाश ७४ केचन -- श्रुतिकटु, निहतार्थ, निरर्थकता, अपाचकत्व, त्रिविध अश्लील, सन्दिग्ध, नेयार्थ दोषोंके उदाहरण सम्भवके आधार पर दिये हैं । ४. १प्रतिकूलवर्णं२मुपहत-लुप्त-विसर्गं३, विसन्धि४, हतवृत्तम्५ । ६न्यूनाधिक७-कथित-पदं८, पतत्प्रकर्षं९, समाप्तपुनरात्तम्१० ।। ११अर्धान्तरैकवाचकमभवन्मतयोग१२मनभिहितवाच्यम्१३ । अपदस्थ-पद१४-समासं१५, संकीर्णं१६, गर्भितं१७, प्रसिद्धिहतम्१८ ।। १९भग्नाप्रक्रममक्रम२०ममतपरार्थं२१ च वाक्यमेव तथा । काव्यप्रकाश ७५ ५. अर्थोऽपुष्टः१, कष्टो२, व्याहत३-पुनरुक्त४-दुष्क्रम५-ग्राम्याः६ ।। सन्दिग्धो७, निर्हेतुः८, प्रसिद्धि९-विद्या-विरुद्धश्च१० । अनवीकृतः११, सनियमा१२नियम१३विशेषा१४विशेषपरिवृत्ताः१५ ।। साकाङ्क्षो१६ऽपदयुक्तः,१७, सहचरभिन्नः,१८, प्रकाशितविरुद्धः१९ । २०विध्यनुवादा२१युक्तस्त्यक्तापुनःस्वीकृतो२२ऽश्लीलः२३ ।। ७६ ६. व्यभिचारि१-रस२-स्थायि३भावानां शब्दवाच्यता । कष्टकल्पनया व्यक्तिरनुभाव४विभावयोः५ ।।
३।१८५ ] दोषोंका इतिहास २२६ प्रोक्त अदोषताका निरूपण भी सङ्क्षेपसे मम्मटने किया है। अदोषताका आधार प्रायः दण्डीका अनुगामी है। मम्मटके बाद दोषोंकी व्यवस्थाके विषयमें कोई विशेष योगदान काव्य- शास्त्रमें उपलब्ध नहीं होता। निष्कर्ष—दोषके स्वरूपके विकासमें भरतसे प्रारब्ध परम्पराने दण्डीके काव्यादर्शमें जिस स्वरूपको प्राप्त किया, वह भामह, वामनमें यथावत् उपलब्ध होता है। दोषोंकी सङ्ख्या तथा उनकी व्यवस्था में विकास क्रमशः इन्हीं आचार्योंमें उपलब्ध होता है। दोषके स्वरूपमें क्रान्तिकारी विकास ‘विरस’ की उद्भावनासे आचार्य रुद्रटने किया है। उन्होंने व्यवस्थाके वामनके आधारमें भी कुछ सुधार करके दोषोंको पद, वाक्य, तथा अर्थमें, आश्रित किया। आनन्दवर्धनने रुद्रटके ‘विरस’ का विस्तार किया और असभङ्गको दोषका आधार निरूपित किया। महिमभट्टने आनन्दवर्धनको ही आधार बनाकर दोषोंकी व्यवस्थाको रसाश्रय किया। अग्निपुराणकार और भोजने स्वरूपमें कोई विकास नहीं किया। वे वस्तुतः रुद्रटसे बहुत आगे नहीं बढ़ सके। मम्मटने (क) स्वरूप आनन्दवर्धन और महिमभट्टके अनुसार निरूपित किया एवं (ख) भेदविकल्पनको उन तक उपलब्ध पद, वाक्य, उभय और अर्थके अतिरिक्त रसको दोषका आश्रय बना करके सुन्दर प्रकारसे व्यवस्थित किया है॥ १८५॥ भाद्रकृष्णत्रयोदश्यां मन्दवासरेऽपराह्नके। पुष्यभे कर्कगे चन्द्रे दोषेतिहासदर्शनम् ॥ १ ॥ मम्मटान्तं व्यधाय्येतदर्प्यते भवपादयोः। धौतयोर्गाङ्गपाथोभिः पूतैर्भक्ताश्रुबिन्दुभिः ॥ २ ॥ प्रीयतामनया स्तुत्या शास्त्रचर्चाऽभिरूपया। पश्वीशो भगवान् मादृक्पशुपाराविपाशनः ॥ ३ ॥ —०— प्रतिकूलविभावादिग्रहो⁶, दीप्तिः⁷ पुनः पुनः । अकाण्डे ‘प्रथनच्छेदा’वङ्गस्याप्यतिविस्तृतिः¹⁰ ॥ अङ्गिनोऽननुसन्धानं,” प्रकृतीनां विपर्ययः¹² । अनङ्गस्याभिधानं¹³ च रसे दोषाः स्युरीदृशाः ॥ काव्यप्रकाश ८२
२३० काव्यादर्शः [३।१८६-१८७ (उपसंहार) शब्दार्थांलङ्क्रियाश्चित्रमार्गाः सुकर-दुष्कराः । गुणा दोषाश्च काव्यानामिति संक्षिप्य दर्शिताः ॥ १८६॥ (फलश्रुति) व्युत्पन्नबुद्धिरमुना विधिविदर्शितेन मार्गेण दोषगुणयोर्वशवर्तिनीभिः । काव्योंके (१) शब्दके और (२) अर्थके अलङ्कार, (३) सुकर और (४) दुष्कर चित्र अलङ्कारके विविध प्रकार, (५) गुण एवं (६) दोष इस प्रकार सङ्क्षेप करके दिखला दिये हैं ॥ १८६ ॥ अपूर्वका विधान करनेके द्वारा दर्शित इस पद्धतिसे दोष और गुण (काव्यके शोभाघातक और शोभाविधायक धर्मों) के विषयमें ज्ञानसम्पन्न बुद्धि उपसंहार—काव्यादर्शके प्रारम्भमें आचार्यने काव्यका स्वरूप बताना (काव्यलक्षण) काव्यादर्शका उद्देश्य बताया था । उसके अन्तर्गत उन्होंने (१) इष्टार्थकी गमक पदावली अर्थात् शब्द और अर्थरूपी शरीरका वर्णन विविध प्रकारसे—छन्दोविधान, भाषाविधान, विनियोगकी दृष्टिसे—प्रथम परिच्छेद में किया है । फिर (२) उस शरीरके (क) मार्गविशेषसे सम्बद्ध विशेष अलङ्कारों गुणोंका निरूपण मार्गविभागके रूपमें प्रथम परिच्छेदके शेष भागमें करके (ख) साधारण अलङ्कारोंका विवेचन द्वितीय और तृतीय परिच्छेदोंमें किया है । इस परिच्छेदमें उन्होंने सुकर और दुष्कर चित्रालङ्कारोंका प्रस्थान (१) यमक, (२) विविध आकारबन्ध, (३) वर्णनियमवान् बन्ध और (४) प्रहेलिकाओंके रूपमें किया है । उसके अनन्तर (ग) काव्यके सर्वमार्गसाधारण दोषोंका निरूपण तृतीय परिच्छेदके शेष भागमें किया है । ॥ १८६ ॥ काव्यादर्शके तृतीय परिच्छेदके विषयोंका सङ्ग्रह प्रकृत उपसंहारश्लोकमें आचार्य दण्डीने प्रस्तुत किया है : फलश्रुति--तृतीय परिच्छेदके अन्तिम श्लोकमें आचार्य दण्डीने काव्या- दर्शमें प्रतिपादित मार्गका अनुसरण करनेकी फलस्तुति एक रमणीय उपमाके साथ बताई है । अपूर्वका कथन विधि होता है एवं पूर्वतः प्राप्तका कथन अनुवाद । अपने निरूपणको आचार्यने 'विधि' कहा है । इसका आशय यह है कि आचार्यने जिस भी विषयका प्रतिपादन किया है, उसे अपूर्वविधानके रूपमें प्रस्तुत किया है । अर्थात् अपनी मौलिक उद्भावनाएँ की हैं ।
३।१८७] फलश्रुति २३१ वाग्भिः कृताभिसरणां मदिरेक्षणाभिर् धन्यो युवेव रमते, लभते च कीर्तिम् ॥ १८७ ॥ वाला, बसमें आई हुई वाणीके साथ अभिसार करने वाला (कवि और सहृदय) उसी प्रकार आनन्दलाभ और यश प्राप्त करता है, जिस प्रकार कोई बुद्धिमान्, धन्य (पुण्यवान् अथवा धनसम्पन्न), कामशास्त्रोक्त मार्गसे स्त्रियोंके दोष और गुणोंको समझने वाला युवा अपनी वशवर्तिनी मादक नयनों वाली रमणियोंके साथ रमण करता है और यश प्राप्त करता है ॥ १८७ ॥ वाक्से शब्दार्थरूप काव्यशरीर अभिप्रेत है । उपमान और उपमेयमें लिङ्ग- साम्यके लिये स्त्रीलिङ्ग 'वाक्' शब्दका प्रयोग किया है । काव्यके विविध प्रकारोंका बोध करानेको 'वाक्'को बहुवचनमें प्रयुक्त किया है । किसी भी विधानका प्रयोजन हेय और उपादेयका ज्ञान प्राप्त करना होता है । काव्यमें हेय अर्थात् शोभाघातक धर्मोंको आचार्यने 'दोष' कहा है और शोभाधायक उपादेय धर्मो गुण और अलङ्कारोंको 'गुण' शब्दसे ग्रहण किया है । इस प्रकार इन दो शब्दोंसे आचार्यने अपने ग्रन्थके सभी विषयोंको सङ्क्षेपसे प्रस्तुत किया है । किसी शास्त्रका प्रयोजन बुद्धिमें व्युत्पत्तिका, विवेकका, होना है । शास्त्रके प्रमेयोंके विषयमें व्युत्पत्ति (ज्ञान) होनेपर ही उसका उपयोग हो सकता है । इससे प्रमेय वशवर्ती हो जाता है । काव्यकी कल्पना आचार्यने रमणीके सादृश्यसे व्यक्त की है । उसके साथ सङ्केतपूर्वक विहार प्रेमिकाके साथ विहारके समान आनन्ददायी है । अर्धा- ङ्गिनीके साथ विहार उसकी तुलना नहीं कर सकता । रमणी जिस प्रकार मदिर (मादक) होती है, वैसे ही कविता भी मदिर होती है । ऐसी कविता का प्रणेता कवि एवं सहृदय पाठक दोनों धन्य हैं । ये कवितासे आत्मतोषके रूपमें आनन्दलाभ तो करते ही हैं, लोकमें यश भी प्राप्त करते हैं । रति और कीर्ति उपलक्षक हैं काव्यके चतुर्वर्गप्राप्ति आदि समस्त फलोंका । १ इन्हें आचार्य ने (१।३ में) लोकयात्राकी प्रवृत्तिके रूपमें कहा है । १. रत्नश्री : उपलक्षणं चैतत् — चतुर्वर्गसिद्धिमपि चाधिगच्छति । यथोक्तं प्रथमे परिच्छेदे ।